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भारतीय संस्कृति और होली

Posted On: 4 Mar, 2014 Others में

सत्य सहज हैjagaran juction

RAJ KISHOR MISHRA

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माघ  मास की शुक्लपक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी कहते है ,,इसी दिन से ऋतुराज बसंत का शुभागमन जन -जन को रोमांचित कर देता है ,, अमराई मे कोयलकी कूंक पुष्पों से निकलने वाली भीनी -भीनी खुशबू जन-जन मे नवीन उत्साह का संचार कर देती है / इसी दिन वीणावादिनी का जन्मोत्सव होता है,, बसंत का संचार और माँ सरस्वती के वीणा की झंकार जन -जन को आह्लादित करदेती है ////बसंत के दिन से होली की शुरुवात हो जाती है ,,,  होली बसंत ऋतु मे मनाया जानेवाला भारतीयों का महत्वपूर्ण त्योहार है ,बसंत के दिन भक्तगण ब्रज मे बांकेबिहारी के मंदिर मे गुलाल डाल कर होली का श्री गणेश करते हैं ,,,, हिन्दू वर्णव्यवस्थानुसार 4 वर्णों मे  ब्राह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य , और शूद्र ,मे विभाजित किया गया है ठीक उसी प्रकार क्रमश् चार प्रमुख त्योहार हैं ,,,,श्रावणी  [रक्षाबन्धन ,] दशहरा , दीपावली और होली ,,,,, होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है ,होली मनाये जाने के तीन प्रमुख कारण हैं ===

[1] हिमाचल पुत्री पार्वती भगवान अनादि अनंन्त अविनाशी शिव से विवाह करने के लिये हिमाचल नंदनी अपर्णा [ पार्वती ]अमोघ तप कर रही थी देवताओं के आग्रह पर कामदेव शिव समाधि को भंग करने के लिये उस परम् स्थान पर गये जहाँ महादेव शिव तपस्या मे लीन थे ,,, हर तरह् के प्रयास से थकित होकर मदन [कामदेव ] बसंत का आवाहन करता है ,,,,

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे,,

छूटि समाधि संभु जब जागे ,,,,

भयउ ईस मन छो भु बिसेखी ,,

नयन उघारि सकल दिसि देखी,/

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका,,,

भयहु कोप काँपे उ त्रैलोका ,,,,

तब शिव तीसर नयन उघारा ,,

चितवत काम भयहु ज रि छारा,,,,

[रामचरितमानस [बालकाण्ड]से

कामदेव के भस्म होने पर कामी[भोगी] मायूस और साधक निर्विघ्न हो जाते हैं ,,,, वासना पर विजय और प्रेम के प्रतीक के रूप मे मनाया जाता है ,,,, शिवगण शिव विवाह की खुशी मे होली मनाये ,,,,

[2] हिरण्यकश्यपअपने बड़े भाई हिरणाक्ष की विष्णु भगवान द्वरा वध करने के कारण विष्णु भक्ति विरोधी हो चुका था ,,,, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का अनन्य भक्त था ,,,,  भक्त प्रहलाद को मारने का समस्त प्रयास असफल होने पर होलिका ही उसे अमोघ उपाय सूझा ,,,,, उसे मारने के  उसने  अपनी बहन होलिका को अग्नि की चिता मे प्रवेश  करने की इजाजत दे देता है ,,, , होलिका को वरदान था उसे अग्नि जला नहीं सकती ,,, विष्णुभक्त प्रह्लाद अग्नि से सकुशल बच गया , होलिका जल गयी ,, वरदान मर्यादित होते हैं ,,,, जा को रहे साईंया मार सके न कोय ,,,, बाल न बांका कर सके चाहे जग बैरी होय ,,,,, की कहावत चरितार्थ होती है , विष्णु भक्त प्रह्लाद सकुशल बच गया और होलिका अग्नि मे भस्मीभूत हो गयी ,,,,,उसकी खुशी मे सभी लोग  होलिका दहनोपरांत होली मनाते हैं,,,, असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप मे मनाते हैं ,,, बुरा व्यक्ति कितना भी बलशाली क्यों ना हो आज नहीं तो कल उसकी पराजय अटल सत्य है ,,,

[3]द्वापर मे भगवान कृष्ण को मारने के लिये कंस ने पूतना को भेजा , वह सुन्दर स्त्री का रूपका रूप धारण करके कृष्ण को दूध रूपी विष देना चाहती थी , कृष्ण स्तनपान मे उसके प्राण हर लिये ,,, उसको जला कर ग्वालवालों ने होली के रूप मनाया ,,,,,

चैतशुदी प्रतिपदा से नववर्ष की शुरुवात होती है , नव संवत बसंत आगमन का प्रतीक है चैतशुदी प्रतिपदा के दिन मनु का जन्म हुआ था ,,बसंतपंचमी के दिन रेण की टहनी गाड़ कर होली लगाने की शुरुवात की जाती है ,,,, नारद पुराण , और भविष्यपुराण मे होली का वर्णन् मिलता है ,,,,,, होली मे गेहूँ , चना , जौ , की बालियों को भून कर चंद्र देव की पूजा की जाती है ,,,, होलिका दहनोपरांत अगले दिन सुबह रंग बिरंगी पिचकारी की धूम मे रंगों का सरोबार होजाता है ,,,, रंग बिरंगे रंगो की चमक , अबीर -गुलाल की बौछार मे सारा जहाँ रम जाता है ,,,, होली का उत्साह नये वर्ष की शुरुवात अपनेपन का एहसास मन को रोमांचित कर देता , मन मयूर बाग़-बाग़ हो जाता है ,,,/

आर्यावत [भारत] मे होली का पर्व आर्यों के समय से मनाये जाने का प्रचलन था ,,,,,, मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं मे इस बात का उल्लेख किया है , होली को हिन्दू ही नहीं मुसलमान भी बखूबी मानते थे ,,,, मुग़लकाल मे होली अपने चरमोत्कर्ष पर था ,,, अकबर , जोधाबाई ,,, जहाँगीर , नूरजहाँ आदि बड़े धूम धाम से मनाते हैं ,,,, आज भी बहुत से मुसलमान भाई धूम-धाम से माना रहें है ,,, होली के दिन सारे गीले शिकवे भूलकर  दोस्त और दुश्मन भी गले लग जाते हैं ,,,,, होली भाईचारे और भातृत्व भाव का परिपोषक है ,,,,, रंग बिरंगे रंगों की चमक मे अबीर -गुलाल की बौछार फगुआ गीतों की मदमस्त आदाओं मे भांग की ठंडाई गोझिये की मिठास बसन्त ऋतु की आदाये मन मे नवीन उत्साह से भाव-बिभोर कर देतीं हैं ,,,,,,,

आज समयानुसार सभी त्योहार अपनी मौलिकता को खोते जा रहे हैं ,, होली स्नेह प्रेम की डोर की प्रतीक होती थी , लेकिन आज यही रंग अबीर गुलाल रसायनिक मिलावट की बलिबेदी कुर्बान होता जा रहा है ,, अब प्रेम एक दिखवा बनता जा रहा है ,,,, रंग के साथ-साथ लोग द्वेषवश पेन्ट का भी उपयोग करने लगे हैं ,,, जो नेह को तार -तार कर देता है ,,,होली सद्भाव भाईचारा , प्रेम , और रंगों का बसंत ऋतु का बसंती त्योहार है , बसंत कामदेव का अमोघ सहचर है ,, बसंत के आनेपर वृक्षों मे नवपुष्प और नव किसलय का संचार हो जाता है , जिसके आगमन मात्र से बाग़ ,तालाब , नदियाँ , समुद्र , पहाड़ , और दशों दिशाएं मे प्रेम  की गंगा का सरोबार होजाता ,,,,,मलयागिरि से शीतल, मंद सुगंध वायु बहाने लगती है , बागों मे कोयल की सुरीली आवाज  ,भ्रमर का मधुर गुञ्जार, हंस और तोते के मधुर शब्द दिल मे नया उन्माद भर देतें है /,,,,,मनुष्य को सदैव  प्रकृति का अनुकरण करना चाहिये ,,,, उसी मे समाज का हित निहित है ,,,,,

, खुशियाँ बिखेरे होली, दिल खोल -खोल कर,,,,

ले लो जितना चाहे ,मन तोल -तोल कर ,,,,

पाँच दुर्गुणों की होली जलाकर देखो,

खुशियाँ बहार लाएंगी ,उसको लुटा कर देखो,

काम ,क्रोध ,लोभ, से भला कहाँ हुआ है ,

मोह ,अहांकार से दुनियाँ ही नित जला है,,

खुशियाँ बिखेरे होली, दिल खोल -खोल कर,,,,

ले लो जितना चाहे ,मन तोल -तोल कर ,,,,

RAJKISHOR   MISHRA

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