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"यात्रा माता श्री मनसा देवी जी की"

Posted On: 11 Apr, 2011 Others में

RAJ KAMAL - कांतिलाल गोडबोले फ्राम किशनगंजसोचो ज़रा हट के

Rajkamal Sharma

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सबसे पहले तो मैं आप सभी से उस सफेद झूठ की माफ़ी माँगना चाहता हूँ जोकि मैंने पिछली बार आपसे अपने लेख “यात्रा माता श्री नयना देवी जी की”  की समाप्ति के समय पर बोला था की वापसी में हमारे साथ कोई भी खास घटना नहीं हुई थी ….. दरअसल मेरे मन में अपने ग्रहनगर से चलने से पहले ही माता नयना देवी जी के साथ-साथ  माता मनसा देवी जी के दर्शनों की भी तीव्र इच्छा थी , उसी के कारण मैंने गाड़ी के खुराक मंत्री को कुछ  ज्यादा ही खाना खिला दिया था , ताकि वोह हम सभी को आसानी से माता नयना देवी जी की यात्रा  के बाद माता मनसा देवी जी के दर्शनों को ले जा सके ….

हमने चूँकि अपने बिगबास से इस एक्स्ट्रा टूअर की इजाजत नहीं ली थी , इसलिए जहां पर सभी के मन में दर्शन करने जाने की खुशी थी वहीं पर सभी के मन में एक अनजाना सा डर भी था ….. हमने जीरकपुर वाली सड़क पर यह सोच कर गाड़ी डाल ली की रास्ते में जो भी पहला पब्लिक बूथ मिलेगा वहीं  पर से फोन करकर बिगबॉस से इजाजत ले लेंगे ….. वोह कहते है ना की जहां पर चाह होती है वहीं पर राह भी हुआ करती है …..  माता रानी की की उस दिन कुछ ऐसी किरपा हुई की सभी पब्लिक बुथो का उस दिन भट्ठा बैठा हुआ था …… तो उनकी यह तकनीकी खराबी हमको बहुत ही रास आ गई ….. जब हम जीरकपुर के पास पहुँच गए तभी इत्तेफाक से हमारी बात अपने बिगबास से हो गई ….. जब उनको पता चला की हम लोग जीरकपुर तक पहुँच गए है तो वोह बोले की “अब यहाँ से माता मनसा देवी रह ही कितनी दूर गई है , अब जब इतने पास पहुँच ही गए हो तो माता रानी के दर्शन करके ही आओ” ……

हम लोग जब मंदिर के पास में पहुंचे तो देखा की रास्ते में दोनों तरफ प्रशाद की बड़ी -२ दुकाने सजी हुई थी , और हरेक दूकान की साइड में जूते रखने की अलग से व्यवस्था कर रखी थी ….. हमने बड़े ही मजे से अपने जूते उनके अस्थाई जुताघर में रख  दिए , लेकिन जब हम चलने को हुए तो इस बात पर उनसे मेरी तकरार बाजी हो गई , जब वोह प्रशाद उन्ही की दूकान से लेने पर जोर देने लग गए …. बात चाहे उनकी किसी हद तक ठीक थी लेकिन तरीका गलत होने के कारण तथा अपना अख्खड़ स्वभाव होने कि वजह से  मैंने उनसे प्रशाद नही लिया , और  मेरा अनुसरण करते हुए सभी ने दूसरी दुकानों से प्रशाद ले लिया  …. नवरात्रों के कारण मंदिर के अंदर और बाहर में तिल रखने की भी जगह नहीं थी …… खैर किसी तरह लाइन में लगकर पूरे चार घंटो के बाद हम लोगों का नम्बर आया तो हमने माता रानी के दर्शन करके खुद को बेहद खुश किस्मत समझा …… जब हम बाहर निकले तो देखा माता रानी के भवन के पीछे लंगर भवन के बिकुल सामने वी.आई पी. लोगों को पीछे के रास्ते से दर्शनों के लिए शार्टकट रास्ते से भेजा जा रहा था …..  मुझको गुस्सा तो बहुत आया , उसी के वशीभूत होकर मैंने अनजान बनते हुए डयूटी पर तैनात पुलिस वालो से पूछा कि  “अच्छा ! तो इधर से लोग क्या करने और किधर को जा रहे है ? ….. आगे वोह भी मेरी ही ‘नस्ल’ का निकला उसने मुझको कहा कि  “सामने हमारे साहब खड़े है उन्ही  से पूछ लो , वोही तुमको बतलायेंगे ….. मैंने भी दिदादिलेरी दिखाते हुए उसके पास जाकर अपना प्रश्न इस शिकायत के साथ दोहराया की मैंने आपसे जवान से एक छोटी सी बात पूछी थी और उसने मुझे आपके पास भेज दिया … हम लोग इस रास्ते से माता रानी के दर्शन क्यों नही कर सकते है , जबकि दूसरे लोग भी तो इसी रास्ते से जा रहे है ….. तब उसने समझदारी दिखाते हुए मुझ अनाड़ी को सुरक्षा का वास्ता देते हुए सारा माज़रा तफसील से समझाया , और उसकी बातों को समझने की एक्टिंग करते हुए मैंने उसको धन्यवाद देते हुए उससे छुटकारा पाया ….

हम लोग लंगर खाने की सोच ही रहे थे की इतनी देर में ही  ठेकेदार का  फोन आ गया कि  जल्दी से वापिस आ जाओ (सभी के फोन मैंने बन्द करवा दिए थे लेकिन फिर भी एक गद्दार ने आफिस फोन कर दिया था) …. सभी कहने लगे की अब दर्शन तो कर ही लिए है , खाने का क्या है रास्ते में खा लेंगे , यह कहते हुए वापसी की तैयारी कर ली …. लेकिन मैंने कहा की तुम लोगों को जाना है तो जाओ लेकिन मैं तो रात बिता कर और अपनी पूरी हाजरी लगवा कर ही सुबह को आऊंगा ….. मुझको छोड़ कर सभी चले गए तो मुझको बहुत ही अजीब सा लग रहा था , लेकिन मन में दार्शनिक विचार भी  उमड़- घुमड़ कर आ रहे थे की बेटा राजकमल आखरी समय भी तो तू  अकेला ही होगा , वहां पर गुरु के इलावा उस समय कौन तेरा साथ देगा …. इसलिए हिम्मत से काम लेकर मैं रात के दो बजे तक बाहर जगमगाते हुए बाजार में माता रानी की जयजयकार मन ही मन में करते हुए घूमता रहा …. और उसके बाद उपर माता रानी के भवन के बाहर जो बड़ा सारा पार्क बना हुआ है उसमे जाकर सो गया …..

सुबह मैंने चार बजे उठने पर वी.आई.पी. गेट के सामने वाले लंगर भवन के प्रवेशद्वार के नीचे की तरफ बने गुसलखाने में नहा धोकर मातारानी के भवन में दुबारा से माथा टेका ….. दर्शन चाहे मुझको सात बजे के करीब दुबारा से हो गए थे लेकिन रात को रहने के कारण मन में माता रानी के प्रति कुछ अजीब से अपनत्व वाले भाव जग गए थे ….. बस ऐसा लग रग था की माता रानी मेरे सामने प्रकट हो ही जाए ….. ऐसा लग रहा था की माता रानी शायद मुझ पर प्रसन्न हो गई थी , बस उसके बाद तो उनकी लीला शुरू हो गई …. जब मैं माता रानी के भवन के दूसरी तरफ बने लंगर भवन (जहां पर बुकिंग वाला लंगर चलता है)  से थोड़ा उपर जाकर बने हुए एक तीसरे लंगर भवन में पहुंचा तो वहां पर ब्रैड और चाय का लंगर परौसा जा रहा था ….. हमे थोड़ी देर इंतज़ार करने को कहा  गया , तभी मेरी नज़र उसमे बने माता के आलिशान शिसाबंद + आदमकद भवन पर ठहर कर रह गई ….. मूर्ति से आँखे मिलते ही लगा की जैसे वोह मुझको अपनी तरफ बुला रही है और मैं बस एक चुम्बक की तरह उनकी तरफ खींचता चला गया ….. मैंने उस भवन में माता रानी के + उनकी जोत के जी भर के इतने नजदीक से दर्शन किये की प्यासी रूह को करार आ गया …. इस तरह मुझको माता रानी के असली दर्शन उनके भवन में नहीं बल्कि लंगर भवन में स्थापित उनकी मूर्ति में हुए ……

और वापसी में मैंने जहां पर जूते रखे थे उसी से बांटने  के लिए प्रशाद लिया , अब तक उसका भी मूड और व्यवहार दोनों ही ठीक हो चके थे तथा माता रानी के दर्शन करके मेरा मिजाज भी बागोबाग हुआ पड़ा था ….. तो इस तरह मैं बुद्दू माता रानी के दर्शन करके लौट के घर को आया ……

बोलो माता मनसा देवी जी की  जय

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