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मानें या न मानें : नवरात्रि पर विशेष

Posted On: 31 Mar, 2012 Others में

वेद विज्ञानवेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

पण्डित आर. के. राय

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    विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु. त्वयैकया पूरितमम्बयैतत का ते स्तुतिस्तव्य परापरोक्तिः.

जन्म मृत्यु से परे जिनकी अवधारणा ही अपने आप में एक पूरी स्तुति है, समस्त चराचर के कण कण में विविध रूपों में विद्यमान ऐसी जगदम्बा को बार बार नमस्कार है. मैं आज जो प्रस्तुति इस मंच से प्रकाशित करने का प्रयत्न कर रहा हूँ, वह अति आधुनिक एवं तीव्र गति से अग्रसर समाज में उपहास पूर्ण प्रताड़ना का ही भागीदार बनेगी. किन्तु अपनी उस श्रद्धा एवं विश्वास का क्या करूँ, जो समस्त तर्कपूर्ण व्याख्या को परिलक्षित ठोस सतह पर निरुत्तर एवं मुझे किंकर्त्तव्यविमूढ़ कर देते है. मै जम्मू क़ी एक सैनिक इकाई में नियुक्त था. स्वभाव एवं व्यवसाय से पण्डित होने के कारण मुझे सेना के अतिविशिष्ट लोगो को वैष्णोमाता के दर्शन कराने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था. जो अधिकारी हेलीकाप्टर से सीधे सांझीछत पर उतरते थे. उन्हें दर्शन कराने में थोड़ी दिक्कत होती थी. क्योकि वे तों हेलीकाप्टर से जाते थे. किन्तु हम पैदल ही वहां तक पहुँचते थे. चौदह किलोमीटर क़ी खड़ी चढ़ाई एक बहुत मुश्किल चढ़ाई है. किन्तु भक्तो एवं श्रद्धालुओं के दिन रात लगे रहने वाले तांता से यह चढ़ाई सुगम हो जाती है. फिर भी वापसी पर थोड़ी तबियत तों भारी हो ही जाती है. ऐसा ही पहली बार हुआ जब मै एक अन्य सैनिक के साथ एक विशिष्ट सेनाधिकारी को दर्शन कराने के लिये. चला. मै जम्मू में था. मुझे अचानक सूचना मिली कि सेना के एक उच्च अधिकारी दिल्ली से सीधे मातारानी के भवन पहुँच रहे है. मै एक सैनिक तथा एक और पण्डित जी को साथ लेकर बहुत ही शीघ्रता पूर्वक जम्मू से कटरा फौजी गाडी से पहुंचा. पैतालीस मिनट तों इधर ही लग गये. कुछ समय पहले तैयारी करने में लग गये. अर्थात सब मिलाकर एक घंटे इधर ही लग गये. हम आधार पर, गुलशन कुमार के द्वारा चलाये जा रहे निःशुल्क लंगर के पास ही ड्राईवर के हवाले गाडी छोड़कर हम तीनो आदमी बहुत ही शीघ्रता के साथ लगभग दौड़ते हुए चढ़ने लगे. हमें यह नज़र आ रहा था कि अधिकारी महोदय तों कब के सांझीछत पहुँच गये होगें. हमें डांट सुननी पड़ सकती है. हम इसी धुन में भागते चले जा रहे थे. लोगो का रेला लगा हुआ था. इसी बीच एक बहुत ही वृद्ध महिला जिसकी कमर झुकी हुई थी, एक डंडे के सहारे जमीन पर टेकते हुए तथा ठक ठक क़ी आवाज़ करते हुए, सिर नीचे झुकाए चली जा रही थी, दिखाई पडी. मैंने अपने दोनों साथियो क़ी तरफ मुखातिब होकर कहा कि यह माता जी तों संभवतः अगले चार पांच दिनों में भवन पहुंचेगी. जो सिपाही मेरे साथ था, वह बोला कि साहब, चार दिन बाद पहुंचे या पांच दिन बाद, दर्शन तों यही करेगी. हम तों डंडा के डर से जा रहे है. हम दर्शन करने थोड़े ही जा रहे है. दूसरे पण्डित जी जो मेरे ही साथ जा रहे थे, वह बोले कि यह बूढ़ी माता जी तों खुद ही वैष्णोदेवी बन गयी है. इनको क्या पडी थी जो दर्शन करने के लिये प्राण त्यागने चल पडी. यही बात करते, भागते, दौड़ते हम तीनो बहुत ही शीघ्रता से अर्धकुमारी पहुंचे. कुछ थकान हल्का करने के लिये हम एक दुकान पर बैठ कर पानी पीने लगे. तभी वही बूढ़ी महिला दिखाई दी. हम हैरान होकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे. हम भागते दौड़ते यहाँ तक पहुंचे. अभी थोड़ी देर ही यहाँ बैठे हुए है. और यह वृद्ध महिला पहुँच गयी. इससे अच्छा तों इस माता जी के साथ ही चलना था. कम से कम थकान तों नहीं होती. हम फ़ौरन उठ खड़े हुए. तथा उसी बूढ़ी माता जी के साथ लग गये. किन्तु वह माता जी तों बहुत धीरे चल रही थी. हम उनका साथ छोड़ कर फिर दौड़ना शुरू कर दिये. और सांझी छत पहुँच गये. वहां पर पहले से ही कई फौजी लगे हुए थे. हमने पता किया तों पता चला कि वह अधिकारी तों कब के भवन क़ी तरफ जा चुके है. हमारे तों हाथ पाँव ही फूल गये. अब क्या होगा? अभी तों बहुत बड़ा पंगा फंस गया. हम तीनो सहमे हुए थे. तभी देख रहे है कि फिर वही बूढ़ी महिला लाठी ठक ठक करते भैरव बाबा के आधार क़ी तरफ बढ़ती चली जा रही है. एक बार तों हम फिर चौंक पड़े. किन्तु अधिकारी के कारण उपजे भय ने उस चौंकाने वाली घटना को मिटा दिया. हम तों अपने दंड एवं डांट फटकार क़ी कल्पना कर के त्रस्त हो रहे थे. थोड़ी देर तक हम क्या करें क्या न करें, इसी उधेड़ बुन में लगे रहे. आखिर यह सोच कर कि जो मातारानी चाहेगीं, वही होगा. जो होगा वह देखा जाएगा. और अंत में यह विचार किये कि अब जब आ ही गये है तों दर्शन भी कर ही लेते है. आखीर तों अब जो होगा वह होगा ही. हम तत्काल भवन क़ी तरफ रवाना हो गये. हम शीघ्रता पूर्वक जा कर फौजियों के लिये लगने वाली विशेष लाईन में खड़े हो गये. क्योकि आम आदमी के लिये तों लाईन बहुत ही लम्बी लगी हुई थी. उस लाईन में हमारा दर्शन का नंबर कम से कम दस घंटे बाद ही आता. हम जल्दी जल्दी आगे खिसक रहे थे. जब गुफा के द्वार पर पहुंचे तों वहां पर वह बूढ़ी माता जी दिखाई दीं. हमारी आँखें फटी क़ी फटी रह गयीं. यह वृद्धा यहाँ कैसे पहुँच गयी. हमारे मन में एक अजीब भय एवं उत्सुकता भर गयी. रोमांच भी हो रहा था. वह हम से आगे लाईन में लगी थी. लगभग सात आदमियों का फासला था. सब मातारानी क़ी पिंडी क़ी तरफ देख रहे थे. किन्तु हम तीनो आँखें फाड़ फाड़ कर एक टक उस वृद्धा को ही देखते चले जा रहे थे. हम तीनो ने निश्चय किया कि जल्दी बाहर निकलो और उस माता जी को पकड़ो. और इस विचित्रता के बारे में पूछो. हम ने जैसे तैसे माता रानी के दर्शन क़ी प्रक्रिया पूरी क़ी. बाहर आये तब तक वह बूढ़ी माता पता नहीं कहाँ जा चुकी थी. हम ने दूर दूर तक उन्हें ढूंढा. किन्तु कुछ पता नहीं चला. अब हमारी आपस में काना फूसी शुरू हो गयी. हम भौंचक्के थे. हमें कुछ सूझ नहीं रहा था कि अगला क़दम हमारा क्या होगा. हम अब वापस आने लगे. आगे आते आते जब टिनशेड के नीचे संकरे रास्ते पर पहुंचे तों लगभग उस वृद्धा माता क़ी विचित्रता का प्रकोप हमारे दिमाग से बिल्कुल तों नहीं उतरा था, किन्तु कम ज़रूर हो गया था. और धीरे धीरे फिर हम सामान्य हो गये. जब हम भैरव बाबा के आधार के नीचे पहुंचे तों देख रहे है कि वही वृद्धा महिला उस भयंकर खड़ी चढ़ाई पर चढ़ती चली जा रही है. हम दौड़ कर भी उसे नहीं पकड़ सकते थे. क्यों कि चढ़ाई बिल्कुल ही खड़ी थी. और वह वृद्धा माता जी हम से बहुत आगे थी. फिर भी हम आनन् फानन में बिना देरी किये भैरव नाथ क़ी चढ़ाई चढ़ना शुरू कर दिये. अमूमन भैरव नाथ क़ी चढ़ाई बहुत ही कठिन है. बहुत लोग डर के मारे उस अति कठिन चढ़ाई पर नहीं चढते है. तथा माता रानी का ही दर्शन कर वापस हो जाते है. चढ़ाई ही इतनी कठिन है कि अच्छे अच्छो क़ी हालत पस्त हो जाती है. वास्तव में हम भयंकर रूप से थक चुके थे. पाँव बिल्कुल ही अवरुद्ध हो चुके थे. किन्तु उस बुढिया माता क़ी उत्सुकता ने पता नहीं कहाँ से इतना दम एवं जोश भर दिया कि हम बहुत ही तेजी से उस अंतिम एवं कठिन चढ़ाई पर चढ़ना शुरू कर दिये. किन्तु अफसोस जब तक हम बाबा भैरवनाथ के दरवाजे पहुँचते, वह वृद्धा माता कही जा चुकी थी. भैरव नाथ का दर्शन हमने भरे मन से किया. तथा बिल्कुल ही उदास एवं टूटे मन से वापस हो लिये. सांझी छत पर पहुँचने पर पता चला कि वह अधिकारी महोदय दर्शन कर के दिल्ली के लिये प्रस्थान कर चुके है. हम अब धीरे धीरे नीचे उतरना शुरू कर दिये. बिल्कुल ही थक चुके थे. पैर बिल्कुल काम नहीं कर रहे थे. दूसरे पण्डित जी हताश हो गये. वह बोले कि अब नहीं चल पायेगें. हम वही पर रास्ते के किनारे बैठ गये. बहुत ज्यादा थकान हो गयी थी. हम लेट गये. और पता नहीं कब आँख लग गयी. अचानक उस सिपाही क़ी आँख खुली उसने हड बड़ा कर जगाया. बहुत ही देर हो चुकी थी. हम साढ़े तीन घंटे सो गये. फिर हम उठे और लड़खड़ाते हुए नीचे उतरना शुरू कर दिये. रास्ते भर हम विचार विमर्श करते रहे कि वापसी पर यदि हमसे पूछा जाएगा तों क्या जबाब देगें? वापसी पर तों बहुत फटकार मिलेगी. सजा भी मिल सकती है. आदि अनेक तरह के विचार मन में आते चले जा रहे थे. हम कटरा में उसी गुलशन कुमार वाले लंगर पर पहुंचे. वह ड्राईवर गाडी में ही सो रहा था. हमने उसे जगाया. गाडी में बैठे. तब तक एक आदमी आया और उसने पूछा कि हम कहाँ जा रहे है. हम ने सोचा कि शायद यह भी लिफ्ट मांगेगा. हम झूठ बोले. हम ने बताया कि हम ऊधमपुर जा रहे है. वह हंसने लगा. वह बोला कि गाडी का बी ए नंबर कुछ और बता रहा है. मै यह गाडी भी पहचान रहा हूँ. हम फिर सहम गये. वह बोला कि उसे गाडी में लिफ्ट नहीं चाहिए. उसने बताया कि हमारे सी ओ साहब उस आदमी के मित्र है. उसने प्रसाद दिया तथा बताया कि यह प्रसाद अपने सी ओ साहब को दे देना. और धन्य वाद दे देना. मै उनसे अवश्य मिलता. किन्तु मै भी ऊधमपुर जा रहा हूँ मेरे पास अपनी गाडी है. हम अपने झूठ के पकडे जाने पर झेंप गये.और वापस चल पड़े. गाडी यूनिट पहुँची. हम डरते हुए अपने सीनियर जे सी ओ के आफिस में पहुंचे. हम डरे हुए थे. गलती तों हो ही गयी थी. दूसरी गलती हमने और भी कर दी थी. सी ओ साहब के मित्र से हम ने झूठ बोला था. तभी सीनियर जे सी ओ दिखाई दिये. हम अभी कुछ कहना ही चाह रहे थे कि उन्होंने बताया कि आप लोग तत्काल सी ओ साहब से मिलिए. वह बहुत देर से आप तीनो क़ी प्रतीक्षा कर रहे है. हम ने कहा कि साहब गलती हो गयी. हम साहब के बाद में पहुंचे है. लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी. और हमें उसी तरह लेकर सी ओ साहब के आफिस में चले गये. हमें तों काटो तों खून नहीं. हम अन्दर आफिस में पहुंचे. अपने सी ओ साहब का अभिवादन किया. सी ओ साहब उठ कर खड़े हुए. बड़े ही गर्म जोशी से हाथ मिलाया. फिर अपने सामने ही उन्होंने कुर्सी पर बैठने को कहा. हम झेंप रहे थे. उन्होंने बड़े ही आदर के साथ हमें बैठने को कहा. फिर उन्होंने हमारा धन्यवाद किया. उन्होंने बताया कि डाईरेक्टर जेनेरल साहब आप लोगो क़ी बहुत ही तारीफ कर रहे थे. बता रहे थे कि यदि आप लोग नहीं होते तों दर्शन ही नहीं हो पाया होता. बहुत अच्छी तरह से ह़र एक जगह को आप ने दिखाया. उसका विवरण बताया. फिर आप ने जो उनका तत्काल फोटो खींचने क़ी व्यवस्था क़ी वह भी बहुत ही काबिले तारीफ़ थी. हमारे सी ओ साहब बोलते चले जा रहे थे. हमारे कान में साँय साँय गूँज रही है. हमें नहीं पता हमारे सी ओ साहब और क्या क्या बोलते चले जा रहे है. हमें कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि हम क्या सुन रहे है. खोपड़ी हवा में घूम रही है. यह हम क्या सुन रहे है? अधिकारी तों हम से मिला ही नहीं. फिर उसने यह सब सूचना क्यों दी? उसके साथ हमारा फोटो कहाँ से आया? मेरे साथ वाले पण्डित जी इसी बीच चकरा कर कुर्सी से गिर पड़े. मै भी लग रहा था कुर्सी पर से नीचे गिर जाउंगा. फटाफट पण्डित जी को यूनिट के एम् आई रूम पहुंचाया गया. सी ओ साहब बोले कि पण्डित जी थक गये है. उन्हें चक्कर आ गया है. आप लोग जाइए आराम कीजिये. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि डाईरेक्टर जेनेरल साहब ने आप के लिये एक उपहार भिजवाया है. एक डिब्बा था. उस पर मेरा नाम लिखा था. सबसे बड़ी विचित्र बात यह थी कि उस डिब्बे पर मेरा वह नाम लिखा था जो सिर्फ मुझे पता था. शेष किसी को नहीं पता था. यहाँ तक कि आज भी फौज में किसी को मेरा वह नाम पता नहीं है. मै जल्दी जल्दी आफिस से बाहर निकाला. और टी रूम में जल्दी से घुस कर ज़मीन पर ही लेट गया. फिर मुझे होश नहीं रहा. मै और वह दूसरे वाले पण्डित जी सैनिक अस्पताल ए में पहुँच गये थे. डाक्टर साहब रौंद में आये. उसने हाल चाल पूछा. हम ने बताया कि हम ठीक है. डाक्टर ने बताया कि आप लोगो को कुछ नहीं हुआ है. लेकिन आप ने गलती क़ी. मैंने पूछा कि क्या गलती क़ी? उसने बताया कि आप को जो साहब ने वापस आते समय सी ओ साहब को प्रसाद देने के लिये दिया था, उसे आप लोगो ने नहीं दिया. वास्तव में बात सही थी. लेकिन हमें इतना मौक़ा ही नहीं मिल पाया कि हम सी ओ साहब को यह बात बताएं. अचानक हमारा दिमाग फिर कौंध गया. इस डाक्टर को कैसे पता कि किसी साहब ने हमें वापसी में कुछ दिया था. फिर मैंने सोचा कि या तों ड्राईवर ने या फिर हमारे साथ वाले सिपाही ने बताया होगा. मैंने सिर झटका. फिर वह डाक्टर बोला कि पण्डित जी मातारानी क़ी महिमा बहुत विचित्र, बहुत बड़ी एवं बहुत ही अमोघ है. आप लोग बहुत ही भाग्य शाली है. मै और कुछ नहीं कह सकता. फिर डाक्टर ने पूछा कि कोई और भी आप लोगो के साथ गया था क्या? मैंने बताया कि एक सिपाही तथा ड्राईवर था. फिर उन्होंने पूछा कि वे दोनों तों ठीक है? या फिर उनकी भी तबियत खराब है? अब फिर खोपड़ी घूमने क़ी बारी आई. जब इसे यही नहीं पता कि हमारे साथ और कोई गया था तों इसे यह प्रसाद वाली बात कौन बताया? इसी बीच अभी मै कुछ सोचता, डाक्टर निकल चुका था. अभी हम इसी उधेड़ बुन में पड़े है कि उसके थोड़ी ही देर बाद एक डाक्टर आया. उसने दवा देनी शुरू क़ी तों हमने बताया कि एक डाक्टर साहब तों अभी दवा देकर गये है. डाक्टर फौजी था. उसने डांट कर बोला कि डाक्टर कहाँ से आयेगा?. ड्यूटी तों मेरी है. कार्ड मेरे पास है. दूसरे किसी को इजाज़त नहीं है. दूसरा डाक्टर क्यों आयेगा? मै चुप हो गया. मेरे दिमाग के पटल पर मातारानी एवं भैरवनाथ के चित्र बहुत तेजी से चक्कर काट रहे थे. मैंने डाक्टर से दवा लिया. डाक्टर हमारे डिस्चार्ज स्लिप पर दस्तख़त कर चला गया. और बताया कि कल आप अपनी यूनिट में वापस चले जाईयेगा. अभी आप स्वस्थ है. दवा खाने क़ी कोई ज़रुरत नहीं है. मै यह बात किसी से नहीं बताया था. क्यों कि सुनने के बाद सब लोग मेरी हँसी ही उडायेगें. लेकिन अभी चार पांच दिन पहले मेरी एक सोची हुई बहुत दिनों क़ी मनोकामना पूरी होनी शुरू हो गयी है. हालाकि यह मेरे बस क़ी नहीं है. किन्तु पता नहीं कैसे इतना बड़ा काम और वह भी मेरी अनुपस्थिति में शुरू हो गया, मेरी समझ में नहीं आ रहा है. और कैसे यह पुरा होगा? यह भी मेरी समझ में नहीं आ रहा है. और चूंकि मेरी समझ में नहीं आ रहा है, इसीलिए मैंने इसके बारे में सोचना भीछोड़ दिया है. माता जी जैसे चाहेगी वैसे पुरा होगा.

यही कारण पडा कि मैंने अब संकोच छोड़ कर कि कोई हंसेगा तों हंसता रहे, यह घटना मैंने यहाँ प्रस्तुत कर दी.

त्वं वैष्णवी शक्तिरनंतविर्या विश्वस्यबीजं परमासि माया. सम्मोहितं देवि समस्त मेतत त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्ति हेतु.”  ===============================================================

पंडित आर. के. राय प्रयाग

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