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नीतीश के सामने छब्बे से दुबे बनने का खतरा

Posted On: 27 Jul, 2017 Others में

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Rajiv Kumar Ojha

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बिहार की राजधानी पटना के सियासी मंच पर 26 जुलाई की शाम जिस सियासी नौटंकी का मंचन हुआ, उसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। इस सियासी नौटंकी की स्क्रिप्ट मॉरीशस के प्रधानमंत्री को ( फूट और नफरत की राजनीति के माहिर) नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए भोज में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भेजे गए आमंत्रण में लिखी गई थी।
संघ मुक्त भारत के निर्माण का नारा देने वाले नीतीश कुमार चौबे से छब्बे बनने की मृगमारीचिका के पुराने मरीज रहे हैं। सियासी यू-टर्न लेने का व धोखे की राजनीति करने का उनका इतिहास रहा है। याद कीजिये 1994 जब नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाने के लिए लालू यादव को धोखा दिया था। तब कई जनता दल समर्थक नीतीश कुमार के साथ खड़े दिखे थे।

1995 में बिहार विधानसभा का चुनाव नीतीश ने भाकपा से गठबंधन कर लड़ा था। महज एक साल बाद ही नीतीश ने यू-टर्न लिया और गठबंधन धर्म को धोखा देते हुए भाकपा की धुर विरोधी दक्षिण पंथी भाजपा की गोद में जा बैठे थे। वर्ष 2010 में नीतीश कुमार ने भाजपा को झटका देना शुरू किया।

12 जून, 2010 को पटना में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को दिया गया रात्रि भोज का कार्यक्रम नाटकीय अंदाज में नीतीश कुमार ने रद्द कर दिया था। उत्तरवर्ती घटनाक्रम में नीतीश कुमार ने बिना किसी औचित्य के गुजरात सरकार से 2008 की कोसी बाढ़ विभीषिका के पीड़ितों के लिए सहायता राशि के तौर पर मिली 5 करोड़ की धनराशि लौटा दी थी।

एक और नाटकीय घटनाक्रम की चर्चा आज प्रासंगिक है। याद कीजिये नीतीश कुमार का वह फैसला, जिसमें उन्होंने अचानक सभी मंत्रियों को बिना कोई कारण बताए मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक एक दिन बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर एक नया सियासी प्रयोग करते हुए जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। उनका मकसद था पर्दे के पीछे रहकर सरकार चलाना। जीतनराम मांझी को कठपुतली मुख्यमंत्री बनना पसंद न था। यह बात नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी के समर्थकों के बीच सार्वजनिक तौर पर शुरू जूतम-पैजार ने सिद्ध की थी। नीतीश कुमार ने अंततः जीतनराम मांझी को सत्ता से बेदखल किया और फरवरी 2015 के आखिरी सप्ताह में नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन बैठे।
राजद के कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस्तीफ़ा देने, गठबंधन धर्म से विश्वासघात करने वाले, खुद को नैतिकता और ईमानदारी का प्रतीक सिद्ध करने वाले नीतीश कुमार पर जीतनराम मांझी ने खुलकर भ्रष्ट ठेकेदारों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। मांझी ने बिहार सरकार में चल रहे कई गंभीर घोटालों का पर्दाफाश किया था। अपनी छवि परगहरे दाग से चिंतित नीतीश कुमार अचानक लालू प्रसाद यादव के साथ जा खड़े हुए। दरअसल, नीतीश आश्वस्त थे कि अदालत से दोषी करार दिए जाने के कारण लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री नहीं बन सकते। यही वजह थी की उन्होंने लालू के वोट बैंक की ताकत का सियासी फायदा उठाने की मंशा से लालू को बड़ा भाई कबूल किया।

सुविधा की और धोखे की राजनीति के उस्ताद नीतीश को यह भलीभांति पता था कि तमाम झंझावातों के बावजूद लालू का चुनावी राजनीति में एक मजबूत जनाधार बरकरार है। लालू देर-सवेर कांग्रेस सहित अन्य भाजपा विरोधी ताकतों को लामबंद करने में कामयाब होंगे। इन्हीं वजहों से नीतीश ने लालू को अपना बड़ा भाई तस्लीम किया और संघ मुक्त भारत की बातकर भाजपा विरोधी ताकतों में अपनी स्वीकार्यता सुनिश्चित की।

आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस के बीच एक मजबूत महागठबंधन हुआ और बिहार की 243 में से 178 सीटें इस महागठबंधन के खाते में आईं। जिस लालू यादव ने नीतीश कुमार को राजनीति की मुख्यधारा में फिर से लाने में मदद की यदि उन पर, उनके परिवार पर दर्ज एफआईआर में लगे आरोपों को सच भी मान लें, तब नीतीश कुमार का भाजपा की गोद में बैठ जाना किसी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता है।

नीतिश के इस ताजा तरीन यू-टर्न को सुविधा, विश्वासघात की सुनियोजित सियासी साजिश के अलावा और कोई नाम नहीं दिया जा सकता। ये वही मिस्टर क्लीन हैं, जो अपने डूबते सियासी वजूद को बचाने के लिए जेडीयू का आरजेडी में विलय तक करने को तैयार थे। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ दर्ज एफआईआर के बहाने महागठबंधन को धोखा देने वाले नीतीश कुमार की नैतिकता उस समय कहां थी, जब 28 मार्च, 2015 को तिहाड़ जेल में बंद ओम प्रकाश चौटाला से मिलने गए थे ?
विश्वासघात की इस ताजा तरीन नौटंकी से नीतीश को तात्कालिक लाभ जरूर हुआ है, परन्तु सियासी साख को गंभीर क्षति की कीमत पर हुए इस तात्कालिक लाभ के दूरगामी परिणाम नीतीश को भोगने पड़ेंगे। इसके संकेत जदयू के दिग्गजों में खदबदाते असंतोष और आक्रोश से मिलने शुरू भी हो चुके हैं। चौबे से छब्बे बनने चले नीतीश को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस सियासी नौटंकी के वे मुख्य पात्र बने हैं, उस सियासी नौटंकी का स्क्रिप्ट राईटर धोखे और विश्वासघात की राजनीति में उनसे बड़ा खलीफा है। गुजरात के गृहमंत्री हरेन पांड्या और भाजपा के शीर्ष पुरुष लालकृष्ण आडवाणी का हश्र इसकी पुष्टि करता है। आश्चर्य नहीं होगा यदि जदयू का हश्र गोवा की महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी जैसा हो। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने गोवा में भाजपा से गठबंधन किया था, परिणाम जगजाहिर है आज भाजपा सत्ता में है और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी उसकी दरबारी।

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