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सुकमा काण्ड :नक्सलवाद की जड़ों को तलाशने की जरुरत

Posted On: 13 Mar, 2017 Others में

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Rajiv Kumar Ojha

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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले ने सीआरपीएफ के एक इन्स्पेक्टर ,दो सब इंस्पेक्टर तथा नौ आरक्षियों की जिंदगी लील ली। नक्सली हमलों में सुरक्षा बलों की अकाल मौत की फेहरिश्त काफी लंबी है। अब तक ऐसे मामलों में सरकारी एजेंसियां जो करती रही हैं कमोवेश वैसा ही इस मामले में भी होता नजर आ रहा है।
सत्ता प्रतिष्ठान सुरक्षा बलों ,अर्ध सैनिक बलों और सेना के सहारे इस समस्या से निपटने का प्रयास करता रहा है ,जिसकी भारी कीमत हमारे जवानों की अकाल मौत के रूप में हमें चुकानी पड़ी है। एक लंबे अर्से से हम नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहे हैं क्योंकि सत्ता प्रतिष्ठान ने इस समस्या की जड़ों को तलाशने की ईमानदार पहल नहीं की। इस समस्या के आर्थिक ,सामाजिक और भौगोलिक पक्षों को समझे बिना इसके समाधान की कल्पना नहीं की जा सकती

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नक्सलवाद का जन्म ही आर्थिक असमानता की कोख से हुआ है। इस समस्या की मूल वजह ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा,रोजगार के अवसरों तथा मूलभूत नागरिक सुविधाओं का अभाव है। यह अभाव ही नक्सल समस्या की प्राण वायु है। यह अभाव ही है जो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को सत्ता प्रतिष्ठान से दूर करता है और इन अभावग्रस्त लोगों के बीच नक्सलवादी विचारधारा को जड़ें ज़माने का अवसर प्रदान करता है।
सत्ता प्रतिष्ठान को आत्म मंथन करना चाहिए और ईमानदारी के साथ इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा की इस समस्या का स्थाई समाधान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती से कत्तई नहीं किया जा सकता। शीर्ष प्राथमिकता पर सत्ता प्रतिष्ठान को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा ,रोजगार के पर्याप्त अवसर मुहैय्या कराने ,मूलभूत नागरिक सुविधाओं की दृष्टि से नियोजित विकास की कार्य योजना बना कर उसके समयबद्ध क्रियान्वयन की ईमानदार कोशिस करनी होगी। यदि हम ऐसा कर सके तब काफी हद तक नक्सलवाद की जड़ों पर प्रभावी प्रहार कर सकेंगे।
स्थानीय नागरिकों के बीच नक्सलियों की पैठ और स्थानीय नागरिकों से मिलने वाली सहानुभूति पर अंकुश लगाया जा सकेगा। दुर्भाग्य यह है की आजादी के सातवें दशक में खड़े इस देश में आज भी ऐसे तमाम क्षेत्र हैं जहाँ विकास की रोशनी पहुंची ही नहीं है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नागरिकों को इस संदेह में पुलिसिया प्रताड़ना झेलनी होती है की पुलिस उन्हें नक्सली या नक्सलियों का मददगार मानती है ,पुलिसिया प्रताड़ना की कोख से कई हार्ड कोर नक्सली पैदा होते रहे हैं। दूसरी तरफ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के तमाम नागरिकों की हत्या नक्सलियों द्वारा इस संदेह में की गई की वह पुलिस के लिए नक्सलियों के खिलाफ मुखबिरी कर रहे थे। विकास से वंचित नक्सल प्रभावित क्षेत्र के नागरिकों की बहु बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ के मामले में भी यही दोहरी मार झेलनी होती है। स्थिति किस हद तक भयावह है इसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के निवासियों के चेहरों पर पढ़ा जा सकता है।
जहाँ तक नक्सल हमलों में सुरक्षा बल के जवानों की अकाल मौत का सबाल है उसके लिए काफी हद तक सत्ता प्रतिष्ठान की गलत नीतियां जिम्मेवार हैं। नक्सली अपने मंसूबों में सफल होते रहे हैं पर सत्ता प्रतिष्ठान ने कभी भी यह जानने की कोशिस नहीं की कि उनका ख़ुफ़िया तंत्र ऐसे हमलों से बेखबर क्यों रहा ? क्यों स्थानीय नागरिक इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते ,सुरक्षा बलों की मदद नहीं करते ? क्यों स्थानीय नागरिकों को व्यवस्था नहीं नक्सली उनके हितचिंतक प्रतीत होते हैं ?
इन सबालों के जबाब तलाशने की जरुरत है ,नक्सल समस्या की जड़ों को तलाशने की जरुरत है ,इस समस्या का स्थाई समाधान तलाशने की जरुरत है ,नक्सल समस्या की जड़ों पर प्रहार करने की जरुरत है जिसकी सार्थक पहल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का समग्र विकास करके ही की जा सकती है।

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