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मन्दोदरी-एक सती

Posted On: 20 May, 2019 Others में

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पुलस्त्य ऋषि के पुत्र और महर्षि अगस्त्य के भाई महर्षि विश्रवा ने राक्षसराज सुमाली और ताड़का की पुत्री राजकुमारी कैकसी से विवाह किया था। कैकसी के तीन पुत्र और एक पुत्री थी- रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और सूर्पणखा। विश्रवा की दूसरी पत्नी ऋषि भारद्वाज की पुत्री इलाविडा थीं जिससे कुबेर का जन्म हुआ। इलाविडा को वरवर्णिनी भी कहते थे। कुछ मान्यताओं अनुसार इलाविडा वैवस्वतवंशी चक्रवर्ती सम्राट तृणबिन्दु की अलामबुशा नामक अपसरा से उत्पन्न पुत्री थीं। इस तरह रावण के सौतेले भाई थे कुबेर। रावण को त्रैलोक्य विजयी, कुम्भकर्ण को छ: माह की नींद और विभीषण को भगवद्भक्ति का वरदान प्राप्त था। तीनों भाई कुबेरे से छीन ली गई लंका में रहते थे। रावण ने दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया, जो हेमा नामक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। विरोचनपुत्र बलि की पुत्री वज्रज्वला से कुम्भकर्ण का और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। भावार्थ रामायण के अनुसार रावण को कई जगह पर दशानन कहा गया है धार्मिक ग्रंथो के अनुसार दशानन का तात्पर्य दस इन्द्रियों के रूप में निरुपित किया गया है जैसे कि आत्मा का अहं से द्वंध युद्ध होता रहता है दस इन्द्रियां दस मुख बनकर त्रलोक्य का सुख भोग करना चाहती है परन्तु उसे कभी भी संतुस्टी नहीं होती |

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार मधुरा नामक एक अप्सरा कैलाश पर्वत पर पहुंची। देवी पार्वती को वहां ना पाकर वह भगवान शिव को आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगी। जब देवी पार्वती वहां पहुंची तो भगवान शिव की देह की भस्म को मधुरा के शरीर पर देखकर वह क्रोधित हो गईं और क्रोध में आकर उन्होंने मधुरा को मेढक बनने का शाप दे दिया। उसने मधुरा से कहा कि आने वाले 12 सालों तक वह मेढक के रूप में इस कुएं में ही रहेगी। भगवान शिव के बार-बार कहने पर माता पार्वती ने मधुरा से कहा कि कठोर तप के बाद ही वह अपने असल स्वरूप में आ सकती है और वो भी 1 साल बाद। मधुरा ने 12 वर्ष तक एक कुएं में रहकर मेढकरूप में कठोर तप किया। जब 12 वर्ष पूर्ण होने वाले थे तब मयासुर और उनकी पत्नी हेमा पुत्री की कामना से वहां तप शुरू करने पहुंचे जहां मथुरा तप कर रही थी। जैसे ही मधुरा के 12 वर्ष पूर्ण हुए वह अपने असली स्वरूप में आ गई और कुएं से बाहर निकलने के लिए मदद के लिए पुकारने लगी। हेमा और मयासुर वहीं कुएं के पास तप में लीन थे। मधुरा की आवाज सुनकर दोनों कुएं के पास गए और उसे बचा लिया। बाद में उन दोनों ने मधुरा को गोद ले लिया और उसका नाम रखा मंदोदरी। एक कथा यह है कि रावण की मृत्यु एक खास बाण से हो सकती थी। इस बाण की जानकरी मंदोदरी को थी। हनुमान जी ने मंदोदरी से इस बाण का पता लगाकर चुरा लिया जिससे राम को रावण का वध करने में सफलता मिली। सिंघलदीप की राजकन्या और एक मातृका का भी नाम मंदोदरी था। हालांकि जनश्रुतियों के अनुसार मंदोदरी मध्यप्रदेश के मंदसोर राज्य की राजकुमारी थीं। यह भी माना जाता है कि मंदोदरी राजस्थान के जोधपुर के निकट मन्डोर की थी।

राम के जीवन पर करीब 125 अलग-अलग रामायण लिखी जा चुकी हैं. कई ग्रंथों को विद्वान प्रामाणिक भी मानते हैं. सीता और रावण के संबंध में कई कथाएं भी प्रचलित हैं. ऐसी ही एक रामायण है जिसका नाम है अदभुत रामायण. यह रामायण 14वीं शताब्दी में लिखी मानी जाती है. यह मूलत: कथानक न होकर दो प्रमुख ऋषियों वाल्मीकि और भारद्वाज ऋषि के बीच का वार्तालाप है | थाईलैंड रामायण में रावण की पुत्री थी सीता रामायण कई देशों में ग्रंथ की तरह अपनाई गई है. थाइलैंड में जो रामायण है उसके अनुसार सीता रावण की बेटी थी, जिसे एक भविष्यवाणी के बाद रावण ने ज़मीन में दफ़ना दिया था. भविष्यवाणी में कहा गया था कि ‘यही लड़की तेरी मौत का कारण बनेगी’.बाद में देवी सीता जनक को मिलीं. यही कारण था कि रावण ने कभी भी देवी सीता के साथ बुरा बर्ताव नहीं किया | असम के कन्दली रामायण के अनुसार अपुत्रक जनक भार्या सहित यज्ञ भूमि जोतने गए तो उन्हें मेनका अप्सरा दिखाई दी जिसे देख कर वो दुखी हो गए तभी एक आकाशवाणी हुई कि आप यज्ञ भूमि जोतो आपको ऐसी ही सुन्दर कन्या प्राप्त होगी| इस कारण भी वे सीता के पिता बने थे|

कुछ विद्धवानो के अनुसार रावण के 10 सिर 6 शास्त्रों और 4 वेदों के प्रतीक थे | इसलिए ब्रह्मा ने रावण को प्रकांड पंडित की उपाधि दी थी. रावण ऋषि विश्रवा का पुत्र था जिनकी पहले से एक पत्नी थी. इसका मतलब रावण की दो मां थीं एक सगी और एक सौतेली. लेकिन इसके अलावा भी रावण के परिवार के बारे में कई ऐसी बातें हैं जिनके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे|  वैसे तो रावण के रावण के दो भाइयों और एक बहन के बारे में सब जानते हैं| जिनका नाम कुंभकर्ण, विभीषण और सुर्पणखा है, लेकिन रावण के पांच और भाई बहन थे. जिनके बारे में लोग काफी कम जानते हैं. रावण के छह भाई थे| विभीषण, कुंभकर्ण के अलावा कुबेर, अहिरावण, खर और दूषण भी रावण के भाई थे. साथ ही सूर्पनखा के अलावा रावण की एक बहन और भी थी. जिसका नाम कुंभिनी था. कुंभिनी मथुरा के राजा मधु राक्षस की पत्नी थी और राक्षस लवणासुर की मां, खर-दूषण, कुंभिनी, अहिरावण और कुबेर सगे भाई बहन नहीं थे|

रावण की एक पत्नी के बारे में सभी लोग जानते हैं. जिनका नाम है मंदोदरी| लेकिन ऐसा नहीं है, हकीकत में रावण की तीन पत्निया थीं| पहली का नाम था मंदोदरी जो की राक्षस राज मयासुर की पुत्री थी और राजरानी थी| उनकी दूसरी पत्नी का नाम दम्यमालिनी था और तीसरी का नाम कहीं भी उल्लेखित नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि रावण ने ही उसकी हत्या की थी| उनकी तीसरी से रावण को तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई थी| रावण की पत्नी दम्यमालिनी के बारे में कहा जाता है कि जब रावण सीता का स्वयंवर नहीं जीत पाया था तो उसने रावण पर फिदा होकर अपना यौवन सौंपना चाहा था लेकिन रावण ने उसका आमंत्रण ठुकरा दिया था| बाद में रावण ने दम्यमालिनी से विवाह किया था| रावण के बच्चों के बात करें तो मेघनाद का नाम ही सबसे पहले लिया जाता है, जिसे इंद्रजीत भी कहा जाता है. उसके के बाद अक्षय कुमार उनका दूसरा पुत्र था| ये दोनों ही मंदोदरी के गर्भ से जन्में थे, लेकिन ऐसा नहीं है| रावण की दो और पत्नियों से उनके पांच पुत्र और थे| जिनके बारे में ना तो ज्यादा कहा गया और ना ही ज्यादा सुना गया, रावण की दूसरी पत्नी दम्यमालिनी से अतिक्या और त्रिशिरार नाम के दो पुत्र थे| तीसरी पत्नी से तीन पुत्र थे जिनका नाम प्रहस्था, नरांतका और देवताका, हालांकि ये तीसरी पत्नी से ही हैं इस बात की कोई पुष्टि नही है, लेकिन इन तीनों के रावण के पुत्र होने का वाल्मीकि रामायण में भी उल्लेख है|

अदभुत रामायण के अनुसार कथा प्रचलित अदभुत रामायण में कथा आती है कि एक बार दण्डकारण्य मे गृत्स्मद नामक ब्राह्मण, लक्ष्मी को अपनी पुत्री रूप मे पाने के लिए हर दिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूदें डालता था. एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे रावण वहां पहुंचा और ऋषियों का रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया. कलश को उसने मंदोदरी के संरक्षण मे दे दिया-यह कह कर कि यह तीक्ष्ण विष है,सावधानी से रखे | धरती पुत्री सीता नहीं थी मंदोदरी की पुत्री थी |इसके बाद रावण विहार करने सह्याद्रि पर्वत पर चला गया. रावण की उपेक्षा से दुखी होकर मन्दोदरी ने आत्महत्या की इच्छा से, जहर समझकर उस घड़े में भरा वह रक्त पी लिया. इससे अनजाने में ही मंदोदरी गर्भवती हो गई | उसने सोचा मेरे पति मेरे पास नहीं है| ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा| तो वह क्या सोचेंगे की इस बीच मेरा किसी और पुरुष के साथ संसर्ग हो गया है.| सीता को भूमि में दफना दिया था| ऐसा विचार करते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र आ गई. वहां उसने गर्भ को निकालकर भूमि में दफना दिया. इसके बाद उसने सरस्वती नदी में स्नान किया और लंका वापस लौट गई. धरती में गढ़ा हुआ यही भ्रूण परिपक्व होकर सीता के रूप में प्रकट हुआ, जो हल चलाते समय मिथिला के राजा जनक को प्राप्त हुआ| इस कथा के आधार पर कई विद्वान यह मानते हैं और दावा करते हैं कि सीता और रावण में पिता-पुत्री का संबंध था. हालांकि अन्य भी कई ग्रंथों में कई अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं|

यह उस समय की बात है, जब भगवान शिव से वरदान और शक्तिशाली खड्ग पाने के बाद रावण और भी अधिक अहंकार से भर गया था। वह पृथ्वी से भ्रमण करता हुआ हिमालय के घने जंगलों में जा पहुंचा। वहां उसने एक रूपवती कन्या को तपस्या में लीन देखा। कन्या के रूप-रंग के आगे रावण का राक्षसी रूप जाग उठा और उसने उस कन्या की तपस्या भंग करते हुए उसका परिचय जानना चाहा। काम-वासना से भरे रावण के अचंभित करने वाले प्रश्नों को सुनकर उस कन्या ने अपना परिचय देते हुए रावण से कहा कि ‘हे राक्षसराज, मेरा नाम वेदवती है। मैं परम तेजस्वी महर्षि कुशध्वज की पुत्री हूं। मेरे वयस्क होने पर देवता, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, नाग सभी मुझसे विवाह करना चाहते थे, लेकिन मेरे पिता की इच्छा थी कि समस्त देवताओं के स्वामी श्रीविष्णु ही मेरे पति बनें।’
मेरे पिता की उस इच्छा से क्रुद्ध होकर शंभू नामक दैत्य ने सोते समय मेरे पिता की हत्या कर दी और मेरी माता ने भी पिता के वियोग में उनकी जलती चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। इसी वजह से यहां मैं अपने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए इस तपस्या को कर रही हूं। इतना कहने के बाद उस सुंदरी ने रावण को यह भी कह दिया कि मैं अपने तप के बल पर आपकी गलत इच्छा को जान गई हूं। इतना सुनते ही रावण क्रोध से भर गया और अपने दोनों हाथों से उस कन्या के बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। इससे क्रोधित होकर अपने अपमान की पीड़ा की वजह से वह कन्या दशानन को यह शाप देते हुए अग्नि में समा गई कि मैं तुम्हारे वध के लिए फिर से किसी धर्मात्मा पुरुष की पुत्री के रूप में जन्म लूंगी।  महान ग्रंथों में शामिल दुर्लभ ‘रावण संहिता’ में उल्लेख मिलता है कि दूसरे जन्म में वही तपस्वी कन्या एक सुंदर कमल से उत्पन्न हुई और जिसकी संपूर्ण काया कमल के समान थी। इस जन्म में भी रावण ने फिर से उस कन्या को अपने बल के दम पर प्राप्त करना चाहा और उस कन्या को लेकर वह अपने महल में जा पहुंचा। जहां ज्योतिषियों ने उस कन्या को देखकर रावण को यह कहा कि यदि यह कन्या इस महल में रही तो अवश्य ही आपकी मौत का कारण बनेगी। यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फिंकवा दिया। तब वह कन्या पृथ्वी पर पहुंचकर राजा जनक के हल जोते जाने पर उनकी पुत्री बनकर फिर से प्रकट हुई। मान्यता है कि बिहार स्थिति सीतामढ़ी का पुनौरा गांव वह स्थान है, जहां राजा जनक ने हल चलाया था। शास्त्रों के अनुसार कन्या का यही रूप सीता बनकर रामायण में रावण के वध का कारण बना।

समुद्र के मध्य में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा के द्वारा निर्मित एक विशाल किला था । मय दानव एक निपुण कारीगर था उसने अत्यन्त ही परिश्रम से मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के अनेक महल भी निर्मित कर दिये । नागकुल में रहने की नगरी जो कि पाताल में है उसे भोगावतीपुरी कहते है ,तथा इन्द्र के रहने की स्वर्गलोक की नगरी को अमरावती कहते है उससे भी अधिक सुन्दर और बाँका दुर्ग वाली पुरी का नाम लंका पुरी के नाम से विख्यात हुआ । उसने कुबेर से पुष्पक भी छीन लिया था । रावण को अपनी धन सम्पदा ,पुत्रों बल और राक्षसों के कारण अत्यधिक घमण्डी हो गया था । रावण ने देव , गंधर्व और नागों की अनेक कन्याओं से विवाह किया था किन्तु उसका सर्वाधिक प्रेम मंदोदरी पर ही था । मंदोदरी भी रावण को ह्नदय से चाहती थी और उसे हमेशा सत्यपथ पर चलने के लिये यथा समय निवेदन करती थी । इसका प्रभाव रावण पर यह पड़ा कि वह मंदोदरी की बात को ध्यान से सुनता था । मंदोदरी एक पतिव्रता नारी थी । उसे ज्ञात हो गया था कि भगवान् विष्णु ने संसार के कल्याण हेतु अयोध्या में श्रीराम के रूप में जन्म ले लिया है और पिता की आज्ञा से वन में गमन करते करते राक्षसों से रहित पृथ्वी को करने वाले है । लंका को हनुमानजी भस्म करके गये तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। वे अपने -अपने घरों में बैठकर विचार विमर्श करने लगे कि अब राक्षस कुल की रक्षा कैसे की जाय। जिसके दूत का वर्णन नहीं किया जा सकता है यदि उसके स्वामी लंका में आवेगें तो क्या होगा ? अर्थात लंका के राक्षसों की दयनीय दशा हो जावेगी। इस बात की मन्दोदरी की दूतियों ने उन्हें बतायी । तब मन्दोदरी ने इस प्रकार रावण से कहा -मन्दोदरी विवेकशील महारानी थी उसे पूर्वाभास हो गया था कि श्रीराम से बैर करना ठीक नहीं है । अतः एकान्त में रावण के हाथ जोडकर चरणों में सिर रखकर अत्यन्त ही नीति रस से भरी हुई वाणी से बोली – हे प्रियतम! श्रीहरि से विरोध छोड़ दीजिये । मेरे कहने को अत्यन्त ही हितकर समझकर ह्नदय में धारण कीजिये अर्थात मेरी बात मान लीजिये । आप अपने मंत्री को बुलाकर उसके साथ सीताजी को श्रीराम के पास भेज दीजिये क्योंकि -सीता अपने कुलरूपी कमलों के वन को दुःख देने वाली ठंड (जाड़े) की रात्रि के समान आयी है । हे नाथ ! सीता को दिये अर्थात लौटाये बिना शम्भु (शंकरजी) , ब्रह्माजी भी आपका भला नहीं कर सकते। इसी तरह आपकी कोई भी देवता रक्षा नहीं कर सकता है । श्रीराम के बाण सर्पों के समूह हैं जो राक्षस रूपी मेढ़कों को निगल जावेगें तात्पर्य यह है कि राक्षसों का वंश ही नष्ट हो जावेगा । रावण मंदोदरी की सीख को स्त्री के डरपोक स्वभाव की संज्ञा देकर सभा से चला गया तब मन्दोदरी ने कहा -मन्दोदरी ह्नदय में चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गये हैं । इसके पश्चात् दूसरी बार जब मन्दोदरी ने सुना कि प्रभु (श्रीराम) आये हैं और खेल-खेल ही में उन्होंने समुद्र को बाँध लिया अर्थात सेतुबन्ध बना लिया है तब वह रावण का हाथ पकडकर उसे अपने महल में लाकर अत्यन्त ही मधुर वाणी से कहा -मन्दोदरी ने रावण के चरणों में ऑचल पसारा और कहा हे प्राणप्रिय । कृपया क्रोध छोड़ मेरा वचन सुनिये । हे नाथ ! बैर उसी से करना चाहिये जिससे बुद्धि और बल से जीत हो सकती हो । आप में और श्रीराम में वैसा ही अंतर है जैसे कि जुगनू और सूर्य में अंतर है । मन्दोदरी रावण को श्रीराम के बारे में कहती है – जिन्होंने अत्यन्त बलवान मधु और केटभ राक्षसों को मारा है और शक्तिशाली वीर दितिपुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का नाश किया जिन्होंने दैत्यराज बालि को बाधा और सहस्त्रबाहु को मारा वे ही पृथ्वी का भार हरने के लिये अवतार लेकर आये है । इन सब का उदाहरण देकर मन्दोदरी रावण को यह समझाना चाहती थी कि क्या तुम इन सबसे अधिक शक्तिशाली हो ? अर्थात इनके सामने तुम कुछ भी नहीं हो । अंत में मन्दोदरी रावण से कहती है – हे नाथ (रावण) श्रीरामचन्द्रजी के चरण कमलों में माथा टेककर(नवाकर) उनको श्रीजानकीजी सौंपकर अपने पुत्र (मेघनाथ) को राज्य देकर स्वयं वन में जाकर और श्रीरघुनाथजी का भजन करें । हे नाथ संत ऐसी नीति कहते है कि राजा चौथपन में वन में चला जाय । अंत में नेत्रों में जल भरकर रावण के चरण पकड़कर काँपते शरीर से कहा हे नाथ ! श्री रधुनाथजी को भजो जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय। इतने पर भी रावण न माना ।

श्रीराम द्वारा लंका में अंगद के द्वारा रावण को समझाने हेतु भेजकर कहा कि अंगद शत्रु (रावण) से वही बात करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो ।अंगद एवं रावण संवाद हुआ अंगद ने रावण की सभा में जाने के पूर्व एक पुत्र को मार डाला तथा अंगद के चरण को हटाना तो दूर हिला भी नहीं सका तब वह सन्ध्या के समय महल में उदास होकर गया तब मन्दोदरी ने रावण को समझाया और कहा – हे कंत (स्वामी) मन में समझकर कुबुद्धि त्याग दो । आप श्रीरधुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता । उनके छोटे भाई (लक्ष्मण) ने जरा सी रेखा खींच दी थी उसे भी आप का लाँघ नहीं सके ऐसा तो आपका पुरूषत्व है । इस तरह मन्दोदरी ने अंत में श्रीराम से युद्ध न करने की फटकार लगा दी। रावण पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । रावण ने विभीषण का अपमान किया किन्तु मन्दोदरी का अपमान कहीं नहीं किया क्योंकि मन्दोदरी की बात विवेकपूर्ण , नीतिसंगत हमेशा ही रही । अनेक बार रावण को मन्दोदरी ने समझाया पर रावण को अपने धन-बल का अहंकार था अतः वह मन्दोदरी की बात को समझ नहीं सका । तब मंदोदरी ने यहाँ तक रावण को कहा  हे स्वामी ! उन्हें (श्रीरामको) आप बार-बार मनुष्य कहते हैं आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझा ढो रहे हो । हाँ प्रियतम ! आपने श्रीराम का विरोध कर लिया और काल (मृत्यु) के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी ज्ञान अंकुरित क्यों नहीं हो रहा है । काल दण्ड (लाठी) लेकर किसी को नहीं मारता है। वह घर्म, बल,बुद्धि और विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल (मृत्यु का समय) निकट आ जाता है उसे आपके समान ही भ्रम हो जाता है । हे स्वामी आपके दो पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए और नगरी (लंका) भस्म हो गई जो हुआ सो हुआ हे प्रियतम! अब भी इस भूल की पूर्ति (समाप्ति)कर दीजिये । श्रीरामजी से बैर त्याग दीजिये । हे नाथ ! कृपा के समूद्र श्रीरधूनाथजी को भजकर निर्मल यश लीजिये । अंत में रावण श्रीराम के द्वारा मारा गया उसको उसके दुष्कर्म का फल प्राप्त हुआ । मन्दोदरी इस दुःखद धटना के समय रावण के समीप जाकर विलाप करने लगी। उस समय भी उसको श्रीराम पर पूर्ण विश्वास था कि दयामय श्रीराम उसके पति को दुर्लभ धाम भेजकर उसका हित ही करेंगे। अहह! नाथ ! श्रीरधुनाथजी के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं है जिन भगवान् ने तुमको (रावण को) वह गति जो जोगी समाज को दुर्लभ है । मन्दोदरी भले ही राक्षसजाति की थी किन्तु एक आदर्श -विवेकशील, न्यायप्रिय, राजा की रानी के साथ ही साथ पतिव्रता भी थी । रावण की गति मति तथा शक्ति का धमण्ड अंत तक काल के वश होने के कारण सुधार नहीं सकी|

यह भी कहते हैं कि भगवान शिव के वरदान के कारण ही मंदोदरी का विवाह रावण से हुआ था। मंदोदरी ने भगवान शंकर से वरदान मांगा था कि उनका पति धरती पर सबसे विद्वान ओर शक्तिशाली हो। मंदोदरी श्री बिल्वेश्वर नाथ मंदिर में भगवान शिव की आराधना की थी, यह मंदिर मेरठ के सदर इलाके में है जहां रावण और मंदोदरी की मुलाकात हुई थी। रावण की कई रानियां थी, लेकिन लंका की रानी सिर्फ मंदोदरी को ही माना जाता था। मंदोदरी अपने पति द्वारा किए गए बुरे कार्यों से अच्छी तरह परिचित थी, वह हमेशा रावण को यही सलाह देती थी कि बुराई के मार्ग को त्याग कर सत्य की शरण में आ जाए, लेकिन अपनी ताकत पर घमंड करने वाले रावण ने कभी मंदोदरी की बात को गंभीरता से नहीं लिया। जब रावण सीता का हरण करके लाया था तब भी मंदोदरी ने इसका विरोध कर सीता को पुन: राम को सौंपने का कहा था। लेकिन रावण ने मंदोदरी की एक नहीं सुनी और रावण का राम के साथ भयंकर युद्ध हुआ। ऐसा माना जाता है कि राम-रावण के युद्ध एक मात्र विभिषण को छोड़कर उसके पूरे कुल का नाश हो गया था। रावण की मृत्यु के पश्चात रावण के कुल के विभिषण और कुल की कुछ महिलाएं ही जिंदा बची थी। युद्ध के पश्चात मंदोदरी भी युद्ध भूमि पर गई और वहां अपने पति, पुत्रों और अन्य संबंधियों का शव देखकर अत्यंत दुखी हुई। फिर उन्होंने प्रभु श्री राम की ओर देखा जो आलौकिक आभा से युक्त दिखाई दे रहे थे। श्रीराम ने लंका के सुखद भविष्य हेतु विभीषण को राजपाट सौंप दिया। अद्भुत रामायण के  अनुसार विभीषण के राज्याभिषेक के बाद प्रभु श्रीराम ने बहुत ही विनम्रता से मंदोदरी के समक्ष विभीषण से विवाह करने का प्रस्ताव रखा, साथ ही उन्होंने मंदोदरी को यह भी याद दिलाया कि वह अभी लंका की महारानी और अत्यंत बलशाली रावण की विधवा हैं। कहते हैं कि उस वक्त तो उन्होंने इस प्रस्ताव पर कोई उत्तर नहीं दिया। जब प्रभु श्रीराम अपनी पत्नीं सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वापस अयोध्या लौट गए तब पीछे से मंदोदरी ने खुद को महल में कैद कर लिया और बाहर की दुनिया से अपना संपर्क खत्म कर लिया। कुछ समय बाद वह पुन: अपने महल से निकली और विभीषण से विवाह करने के लिए तैयार हो गई। लेकिन मंदोदरी के बारे में इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि मंदोदरी एक सती स्त्री थी जो अपने पति के प्रति समर्पण का भाव रखती थी ऐसे में मंदोदरी का विभिषण से विवाह करना अपने आप में हैरान करने वाली घटना है। कृतिवासी रामायण के अनुसार जब सीता राम से मिलने चली तो मंदोदरी ने श्री राम को शाप दिया कि तुम्हार आनंद निरा आनंद में बादल जायेगा इस बात में संशय लगता है हो सकता है इसमें कवी ने राम को अग्नि परीक्षा से श्री राम को दोष मुक्त करने हेतु लिखा हो|

रावण की मंदोदरी से अति प्रेम करता था। लेकिन रामचरित मानस के अनुसार जब रावण ने सीता का हरण कर लिया तब उसके बाद श्रीराम वानर सेना सहित समुद्र पार करके लंका पहुंच गए थे, तब मंदोदरी डर गई और उसने रावण के पास जा कर बोला कि आप युद्ध ना करें और सीता को वापस उनके पति श्रीराम के हवाले कर दें और उनसे क्षमा मांग लें। यह सुनने के बाद रावण अपी पत्‍नी पर हंसा और महिलाओं के आठ अवगुणों को सुनाने लगा। आइये जानते हैं कि रावण ने स्त्रियों के कौन से 8 अवगुण बताए थे… पहला अवगुण है, महिला में बहुत ज्‍यादा साहस होना। इसके चलते वो कई बार उस जगह पर साहस का प्रदर्शन कर देती हैं, जहां उन्‍हें नहीं करना चाहिये। इससे उन्‍हें और उनके परिवार वालों को बाद में पछताना पड़ता है। साहस को दु:साहस नहीं बनाना चाहिये। दूसरा अवगुण है, उनकी निरंतर झूठ बोलने की आदत। रावण ने कहा था कि महिलाएं बात बात पर झूंठ बोलती हैं, लेकिन उन्‍हें नहीं पता कि झूंठ ज्‍यादा दिनों तक छुप नहीं पाता। वे काफी चंचल होती हैं। उनका मन बार बार बदलता रहता है और उनके मन की बात को समझना काफी मुश्‍किल होता है। वे कई बार दूसरों के खिलाफ साजिश भी रचती हैं ताकि परिस्थिति उनके अनुकूल हो। अपना काम सिद्ध कराने के लिए महिलाएं क्या-क्या करती हैं, इसकी भी चर्चा की है रावण ने। हांलाकि वो एक ओर तो साहसी होती हैं मगर वे उतनी ही जल्‍दी घबरा भी जाती हैं। अगर उन्‍हें लगता है कि काम उनके मुताबिक नहीं हो रहा है तो, वह बदलाव देख डर जाती हैं। महिलाएं थोड़ी मूर्ख भी होती हैं। वे बिना सोचे समझे फैसला कर लेती हैं और बड़ी समस्या में पड़ जाती हैं और इसका एहसास उन्‍हें बड़ी देर से होता है। उनका निर्दयी होना… स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले दयालु माना जाता है, लेकिन रावण के अनुसार स्त्रियां निर्दयी होती है। वे अगर कभी दया का भाव छोड़ दे यानि निर्दयी हो जाए तो कभी भी दया नहीं दिखाती। महिलाएं देखने में चाहे कितनी भी सुंदर हों, खूबसूरत गहने और साड़ी पहने, लेकिन वह साफ-सफाई का ध्‍यान नहीं रखती। इस कारण से रावण ने महिलाओं को अपवित्र कहा था।

कहा जाता है कि श्री लंका में एक विष्णु भक्त चन्द्रविजय जी का सोलह सदस्यों का पुण्य परिवार रहता था। वह भाट जाति में उत्पन्न पुण्यकर्मी प्राणी थे। भक्त चन्द्रविजय जी की पत्नी भक्तमति कर्मवती लंका के राजा रावण की रानी मन्दोदरी के पास नौकरी (सेवा) करती थी। रानी मंदोदरी को हँसी-मजाक अच्छे-मंदे चुटकुले सुना कर उसका मनोरंजन कराया करती थी। भक्त चन्द्रविजय राजा रावण के पास दरबार में नौकरी करता था। राजा की बड़ाई के गाने सुना कर प्रसन्न करता था। भक्त चन्द्रविजय की पत्नी भक्तमति कर्मवती परमेश्वर से उपदेश प्राप्त करने के उपरान्त रानी मंदोदरी को प्रभु चर्चा जो सृष्टी रचना अपने सतगुरुदेव मुनिन्द्र जी से सुनी थी प्रतिदिन सुनाने लगी। भक्तमति मंदोदरी रानी को अति आनन्द आने लगा। कई-कई घण्टों तक प्रभु की सत कथा को भक्तमति कर्मवती सुनाती रहती तथा मंदोदरी की आँखों से आंसु बहते रहते। एक दिन रानी मंदोदरी ने कर्मवती से पूछा आपने यह ज्ञान किससे सुना? आप तो बहुत अनाप-शनाप बातें किया करती थी। इतना बदलाव परमात्मा तुल्य संत बिना नहीं हो सकता। तब कर्मवती ने बताया कि हमने एक परम संत से अभी-अभी उपदेश लिया है। रानी मंदोदरी ने संत के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त करते हुए कहा, आप के गुरु अब की बार आयें तो उन्हें हमारे घर बुला कर लाना। अपनी मालकिन का आदेश प्राप्त करके शीश झुकाकर सत्कार पूर्वक कहा कि जो आप की आज्ञा, आप की नौकरानी वही करेगी। मेरी एक विनती है कहते हैं कि संत को आदेश पूर्वक नहीं बुलाना चाहिए। स्वयं जा कर दर्शन करना श्रेयकर होता है और जैसे आप की आज्ञा वैसा ही होगा। महारानी मंदोदरी ने कहा कि अब के आपके गुरुदेव जी आयें तो मुझे बताना मैं स्वयं दर्शन करूंगी। परमेश्वर ने फिर श्री लंका में कृपा की। मंदोदरी रानी ने उपदेश प्राप्त किया। कुछ समय उपरान्त अपने प्रिय देवर श्री भक्त विभीषण जी को उपदेश दिलाया। भक्तमति मंदोदरी उपदेश प्राप्त करके अहर्निश प्रभु स्मरण में लीन रहने लगी। अपने पति रावण को भी सतगुरु मुनिन्द्र जी से उपदेश प्राप्त करने की कई बार प्रार्थना की परन्तु रावण नहीं माना तथा कहा करता था कि मैंने परम शक्ति महेश्वर मृत्युंज्य शिव जी की भक्ति की है। इसके तुल्य कोई शक्ति नहीं है। आपको किसी ने बहका लिया है।

कुछ ही समय उपरान्त वनवास प्राप्त श्री सीता जी का अपहरण करके रावण ने अपने नौ लखा बाग में कैद कर लिया। भक्तमति मंदोदरी के बार-बार प्रार्थना करने से भी रावण ने माता सीता जी को वापिस छोड़ कर आना स्वीकार नहीं किया। तब भक्तमति मंदोदरी जी ने अपने गुरुदेव मुनिन्द्र जी से कहा महाराज जी, मेरे पति ने किसी की औरत का अपहरण कर लिया है। मुझ से सहन नहीं हो रहा है। वह उसे वापिस छोड़ कर आना किसी कीमत पर भी स्वीकार नहीं कर रहा है। आप दया करो मेरे प्रभु। आज तक जीवन में मैंने ऐसा दुःख नहीं देखा था। सतगुरु मुनिन्द्र जी ने कहा कि बेटी मंदोदरी यह औरत कोई आम स्त्री नहीं है। श्री विष्णु जी को शापवश पृथ्वी पर आना पड़ा है, वे श्री राजा दशरथ के पुत्रा रामचन्द्र अयोध्यावासी हैं। इनको 14 वर्ष का वनवास प्राप्त है तथा लक्ष्मी जी स्वयं सीता रूप बनाकर इनकी पत्नी रूप में वनवास में थी। उसे रावण एक साधु वेश बना कर धोखा देकर उठा लाया है। यह स्वयं लक्ष्मी ही सीता जी है। इसे शीघ्र वापिस करके क्षमा याचना करके अपने जीवन की भिक्षा याचना रावण करें तो इसी में इसका शुभ है। भक्तमति मंदोदरी के अनेकों बार प्रार्थना करने से रावण नहीं माना तथा कहा कि वे दो मस्करे जंगल में घूमने वाले मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं। मेरे पास अनगिनत सेना है। मेरे एक लाख पुत्रा तथा सवा लाख नाती हैं। मेरे पुत्रा मेघनाद ने स्वर्ग राज इन्द्र को पराजित किया और शेषनाग की पुत्री से विवाह कर रखा है। तेतीस करोड़ देवताओं को आपने कैद कर रखा है। तू मुझे उन दो बेसहारा फिर रहे बनवासियों को भगवान बता कर डराना चाहती है। इस स्त्री को वापिस नहीं करूंगा। मंदोदरी ने भक्ति मार्ग का ज्ञान जो अपने पूज्य गुरुदेव से सुना था, रावण को बहुत समझाया। विभीषण ने भी अपने बड़े भाई को समझाया। रावण ने अपने भाई विभीषण को पीटा तथा कहा कि तू ज्यादा श्री रामचन्द्र का पक्षपात कर रहा है, उसी के पास चला जा।

एक दिन भक्तमति मंदोदरी ने अपने पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना की कि हे गुरुदेव मेरा सुहाग उजड़ रहा है। एक बार आप भी मेरे पति को समझा दो। यदि वह आप की बात को नहीं मानेगा तो मुझे विधवा होने का दुःख नहीं होगा।अपनी बेटी मंदोदरी की प्रार्थना स्वीकार करके राजा रावण के दरबार के समक्ष खड़े होकर द्वारपालों से राजा रावण से मिलने की प्रार्थना की। द्वारपालों ने कहा ऋषि जी इस समय हमारे राजा जी अपना दरबार लगाए हुए हैं। इस समय अन्दर का संदेश बाहर आ सकता है, बाहर का संदेश अन्दर नहीं जा सकता। हम विवश हैं। तब पूर्ण प्रभु अंतध्र्यान हुए तथा राजा रावण के दरबार में प्रकट हो गए। रावण की दृष्टि ऋषि पर गई तो गरज कर पूछा कि इस ऋषि को मेरी आज्ञा बिना किसने अन्दर आने दिया है। उसे लाकर मेरे सामने कत्ल कर दो। तब परमेश्वर ने कहा राजन आप के द्वारपालों ने स्पष्ट मना किया था। उन्हें पता नहीं कि मैं कैसे अन्दर आ गया। रावण ने पूछा कि तू अन्दर कैसे आया? तब पूर्ण प्रभु मुनिन्द्र वेश में अदृश होकर पुनर् प्रकट हो गए तथा कहा कि मैं ऐसे आ गया। रावण ने पूछा कि आने का कारण बताओ। तब प्रभु ने कहा कि आप योद्धा हो कर एक अबला का अपहरण कर लाए हो। यह आप की शान व शूरवीरता के विपरीत है। यह कोई आम औरत नहीं है। यह स्वयं लक्ष्मी जी अवतार है। श्री रामचन्द्र जी जो इसके पति हैं वे स्वयं विष्णु हैं। इसे वापिस करके अपने जीवन की भिक्षा मांगों। इसी में आप का श्रेय है। इतना सुन कर तमोगुण (भगवान शिव) का उपासक रावण क्रोधित होकर नंगी तलवार लेकर सिंहासन से दहाड़ता हुआ कूदा तथा उस नादान प्राणी ने तलवार के अंधा धुंध सत्तर वार ऋषि जी को मारने के लिए किए। परमेश्वर मुनिन्द्र जी ने एक झाडू की सींक हाथ में पकड़ी हुई थी उसको ढाल की तरह आगे कर दिया। रावण के सत्तर वार उस नाजुक सींक पर लगे। एैसे आवाज हुई जैसे लोहे के खम्बे (पीलर) पर तलवार लग रही हो। सिंक टस से मस नहीं हुई। रावण को पसीने आ गए। फिर भी अपने अहंकारवश नहीं माना। यह तो जान लिया कि यह कोई आम ऋषि नहीं है। कहा कि मैंने आप की एक भी बात नहीं सुननी, आप जा सकते हैं। परमेश्वर अंतरध्यान हो गए तथा मंदोदरी को सर्व वृतान्त सुनाकर प्रस्थान किया रानी मंदोदरी ने कहा गुरुदेव अब मुझे विधवा होने में कोई कष्ट नहीं होगा। श्री रामचन्द्र व रावण का युद्ध हुआ। रावण का वध हुआ। जिस लंका के राज्य को रावण ने तमोगुण भगवान शिव की कठिन साधना करके, दस बार शीश न्यौछावर करके प्राप्त किया था वह क्षणिक सुख भी रावण का चला गया तथा नरक का भागी हुआ। इसके विपरीत पूर्ण परमात्मा के सतनाम साधक विभीषण को बिना कठिन साधना किए पूर्ण प्रभु की कृपा से लंकादेश का राज्य भी प्राप्त हुआ। हजारों वर्षों तक विभीषण ने लंका का राज्य का सुख भोगा तथा प्रभु कृपा से राज्य में पूर्ण शान्ति रही। सभी राक्षस वृति के व्यक्ति विनाश को प्राप्त हो चुके थे। भक्तमति मंदोदरी तथा भक्त विभीषण तथा परम भक्त चन्द्रविजय जी के परिवार के पूरे सोलह सदस्य तथा अन्य जिन्होंने पूर्ण परमेश्वर का उपदेश प्राप्त करके आजीवन मर्यादावत् सतभक्ति की वे सर्व साधक यहाँ पृथ्वी पर भी सुखी रहे तथा अन्त समय में परमेश्वर के विमान में बैठ कर सतलोक (शाश्वतम् स्थानम्) में चले गए।

पवित्र गीता अध्याय 7 मंत्र 12 से 15 में कहा है कि तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की साधना से मिलने वाली क्षणिक सुविधाओं के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे राक्षस स्वभाव वाले, मनुष्यों में नीच, दुष्कर्म करने वाले मूर्ख मुझ (काल-ब्रह्म) को भी नहीं भजते। गीता अध्याय 7 मंत्र 18 में गीता बोलने वाला (काल-ब्रह्म) प्रभु कह रहा है कि कोई एक उदार आत्मा मेरी (ब्रह्म की) ही साधना करता है क्योंकि उनको तत्वदर्शी संत नहंी मिला। वे भी नेक आत्माऐं मेरी (अनुत्तमाम्) अति अश्रेष्ठ (गतिम्) मुक्ति की स्थिति में आश्रित रह गए। वे भी पूर्ण मुक्त नहीं हैं। इसलिए पवित्रा गीता अध्याय 18 मंत्र 62 में कहा है कि हे अर्जुन तू सर्व भाव से उस परमेश्वर (पूर्ण परमात्मा तत् ब्रह्म) की शरण में जा। उसकी कृपा से ही तू परम शान्ति तथा सतलोक अर्थात् सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।

हालांकि रामायण से इतर की रामायण में ऐसे ही कई अजीब किस्से हैं। यह भी सोचने में आता है कि कुछ समाजों में प्राचीन काल में ऐसा ही प्रचलन था। सुग्रीव ने भी बालि के मारे जाने के बाद उसकी पत्नीं से विवाह कर लिया था।  कृतिवासी रामायण (बंगला) के अनुसार ही ब्रह्मा जी ने रावण को एक बाण देते हुए कहा था कि इसी बाण से तुम्हारी मृत्यु होगी इसलिए रावण ने मंदोदरी के साथ मिलकर उस बाण को एक स्तम्भ में चिनवा दिया था और युद्ध के समय हनुमान ने भेष बदल कर उसी बाण को मंदोदरी से प्राप्त कर श्री राम को दे दिया उसी बाण से रावण की मृत्युं हुई थी| कहते है कि जब एक बार श्री राम ने भूलवस् मंदोदरी को सीता समझ कर सौभाग्यवती होने का वरदान दे दिया जब उन्हें समझ आया कि उनसे गलती हो गई तब उन्होंने मंदोदरी को रावण की चिता जलाये रखने के लिए कहा जिससे उसका सुहाग सदा बना रहे शायद इसी वजह से हर वर्ष रावण दहन किया जाता है|  कम्ब रामायण के अनुसार कौशल्या सुमित्रा कैकेयी और तारा आदि में किसी का भी पातिव्रत धर्म मंदोदरी के पातिव्रत धर्म के समता में कहीं नहीं टिकता था कम्ब कहते है कि रावण के मृत शरीर पर विलाप करते हुए मंदोदरी के प्राण पखेरू उड़ गये थे और विभीषण ने रावण और मंदोदरी के पार्थिव शरीर को एक साथ मुखाग्नि दी थी|

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