blogid : 14057 postid : 858958

अन्तिम संस्कार ( एक कहानी )

Posted On: 3 Mar, 2015 Others में

मेरी आवाज़ सुनोभारत माता के चरणों में समर्पित मेरी रचनाएँ

Rajesh Kumar Srivastav

104 Posts

421 Comments

पश्चिम बंगाल का एक छोटा सा शहर / शाम के सात बजने वाले है / अभिजीत अपने ऑफिस से घर लौट आया है / दरवाजे पर खड़े होकर घंटी बजाता है / उसकी पत्नी, पौलमी के दरवाजा खोलते ही वह अंदर प्रवेश कर जाता है / पौलमी दरवाजा बंद करते-करते बोल उठती है /
“लगता है तुम्हारा बुढ्ढा बाप इस बार का ठंढ नहीं सह पायेगा / ”
” क्यों, क्या हुआ ? तबियत ज्यादा बिगड़ गई है क्या ?” अभिजीत ने पत्नी से जानना चाहा /
पत्नी-” आज सुबह से केवल खाँस रहा है / रामु (नौकर) से नाश्ता भिजवाया था / वो भी अभी तक नहीं खाया है / ना कुछ खा रहा है ना पी रहा है तो कब तक टिकेगा/”
– ” तुमने जाकर देखा /” अभिजीत थोड़ा चिंतित नजर आने लगा /
पत्नी घबड़ाते हुए – ” ना बाबा ना / मैं नहीं जानेवाली उसके पास / कही उसका संक्रमण मुझे ना लग जाये / और तुम भी ना जाना / रात में फिर से रामु से खाना भिजवा दूंगी / खाए तो भला ना खाए तो भी भला / बहुत दिन जी लिया बुढ्ढा / कही जाते -जाते अपनी बीमारी हमें ना दे जाय / ”
अभिजीत को पत्नी के इच्छा के विरुद्ध कोई भी काम करने का साहस नहीं था / इसलिए अपने बूढ़े बाप का खबर लेने का तिब्र इच्छा होने के बावजूद वह ऐसा नहीं कर पाया / वह चिंतित मन से सोफे पर बैठ गया / पौलमी भी उसके बगल में बैठ कर टीवी देखने लगी / वह चैनल बदल रही थी और अभिजीत बुझे मन से चुप-चाप बैठा रहा /
तीन व्यक्तियों का यह एक छोटा परिवार था/ पिताजी एक सरकारी कर्मचारी थे / उनको रिटायर हुए सात वर्ष बीत गए थे / अवकास ग्रहण के अगले ही वर्ष पत्नी भी स्वर्ग सिधार गई / एक ही लड़का है / उसके लालन-पालन से लेकर शिक्षा-दीक्षा का उन्होंने विशेष ध्यान रखा / आज वह एक बड़ी कंपनी में मैनेजर है / अवकाश ग्रहण के समय जो पैसा मिला उससे अपने छोटे से मकान को भव्य बनाया / बाहर एक गैरेज भी बनवा डाला ताकि भविष्य में कभी गाड़ी खरीदी जाय तो रखने में असुबिधा ना हो / लेकिन आज यही गाड़ी रखने की जगह उनकी आशियाना बन गई है / बेटे और बहु ने गाडी की जगह उन्ही को उसमे रहने का प्रबंध कर डाला है / बुढ़ापा ने कमजोरी को और कमजोरी ने शरीर को बिमारियों का घर बना डाला / आज वो रात-दिन उसी गैरेज में गुजारते है / बहु समय -समय पर नाश्ता खाना भिजवा देती है / दवाइयों की भी व्यवस्था हो ही जाती है / बदले में उनको अपने पेंशन का एक-एक रुपया बहु के हाथों में सौप देना पड़ता है /
टीवी देखते – देखते अचानक अभिजीत ने पौलमी से टीवी का साउंड बंद करने को कहा /
” क्यों क्या हुआ ? क्या सोचने लगे /” पौलमी ने पूछा /
” सोच रहा हूँ एक बार पिताजी को देख आऊँ / जाने क्यों मन घबड़ा रहा है /” वह सोफे से उठ खड़ा हुआ /
” ठीक है कल सुबह देख लेना /” पौलमी ने उसका हाथ पकड़कर फिर सोफे पर बैठा लिया /
” क्यों अभी क्यों नहीं ?” वह घबड़ाया हुआ लग रहा था /
पौलमी-” अरे कही मर-मुरा गया होगा तो ना रात में खाना-पीना हो पायेगा ना ही सोना/ सब छोड़कर शुरू कर देना पडेगा अन्तिम संस्कार की तैयारी /”
” हाँ / अब समय देखकर तो किसी की मौत आती नहीं / रात हो या दिन , गर्मी हो या ठंढ , जो हमारे संस्कार है वो तो करने ही होंगे /”
” जब सारी दुनिया तेजी से आधुनिक हो रही है तो ये संस्कार क्यों पुराने ही निभाने होते है मुझे समझ नहीं आता / अब कोई मर जाय तो अपना सारा काम-धाम छोड़कर पंडित बुलाओ, कफ़न खरीदो , धुप – बत्ती जलाओ, शमसान पहुंचाओं, मुखाग्नि दो, जलाओं, नहाओ, दस-बारह दिनों तक पड़े रहो श्राद्ध करो, ये क्या मुसीबत है / खुद तो मरकर स्वर्ग में आराम फरमाओं और दूसरों को परेशान करो / ”
” पूर्बजो की बनाई इस प्रथा को बदला तो नही जा सकता /”
” ऐसा भी तो नहीं हो सकता की म्युनिसिपल वालों को खबर करो / कुछ पैसे दो और वही उठाकर ले जाय/ जो करना हो करे /”
” म्युनिसिपल वाले पशुओं के मृत शरीर को ले जाते है मनुष्य को नहीं/”
” हाँ पता है मुझे / लेकिन कोई तो संस्था होगी जो पैसे लेकर हमारे इस सड़े संस्कार की खाना पूर्ति कर दे /”
” हाँ मैंने इंटरनेट पर ऐसी कुछ सत्कार समितियों का प्रचार देखा है जो पैसे के बदले ऐसे काम कर दिया करती है /”
” तो खोजकर रखो ना ऐसे संस्थाओं का अता-पता, ताकि हमें परेशान होने की जरुरत नहीं पड़े /”
फिर दोनों इंटरनेट पर ऐसे सत्कार संस्थाओं के संपर्क खोजने में व्यस्त हो गए / अभी आधे घंटे भी नहीं हुए होंगे की बाहर से “आग-आग” की आवाज सुनकर दोनों घर से बाहर निकले / बाहर उनका गैरेज चारों और से धूं-धु करके जल रहा था/ जबतक दमकल वाले आते और आग बुझाते, पूरा गैरेज जलकर राख में तब्दील हो चुका था / आग की ऊँची – ऊँची उठ रही लपटों ने उस बूढ़े के साथ-साथ उसमे पल रहे संक्रमण के कीटाणु को भी राख में तब्दील कर दिया था /
गैरेज से दूर घर के दरवाजे पर एक कागज़ का टुकड़ा पड़ा था जिसपर लिखा था / मेरी अन्तिम संस्कार की चिंता तुमलोगो को करने की जरुरत नहीं / मैंने अपने माता-पिता और पत्नी के अन्तिम-संस्कार किये है / मुझे अपना अन्तिम संस्कार करना भी आता है /

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग