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झाड़ू के भी दिन फिरते हैं

Posted On: 2 Apr, 2016 Others में

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Rajiv Kumar Ojha

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कुछ खरी कुछ खोटी ….. राजीव कुमार ओझा
(आपकी अदालत में एक व्यंग्य और जो केजरीवाल सरकार पार्ट (01 )से संदर्भित है )
झाड़ू के भी दिन फिरते हैं
समय का फेर देखिये कि जो बुजुर्गों ने कहा था हो उसके उल्टा रहा है ।जैसे आप जानते हैं मैं भी जानता था कि कभी न कभी घूरे के भी दिन फिरते हैं यानि अच्छे दिन आते हैं ,पर बुढ़ऊ अन्ना के छोरे ने कमाल कर दिया । झाड़ू के दिन फेर दिए अन्ना के छोरे ने । इस छोरे की हरकत की वजह से देश कि राजधानी में झाड़ू क्राइसिस कि खबर है। झाड़ू क्राइसिस के देश व्यापी होने कि आशंका से सियासी घूरों पर स्यापा काबिज है ।झाड़ू संकट से पीएम रेस के प्रतियोगियों में हड़कम्प मचा है। पीएम के केसरिया ,मनमोहनी,मुलायमी सपनों में गाफिल सियासी घूरों के ठेकेदारों को अब ‘ख्वाब ए तख्त दिल्ली ‘की जगह‘ख्वाब ए झाड़ू ने ‘ हलकान कर रखा है। खबर है कि ‘घूरा खापों‘ कि महा पंचायत बुलाई जा रही है ।जिसमे ‘ऑपरेशन झाड़ू ‘के तौर तरीकों पर सियासी मंथन होना है ।
ये भी कोई बात हुई कि अन्ना का छोरा सीएम बनते ही रिश्वतखोरों के पीछे लट्ठ ले के पिल पड़ा। लाल चिराग पर पाबन्दी लगा दी । जिन्हें अन्ना के छोरे पर आसाराम नारायण साईं के भक्तों जैसा भरोसा है वो मुतमईन हैं कि अब घूरों के दिन गए । छोरे कि झाड़ू इस देश को घूरा मुक्त कर डालेगी। अब यह देश झाड़ू का ,झाड़ू बालों का होगा। परन्तु ‘कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण‘ के खलीफा घूरों को आश्वस्त कर रहे हैं कि घबड़ाने की जरुरत नहीं हम हैं ना । खलीफा के खासुलखास ‘घाघनाथ‘ अपनी खास स्टाईल में ललकार रहे हैं कि ‘‘कोई माई का लाल इस देश को घूरा मुक्त नहीं कर सकता ।झाड़ू बालों को इस देश कि संस्कृति से खेलने नहीं देंगे। इस देश में घूरों को भी पूजा जाता है ।साल में एकाध दिन ही सही घूरों पर दिया जलाने कि संस्कृति है हमारी और हम ठहरे धर्म ,संस्कृति के इकलौते ठेकेदार। हमारे होते ऐसा अनर्थ कोई माई का लाल नहीं कर सकता।‘‘
उधर मनमोहनी टीम के दिग्विजयी चिंतकों ने आला कमान को समझाना शुरू किया है कि ‘‘जिस सिंघासन पर अन्ना के छोरे को हमने बैठाया है उसी को घिस कर अलादीन का वो चिराग ला देंगे जिससे जिन्न नमूदार होगा और पूछेगा कि क्या हुक्म है मेरे आका ? तो उस जिन्न को ही लगा देंगे आपरेशन झाड़ू में । सर जी! मैम जी ! फिकिर नाट जी ! दिल्ली हमारी थी हमारी रहेगी। अलादीनी चिराग पैदा करना है वस सिम्पल । सर जी! हमारी भव बाधा दूर करने को ये खबरिया चैनल तो हैं ही। देखिये न छोरे के सिंघासन पर बैठने के पहले से ही छोरे का मीडिया ट्रायल होने तो लगा। खबरिया चैनलों पर गलचैरियाने बाले हैं न इस अन्ना के छोरे कि नाक में दम करने को। देखा नहीं अभी से ये छोरे के चुनावी वायदों के पीछे लट्ठ लिए खड़े हैं कि बताओ बच्चू कैसे फिफ्टियाओगे बिजली के दाम और कैसे रखोगे आम आदमी का ‘बिन मोल के पानी ‘ का पानी ? सर जी! हमें तो इतना करना है कि खबरिया चैनल बालों कि जासूसी के लिए ‘गुजराती साहेब‘ स्टाइल में नजर रखनी है कि इन्हें अन्ना का छोरा पटा न ले । इनके सर छोरे का जादू न सवार होने पाये ।जो छोरे से पटता दिखे वस उसे ठीक करने कि दरकार होगी हमें ।
मौजूदा समय घूरों के लिए और घूरों के ठेकेदारों के लिए गम्भीर संकट का है झाड़ू संकट का। इस सूरतेहाल पर हमारे मित्र चाटू भी खोपड़ी चाटने से बाज नहीं आ रहे ।ऐसी ऐसी उड़नझाइयां पेश करने लगे हैं कि खोपड़ी मजबूत न हो तो खोपड़ी का फ्यूज भक्क से उड़ जाये। यदि आगे कि पंक्तियाँ आप अपनी रिस्क पर पढ़ना चाहें तो ही पढ़ें क्यूंकि खोपड़ी का फ्यूज उड़ने का खतरा है। अब चाटू कि इन उड़नझाइयों पर फ्यूज उड़े न उड़े पर खोपड़ी भन्ना जरूर जायेगी ।आप भी गौर फरमाएं चाटू कि उड़नझाइयों पर। चाटू उवाचते हैं कि जो कुछ परदे पर नजर आ रहा है उससे कहीं ज्यादा परदे के पीछे गुप्त तहखाने में है। बहुत कुरेदने पर उन्होंने परदे के पीछे का पर्दा थोड़ा सा सरकाते हुए कहा कि अन्ना का छोरा भीतर खाने मनमोहनी माया पर कत्थक कर रहा है।ऐसा न होता तब जिस मनमोहनी, नमोदी ब्रांड भ्रष्टाचार को कोसते रहा ये छोरा उसी के जाल में क्यूँ फंसता? मैंने झिड़का कि बेपर कि मत हांको तब चाटू ने फरमाया कि अभी तो ये ट्रेलर है असली खेल तो ‘बड़के चुनाव ‘में होगा। चाटू कि मानें तो बड़के चुनाव में अन्ना का छोरा मनमोहनी गठबंधन में बंधा नजर आ सकता है। बकौल चाटू प्रेम ,युद्ध और सियासत में सब कुछ जायज होता है । अगर मनमोहनी गांठ में फंसने से छोरा बच निकला तो ‘घूरों ‘कि अस्तित्व रक्षा के लिए मनमोहनी नमोदी गठबंधन बड़के चुनाव में झाड़ू पर झाड़ू फेरने को मैदान संभाल सकता है। अब आप ही बताएं ऐसी उड़नंझाइयों से खोपड़ी का फ्यूज उड़ सकता है न?(संदर्भः-कांग्रेस समर्थित केजरीवाल सरकार पार्ट01 )

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