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सीख (शिक्षाप्रद कहानी ---३)

Posted On: 29 Jun, 2015 Others में

मेरी आवाज़ सुनोभारत माता के चरणों में समर्पित मेरी रचनाएँ

Rajesh Kumar Srivastav

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अक्सर जब घर में कमाने वाला एक और खाने वाले अत्यधिक हों तो जो हाल होता है वही हाल सुधीर का था/ उसके अलावा, परिवार में माता -पिता,एक बेरोजगार भाई, एक अविवाहित बहन और एक तलाकशुदा बहन अपने दो-दो बच्चों के साथ एक ही घर में रहते थे / सभी के खर्च का जिम्मा सुधीर ही उठाता था / पिताजी रिटायर्ड हो चुके थे और नाम मात्र का पेंशन पाते थे / छोटा भाई और बड़ी बहन ट्यूशन पढ़ाकर मामूली आय करते थे / माँ हमेशा बीमार रहती थी / माँ के इलाज और छोटी बहन के पढाई में अच्छा -खाशा खर्च होता था / सुधीर एक कंपनी में इंजीनियर था / उसकी आय अच्छी थी / लेकिन सारा आय परिवार में ही खर्च हो जाता था / सुधीर भी परिवार के ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी मानता था / अच्छे पोस्ट और अच्छे आय के वावजूद वह साधारण जीवन व्यतीत करता था/ उसे इसका कोई अफ़सोस नहीं रहता की अच्छे आय के वावजूद वह अपनी निजी इच्छाओं को पूर्ति करने में असमर्थ था/ लेकिन धीरे -धीरे सहकर्मियों के पहनावों -ओढ़े, खान-पान, जीवन -यापन को देख देखकर उसके सोच में परिवर्तन होने लगा / उसे लगने लगा की इतना अच्छा कमाने के वावजूद वह अपने लिए अलग से कुछ खर्च नहीं कर पाता / उसे भी आधुनिक और मौज-मस्ती की दुनिया लुभाने लगी / परिवार के साथ रहकर ऐसा सम्भव नहीं था / इसलिए उसने घर छोड़कर बाहर नौकरी के लिए जाने का निर्णय किया /
घर के लोग उसके निर्णय से खुश नहीं थे / लेकिन उसे उनलोगों की परवाह ना की / उसने घरवालों को समझाया कि बाहर जाना उसके कैरियर के लिए बहुत जरुरी है /
कुछ ही दिनों में उसे दूर मुंबई शहर में एक अच्छी कंपनी में काम करने का ऑफर मिला / वह मुंबई जाने के लिए स्टेशन पहुँचा / टिकट कटाकर समय सारणी बोर्ड पर ट्रेन का समय देख रहा था / अचानक उसे पीछे से अपने पैंट को खीचने जैसा महसुस हुआ / उसने मुड़कर देखा मैली कुचली, फटी सलवार कुर्ती पहने हाथ में कटोरे लिए एक किशोरी भीख मांग रही थी /
सुधीर को अपनी तरफ मुड़कर देखते ही वह बोल उठी -” बाबू पांच रूपये दो ना भूख लगी है भात खाऊँगी /”
सुधीर-” पांच रुपये में भात मिल जाएगा /”
किशोरी-” हाँ बाबू और कुछ लोगों से मांगकर भात खा लुंगी / पांच रुपये दो ना / भगवान तुम्हे भला करेगा /”
किशोरी की रोनी सूरत देखकर सुधीर को दया आ गई /
सुधीर-” यहाँ भात कितने का आता है ?”
किशोरी-” पचास रुपये का बाबू / ”
सुधीर-” कहाँ मिलेगा भात /”
किशोरी ने सामने एक होटल को दिखाकर कहा ” वहाँ /”
सुधीर ने घडी पर नज़र डाली अभी ट्रेन के आने में देर थी / उसने किशोरी से कहा ” चलो मैं तुम्हे भात खिलाता हूँ /” फिर वह उस होटल की ओर बढ़ने लगा /
किशोरी उसके रास्ते में खड़े होकर आगे बढ़ने से रोका और बोली ” काहे को इतना कष्ट करोगे बाबू / मुझे रुपये दे दो मैं खा लुंगी /”
सुधीर – ” तुम मेरे कष्ट की चिंता मत करो / चलो तुम्हे जो खाना है खाओ / जितने पैसे होंगे मैं दे दूंगा /”
किशोरी -” तो एक काम करो बाबू तुम मुझे पचास रुपये दे दो मैं खुद खा लुंगी /”
सुधीर -” पैसा तो मै तुम्हारे हाथ में नहीं दूंगा / तुमलोग पैसा लेकर गलत जगह खर्च कर देते हो / चलो जो खाना है खाओ मैं पैसा चुका दूंगा / और तुम्हे तो बहुत भूख भी लगा है ना/”
किशोरी ने अपने दोनों कानों को पकड़ते हुआ कहा -: कसम से मैं वैसी नहीं हूँ / तुम नहीं समझते बाबू / मैं अभी नहीं खा सकती /”
सुधीर-” क्यों नहीं खा सकती ?”
किशोरी-“घर वाले भूखे है ना /”
सुधीर ने उत्सुकता दिखाते हुए पूछा ” कौन-कौन हैं तुम्हारे घर में ?”
किशोरी-” बाबा बीमार है / खाट पर पड़े रहता है / माँ उसकी देखभाल में लगी रहती है / छोटा भाई है लेकिन उसे ठीक से भीख मांगने नहीं आता /”
सुधीर-” तो तुम खा लो / वे लोग भी बाद में खा लेंगे /”
किशोरी -” एक काम करोगे बाबू / तुम मुझे जितने के खाना खिलाना चाहते हो उतने का मुझे चावल, दाल और अंडे खरीद दो /”
सुधीर -” इससे क्या होगा?”
किशोरी -” हमलोग आज घर में पार्टी करेंगे / दाल भात के साथ आमलेट / बहुत अच्छा लगेगा / बहुत दिन हो गया ऐसा खाना नहीं मिला/”
सुधीर -” लेकिन पचास रुपये में जो सामान आएगा उससे तो दो लोगों का मुश्किल से भोजन हो पायेगा / और तुम्हारे घर में तो चार सदस्य है / ”
किशोरी -” उससे क्या होगा बाबूजी / थोड़ा -थोड़ा कम खाएंगे लेकिन सब मिलकर खाएंगे / अकेले भर पेट दावत उड़ाने से ज्यादा मजा एक साथ मिलकर खाने में आता है बाबूजी / भले ही थोड़ा कम क्यों ना हो /”
किशोरी की बात को सुनकर सुधीर को स्वयं से घृणा होने लगा / उसने अपना इरादा बदल दिया / पॉकेट से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उस किशोरी के हाथों में रखते हुए बोला “मुझे सिख देने के एवज़ में मेरी ओर से यह गुरुदक्षिणा /”
फिर उसने टिकट लौटाए और ख़ुशी-ख़ुशी घर की ओर लौट पड़ा/

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