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जीना है तो पीछे जाना ही होगा

Posted On: 17 May, 2020 Others में

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rajesh1963

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कोरोना हमें बहुत सीख दे रहा है। अहं का नाश। सादा जीवन। कम जरूरतों में जीना। मांसाहार के बिना भी जीना। नशे का त्याग। स्वजन को पूरा समय देना। बिना एसी रहना। संतोष करना। हाथ जोड़ना। प्रकृति के साथ तालमेल। धूप अच्छा लगना। बाजार से दूर रहना। बाजारू चीज न खाना। अंधविश्वास से दूरी। आदि-आदि। जो इसे सीख रहा है, उसे इस बदलते मौसम में भी साधारण सर्दी-जुकाम तक नहीं हुआ। यह तो प्रारंभिक फायदा है। जो लंबे समय तक ऐसे रहना सीख जाएगा, रोग उसके पास कैसे आएंगे।

 

 

दरअसल विकास की अंधी दौड़ में हम उसे ही भूल गए, जो हमारे जीवन के लिए जरूरी है। आधुनिकता की होड़ में हम परंपराओं से भी काफी दूर होते चले गए। हर किसी के पास समय का अभाव। रिश्ते ताक पर। किसी से बात तक करने की फुर्सत नहीं। खाने की टेबल पर भी सन्नाटा। स्मार्ट फोन ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। हम प्रकृति से दूर होते गए, प्रतिक्रियास्वरूप प्रकृति हमसे। नतीजा- नदियां नाले में तब्दील। हवा जहरीली हो गई। एकल परिवार। रिश्तों की मौत। मौसम की मार। मिट्टी मटियामेट। अन्न, सब्जियों व फलों की पौष्टिकता में कमी। इसका खामियाजा हमें ही भुगतना है। यह जानकर भी हम बेपरवाही की हद तक बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना का कहर चेतावनी मात्र है। इसने आधुनिकता को छोड़कर जीने का सलीका सिखाया। नसीहत दी कि प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। इसने जो लक्ष्मणरेखा खींची है, उसे लांघ नहीं सकते। इस लक्ष्मण रेखा का सम्मान करते हुए ही जी सकते हैं।

 

 

 

इतिहास गवाह है, हमने गलतियां की। बाद में पता चलने पर सुधार के उपाय भी किए, लेकिन तब तक मामला काफी आगे बढ़ चुका था। जैसे आजादी के बाद देश में खाद्यान्न का संकट हुआ तो अधिक उत्पादन के लिए खेतों में यूरिया डालने की सलाह दी गई। इसके पहले भारत के किसान यूरिया को जानते तक नहीं थे। अच्छी पैदावार होने लगी तो लोग इसका अंधाधुंध प्रयोग करने लगे। नतीजा-मिट्टी पर दुष्प्रभाव। अब सलाह दी जा रही है कि कम से कम यूरिया का प्रयोग करें। नदियों की पूजा करने का प्रावधान इसी परंपरा का हिस्सा है। सांस लेने के लिए शुद्ध हवा देने वाले पेड़ों को देवता माना गया। मिट्टी को मां का दर्जा है। जब जीवन के लिए सबसे जरूरी मां, जीने के लिए हवा व पानी ही आधार हैं तो इनके साथ इतना अत्याचार कैसे और क्यों। दरअसल हम अपने स्वार्थ में बहुत ज्यादा अमानवीय हो गए। मिट्टी को खराब किया, पैसों के लिए पेड़ों को काटा। नदियों व तालावों के पानी को छूने लायक भी नहीं छोड़ा।

 

 

 

इस स्थिति के लिए किसे दोष दिया जाए, समझ में नहीं आ रहा है। एक सीधा सा सिद्धांत है कि जिसका प्रयोग हम नहीं करेंगे, वह दिन-ब-दिन खराब होता जाएगा। तालाबों व कुओं की दुर्गति इसी कारण हुई है। पहले तालाबों में लोग स्नान करते थे। कुएं का पानी पीते थे, तब कोई प्रदूषण नहीं था। जब से हैंडपंप और बाथरूम संस्कृति का विकास हुआ है, पानी भी कम हुआ है। जो है भी, वह दूषित हो गया है। और तो और, अब भूमिगत जल भी कहीं-कहीं पीने लायक नहीं रह गया है। कहते हैं न कि जैसा खाएं अन्न, वैसे होगा मन। जब बीमार मिट्टी में पैदा हुआ खाद्यान्न हम खाएंगे तो कैसे स्वस्थ रह पाएंगे। जिस भूमिगत पानी में मल-जल मिल रहा हो, फैक्ट्रियों का पानी बोरिंग के माध्यम से छोड़ा जा रहा हो, वह पीने लायक कैसे रहेगा। सभी जानते हैं कि हमारे शरीर का 70 फीसद हिस्सा पानी ही है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है। सोचिए कि जो पानी आप पी रहे हैं, वह वास्तव में पीने लायक है या विभिन्न कंपनियों के लुभावने विज्ञापनों के लोभ में जहर तो नहीं है।

 

 

 

आश्चर्य तो इस बात पर है कि जहां इतना प्रदूषण हो। इसके चलते लोगों का जीना मुश्किल हो गया हो। उस देश में आजादी के बाद से आज तक किसी चुनाव में किसी पार्टी ने पर्यावरण के मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल नहीं किया। हां, गंगा सफाई का जिक्र जरूर देखने को मिलता है, जिसे कोई साफ कर ही नहीं सकता। साफ होगी तो खुद ही। जैसे आज के समय में हो गई है। अन्य नदियों की भी यही स्थिति है। परिस्थितियों ने हवा को भी बिना एक पैसा खर्च किए साफ कर दिया। तमाम खर्चे अपने आप कम हो गए। बिना वाहन चलाए भी जिंदगी चल सकती है। बाजार का खाए बिना भी जीभ संतुष्ट रह सकती है। सिगरेट, शराब, गुटखा भी जरूरी नहीं है।

 

 

 

पहले ऐसे मकान बनाए जाते थे, जिसमें हर कमरे में हवा व सूर्य की रौशनी आसानी से पहुंच सके। दीवारें मोटी-मोटी होती थीं। लखनऊ का भूलभुलैया या अन्य पुरानी इमारतें आज भी इसका गवाह हैं। आज ऐसे भवन व ऑफिस बन रहे हैं कि एसी न चले तो दम घुटने लगता है। घर में एसी, वाहन में एसी और ऑफिस में एसी। मतलब शुद्ध हवा में सांस लेने का समय नहीं के बराबर। कैसे रहेंगे स्वस्थ। कोरोना ने एक बार फिर हम सबको पुराने आर्किटेक्ट सिस्टम को अपनाने पर विवश किया है। लॉकडाउन खत्म होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती तो ऑफिस, मकान व व्यावसायिक प्रतिष्ठान का पुनर्निर्माण है। इस चुनौती से भी लड़ना ही होगा। ऐसा नहीं किया तो कोरोना हमेशा डराता रहेगा।

 

 

 

मैं जहां तक समझता हूं, भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को पीछे जाना ही होगा। पुरानी परंपराओं को अपनाना होगी। मसलन भारत में हाथ जोड़कर प्रणाम करने की परंपरा है, लेकिन अब लोग हाथ मिलाने लगे हैं। पर्यावरण की रक्षा से ही हमारे जीवन की भी रक्षा संभव है। कुओं, तालाबों के साथ नदियों की दुनिया में लौटना होगा। पिज्जा-बर्गर आदि को दूर से ही प्रणाम बोलना होगा। अब कोई यह भी नहीं कह सकता कि पिज्जा-बर्गर, वाहन, पार्टी आदि जरूरी है। क्योंकि डेढ़ महीने के लॉकडाउन ने बता दिया कि इनके बिना रहा जा सकता है। पहले से ज्यादा स्वस्थ, क्योंकि जब से लॉकडाउन हुआ है, लोगों के खानपान में बदलाव आया तो सामान्य बीमारियां खुद ही खत्म हो गईं।

 

 

 

कोरोना वैश्विक महामारी ही नहीं है, पूरी मानव सभ्यता के लिए अंतिम चेतावनी भी है। यदि हम पीछे नहीं लौटे तो पूरी दुनिया पर संकट आएगा। लिहाजा हमें जीना है तो पीछे जाना ही होगा। नदियों की ओर, तालाबों की ओर, शहर से गांवों की ओर, सादा जीवन की ओर, आभासी दुनिया से निकलकर हकीकत की ओर, परिवार की जड़ों की ओर, अपनी संस्कृति की ओर और मिट्टी की ओर। इनका त्याग करना भी जरूरी है- बाजार, नशा, आधुनिकता और घमंड का। आइए लौटें भौतिकता की ओर से आत्मीयता की ओर। आप भी पीछे लौटें, मैं भी। हम सब पीछे लौटें। प्रकृति की गोद में फिर से खेलना शुरू करिए, कोरोना या इससे भी खतरनाक वायरस कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।

-राजेश पटेल

 

 

 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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