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( “जिन्न की शादी – भाग प्रथम” –रहस्य –रोमांच विशेष” )

Posted On: 13 Dec, 2011 Others में

RAJ KAMAL - कांतिलाल गोडबोले फ्राम किशनगंजसोचो ज़रा हट के

Rajkamal Sharma

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                     मेरा गाँव प्रागपुर जालंधर छावनी से एक किलोमीटर की दुरी पर था और वहां से नंगलपुर गांव की दुरी आधा किलोमीटर थी …. मेरे गाँव और नंगलपुर के बीच की इस दूरी के बारे में मशहूर था कि रास्ते में कम से कम तीन जगहों पर चुड़ैलो का बसेरा था …. अगर कोई रात के समय सफर करे तो पीछे से चुड़ैलें आवाजें देकर उसे बुलाती थी और जब कोई शख्स मुड़कर देख लेता था तो फिर उनके जादू से बच नहीं सकता था …..

                         अब पता नहीं वह मेरा वहम था या हकीकत थी कि मेरा  वास्ता दो-तीन बार रात को सफर के दौरान उन आवाजों से पड़ा मगर मैंने वालिदैन कि हिदायत के मुताबिक पीछे मुड़कर नहीं देखा ….. शायद यही वजह थी कि जिन्नों, भूतों और प्रेतों के मामले में मेरा खौफ किसी हद तक कम हो गया था ….

                                     चुड़ैलो के बसेरों के अतिरिक्त भी मेरे गांव के पीछे की तरफ एक और जगह थी जो की प्रेतग्रस्त कहलाती थी …. वहां पर खेतों के बीच बेरी का एक पेड़ था जिसके पास ही हम गांव के लड़के कबड्डी- कबड्डी   खेला करते थे …. लोगों को उस पेड़ से दूर रखने के लिए मिटटी की एक दिवार सी बना दी गई थी …. फिर भी हम बच्चों ने उसके एक कोने से दिवार को तोड़कर रास्ता  बना लिया था ….

                                     एक बार कबड्डी खेलने के दौरान मेरी नजर अचानक ही उस मिटटी में एक सुराख पर पड़ी जिसमे से की भिड़े (ततैया ) अंदर –बाहर आ और जा रही थी …. मैंने  अपनी उस कम उम्र की कमअक्ली के वश में होकर एक ढेला उठाकर उस सुराख के उपर दे मारा …. ढेला लगने से चार –पांच भिड़े ‘मौका- ए- वारदात’ पर तुरंत ही अल्लाताला  को प्यारी ही गई जबकि  कुछेक ‘भाग्यशाली’ जख्मी भी हो गई थी …. उस शरारत को करने के बाद इस हैरतअंगेज मंजर को मैं बड़ी ही हैरानी और उत्सुकता से देख ही रहा था की मुझको ऐसा महसूस हुआ की जैसे किसी ने मेरे श्री मुख पर एक जोरदार चांटा (शरद पवार कि तरह ) रसीद कर  दिया हो और मैं उसी जगह पर गिर कर बेहोश हो गया …..

                    वहां पर मौजूद सभी कबड्डी खेलने वाले लड़के मुझको बेहोश देख कर परेशान हो गए और तुरन्त ही उन्होंने मुझको उठा कर घर पर पहुंचा दिया  …. वालिदा और दीदी मुझको बेहोश देख कर घबरा गई और रौना पीटना शुरू कर दिया …. जब उन्होंने मुझको लाने वाले लड़को से  सारा माजरा सुना तो तुरंत गांव के एक ओझा को बुलवाया ….. उसके इलाज रूपी कोशिशों से काफी देर के बाद मुझको होश आया ….. उसने मेरे घरवालो को बतलाया की वोह भिड़े दरअसल में जिन्न थे जोकि उस समय शादी के जलसे में भाग ले रहे थे …. इस बच्चे ने जो ढेला मारा था उससे लगने से एक ही खानदान का प्रमुख जिन्न + उसकी दो बेटियां और एक जवान बेटा मारे गए थे ….. उसकी बीवी इस हमले के दौरान जख्मी हो गई थी जबकि उसकी एक बेटी जोकि अंदर प्रवेश कर चुकी थी , वोह बच गई थी …. उसी ने इस बच्चे को मारने की कोशिश की थी लेकिन अच्छी किस्मत के बलबूते यह बच गया …..

                                      उस ओझा ने लगातार सात  दिन तक आकर के मेरा इलाज किया और फिर मेरे बाजू पर एक काला  धागा इस चेतावनी के साथ बाँध दिया की यह टूटने न पाए …. इसी दौरान मुल्क का बंटवारा हो गया तो हम लोग पकिस्तान में  सक्खर चले गए …. सक्खर में दो साल के बाद पांचवी कक्षा में दाखिले के बाद पढ़ाई से मन बेजार होने के कारण वालिद साहिब ने मुझको  एक ओवरसियर के साथ हैल्पर लगा दिया था ….. एक दिन घर से निकलते समय दरवाजे में लगी हुई कील से बाजू जख्मी होने के साथ -२ वोह पवित्र धागा भी टूट गया …. मुझको इसका पता तब चला जब किसी ने आकर मेरे गाल पर एक जोरदार झन्नाटेदार थप्पड़ मारा और मेरा गला दबाया  …. मैं चीख मारकर बेहोश हो गया ….. यह मेरी खुशकिस्मती थी कि हमारी मस्जिद के मौलवी साहिब नजदीक ही रहते थे …. लिहाजा , मेरे बेहोश होने के बाद मेरा जख्मी बाजू तथा “टूटा हुआ धागा” देखने के बाद मेरी दादी अम्मा अस्मा ने  मौलवी साहिब को बुला भेजा …. मौलवी साहिब ने आकर एक तावीज पहनने के लिए दिया और ताकीद की कि “उसे हमेशा पहने रहना , वर्ना वह जिन्नी तुम्हे जिंदा नहीं छोड़ेगी ….. इसके इलावा उन्होंने यह भी कहा कि मेरा इल्म सिर्फ इतना ही है ….. मैंने तुम्हे उससे महफूज कर दिया है …. मगर तुम किसी बड़े आमिल (तांत्रिक ) के पास जरूर चले जाना” ….

             इस घटना के कुछ अरसे के बाद  मैंने खराद का काम सीखना शुरू कर दिया था ….   एक रोज मेरे वालिद को उनके ओवरसियर ने एक अंग्रेज साहिब की गाड़ी को ठीक करने के लिए उनके बंगले में भेजा, जोकि वहां से कुछ फासले पर कालोनी में बना हुआ था …. मेरे वालिद साहिब ने वहां जाते हुए कहा , बेटा,  छुटटी करके वहीँ पर आ जाना  ….. हम वहीं से इक्कट्ठे ही अपने घर को चलेंगे ….. मैं दोपहर के तीन बजे के करीब अपनी साइकल से वहां पर पहुँच गया ….. उस बंगले में अंग्रेज साहिब अपनी बीवी और बेटी के साथ रहते थे ….. जब मैं वहां पर पहुंचा तो वह लड़की वहां पर झूला झूल रही थी और मेरे वालिद साहिब गैराज में मोटर को ठीक कर रहे थे ….. मैं ख़ामोशी से वालिद साहिब के पास जाकर खड़ा हो गया …. जब उस लड़की ने मुझको वहां पर खड़े देखा तो इशारे से मुझे  अपने पास  बुलाया और  टूटी फूटी उर्दू में मेरा नाम पूछा ….. मैंने कहा , “मेरा  नाम खालिद है” …..

                                   “मेरा नाम ऐनी है , तुम झूला झूलेगा ?” वह बोली ….. मेरे सिर हिलाने पर वह झूले पर से उतर गई ….. फिर हम दोनों बारी –बारी से उस झूले पर झूलते रहे …. इसके बाद मेरी उस लड़की से अच्छी खासी दोस्ती हो गई ….. उसके बाद भी मैं अक्सर उसके पास खेलने के लिए जाने लगा …. लेकिन एक बात पर मैं बहुत हैरान होता था कि जब भी मैं उस बंगले पर ऐनी से मिलने गया , वह मुझको हर बार बाहर ही खेलती मिली  और मुझे उसके इलावा और कोई दूसरा नजर नहीं आया ……

               एक दिन  उससे  झूला झूलते समय मैंने कहा , “आओ ऐनी मेरे साथ बैठ कर झूला झूलों”….  वह फौरन ही राजी हो गई लेकिन जैसे ही उसने मेरे पास बैठने कि कोशिश की  एकदम चीख मारकर पीछे हट गई …. “क्या हुआ ?” मैंने पूछा …..

“लगता है किसी चीज ने काट लिया है” वह बोली ….  मैंने उसके हाथों की तरफ देखा तो  वहां पर कुछ भी नहीं था …..

                         “तुम अपने कपड़ो में देखो” वह बोली …. मैंने अपने कपड़े झाड़े , मगर मुझे कुछ नहीं मिला …. इस पर वह बोली ,”अपनी कमीज उतार कर देखो”…. मैंने अपनी कमीज उतारी और उसने मेरे गले में लटकते हुए तावीज को देखा तो बोली , “यह क्या है ?, इसे उतारो” ….. लेकिन मैंने मना कर दिया ….. उसके क्यों के जवाब में मैंने बताया कि  “एक जिन्नी मेरे पीछे पड़ी हुई है , तावीज को उतारने पर वोह मुझको खत्म कर देगी” , यह सुन कर वोह खामोश रह  गई …..

                           एक दिन नहाते समय गलती से मैं तावीज को घर में भूल गया और ऐनी के पास खेलने चला  गया  …. उस दिन वह मुझे  बहुत खुश नजर आई और मुझे देखकर उसकी  आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई ….. वह मेरा हाथ पकड़कर  मुझको लान के एक वीरान हिस्से में  ले गई …. वहां एक पुराना कुआं था …… मैंने उसमे झांककर  देखा तो मुझे चक्कर आ गया ….  कुआँ बहुत ही गहरा था ….  मेरे बाद ऐनी उसमे झाँकने लगी तो मुंडेर की एक ईट उसके पैरों से फिसल गई ….. वह कुएं में गिरने के करीब थी कि मैंने झपटकर उसका बाजू पकड लिया ….. उस वक्त तक उसका आधे से ज्यादा धड़ कुएं में जा चूका था …. उसके वजन की  वजह से मेरे पैर भी उखड़ रहे थे …. मगर मैंने एड़ी –चोटी का जोर लगाकर बड़ी जददोजहद के बाद उसे बाहर खींच ही लिया …… इस पर वह मेरी बहुत आभारी हुई और मेरा शुक्रिया अदा किया …..

                        दूसरे दिन जब मैं उस बंगले पर गया , तो ऐनी से मेरी मुलाकात नहीं हुई …. आखिर कई रोज के बाद मैंने बंगले वाले अंग्रेज से ऐनी के बारे में पूछा , तो वह बोला , हमारी तो कोई बेटी ही नहीं है …. हम दोनों मियां –बीवी ही यहाँ पर रहते है …. यह सुनकर मुझे बहुत हैरत हुई ….. धीरे -२ मैं उसे भूल गया और फिर कभी उधर नहीं गया …….

*अगला भाग अगले हफ्ते  इसी दिन इसी समय इसी मंच पर देखेंगे और पढेंगे “हम – लोग”

*दोस्तों मेरी  मेरी यह दिली तमन्ना है कि मुझे किसी जिन्नी + परी या फिर इच्छाधारी नागिन से इश्क हो जाए …..        

( “जिन्न की शादी – भाग प्रथम” –रहस्य – रोमांच  विशेष” )                               

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