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राजयोग का तांत्रिक विधान भाग 1

Posted On: 23 May, 2016 Others में

वेद विज्ञानवेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

पण्डित आर. के. राय

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तांत्रिक राजयोग

मुझे ज्ञात है, आज के छद्मरूपधारी कूपमंडूक सुधारवादी आधुनिक उच्चशिक्षा प्राप्त रँगे सियार के रूप में मेरे इस लेख भरपूर मखौल उडायेगें. किन्तु इसमें दोष उनका नहीं बल्कि उनके पारिवारिक या वंशानुगत संस्कार का दोष है. अस्तु, मुझे इससे क्या लेना देना.
जो व्यक्ति शरीर एवं उनको संचालित करने वाले इन्द्रियों के नियंत्रक मन के वशीभूत रहता है, उसे शरीर को श्रम देना बहुत बुरा लगता है. वह चाहते हैं कि भरसक शौचालय कहीं जाना नहीं पड़ता. बल्कि कोई ऐसी मशीन होती जो गुदा मार्ग से मलमूत्र आदि स्वतः निकाल लेती और शरीर को हिलाना नहीं पड़ता तो अच्छा रहता. आज का “अटैच्ड बाथरूम” इसी सोच का परिणाम है.
जिस व्यक्ति को शरीर के अंगो को हिलाना डुलाना या उसे सक्रीय रखना या करना बहुत कठिन या निरर्थक लगता है वह अपने आप को प्रेम मार्गी या भक्ति मार्गी घोषित कर देवोपासना में लगा देने की बात करते हैं.
भगवान् शिव भी श्री राम के भक्त थे. किन्तु वह उनका दर्शन योगमार्ग से यथास्थिति कर लेते थे. यदि सहज में मात्र भक्ति या प्रेम मार्ग से ही देवसिद्धि हो जानी थी तो भगवान शिव या योगी याज्ञवल्क्य को शरीर को कष्ट देते हुए योगमार्ग का अनुशरण क्यों करना पडा? मैं यह नहीं कहता कि भक्ति या प्रेम मार्ग अधम मार्ग है. किन्तु यह तभी उचित या अनुशंसित है जब योगक्रिया द्वारा इसका पूर्व में ही सत्यापन कर लिया गया हो. सैकड़ो तर्क शास्त्र, और व्याकरणादि अनुशीलन पूर्वक मानवगण शास्त्रजाल में फंसकर केवल विमोहित होते हैं. वास्तव में प्राकृत ज्ञान योगाभ्यास के बिना उत्पन्न नहीं होता. योगबीज के आठवें भाग में भगवान् शंकरदेव बताते हैं कि–
“अनेकशतसंख्याभिस्तर्कव्याकरणादिभिः.
पतिता शास्त्रजालेषु प्रज्ञया ते विमोहिताः.
विस्तृत ब्रह्माण्ड में अनेक लोक हैं. इन लोकों में अनेक आकाशगंगायें हैं. उन आकाशगंगाओं में अनेक नक्षत्र मण्डल या ग्रहमंडल विराजमान हैं. आर उन प्रत्येक ग्रहमंडल के अधीन अनेक प्राणी हैं.
और इस चक्र को पूरा करते हुए–
प्रत्येक प्राणी के अन्दर एक ग्रहमंडल है. अनेक ग्रहमंडल मिलकर शरीर के अन्दर आकाश गंगाओं का निर्माण करते है, ये अनेक आकाश गंगायें मिलकर लोकों का निर्माण करती हैं. ये लोक अनंत ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं.
जैसे बरगद के एक छोटे से बीज से पहले तना, शाखा एवं पत्तों का तथा पुनः पुष्प एवं अंत में बीज बन जाता है. और फिर इसी प्रकार इस बीज से तना आदि बनता जाता है.
इस प्रकार इस शरीर के बाहर सौरमंडल में विराजमान ग्रहमंडल से स्थूल रूप में विविध ग्रहों के प्रभाव की गणना कर के ज्योतिष में राजयोग की अवधारणा को मूर्त्त रूप दिया गया है. उसी प्रकार शरीर के अन्दर स्थित नाड़ी, प्रकाश आदि के आधार पर तंत्रयोगात्मक राजयोग का निर्माण किया गया है.
जैसे ज्योतिष में कुण्डली में केंद्र, कोण, अपोक्लिम, पणफर आदि भाव तथा पृष्ठोदयी, उभयोदयी आदि राशियाँ होती हैं उसी प्रकार तांत्रिक योग में भी शरीर के अन्दर विभिन्न तंतुजाल की संज्ञायें हैं-
  • त्रिलक्ष्य- “आदिलक्ष्यः स्वयम्भूश्च द्वितीयं बाणसंज्ञकम. इतरं तत्परे देवि! ज्योतिरूपं सदा भजे.
अर्थात स्वयंभूलिंग, बाणलिंग और इतरलिंग-इन्हीं तीन लिंगों को त्रिलक्ष्य कहा जाता है. ये तीनो लिंग यथाक्रम से मूलाधार, अनाहत एवं आज्ञाचक्र में अधिष्ठित हैं.
  • व्योमपंचक- आकाशन्तु महाकाशं पराकाशं परात्परम. तत्त्वाकाशं सूर्याकाशं आकाशं पञ्चलक्षणम .

अर्थात आकाश, महाकाश, पराकाश, तत्त्वाकाश एवं सूर्याकाश ये पञ्च आकाश कहलाते हैं.

  • ग्रंथि त्रय- ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि एवं रुद्रग्रन्थि – इन्हीं तीनो को ग्रंथित्रय कहते हैं. मणिपुरपद्म ब्रह्मग्रंथि, अनाहत पद्म विष्णुग्रंथि और आज्ञापद रूद्र ग्रंथि के नाम से जाने जाते हैं.
  • शक्तित्रय- ऊर्द्ध्वशक्तिर्भवेत कंठः अधःशक्तिर्भवेद गुदः. मध्याशक्तिर्भवेन्नाभिः शक्त्यतीतं निरंजनम. अर्थात कंठ देश के विशुद्ध चक्र में ऊर्द्ध्वशक्ति, गुह्यदेश के मूलाधार चक्र में अधः शक्ति तथा मणिपुर चक्र में मध्यशक्ति विराजित है.

—प्रत्येक व्यक्ति के शरीर के अन्दर ये समस्त तत्त्व विराजित होते हैं. आवश्यकता है इन्हें क्रम से जोड़ने एवं यथा इच्छित रूप में यथास्थान एकत्रित कर नियंत्रित करने की.

यह क्रिया आकस्मिक रूप से या सहज में पूर्ण होने वाली नहीं है. इसलिये पहले शुद्ध कमल पंखुड़ी वाले त्रिधातु मिश्रित ऐसी आकृति सम्मुख रख लेते हैं जिस्मने उपरोक्त त्रिलक्ष्य एवं व्योमपंचक आदि विधान निर्माण में प्रयुक्त हो.
मारण, मोहन, वशीकरण एवं उच्चाटन आदि क्रिया करने वालो का इसपर अलग विधान है. निम्न विधान केवल राजयोग वालों के लिये है.
इस आकृति के सम्मुख पद्मासन में आसन पर बैठ जाय. लाल रंग के कपडे पर इस आकृति को रख दे.
सबसे पहले सिर के मध्य में तर्जनी ऊंगली कड़ी करके स्पर्श करे और पुनः उस यंत्र का स्पर्श करे. उसके बाद उसी ऊंगली से कंठ का स्पर्श करे और यंत्र के गले का अर्थात चौथे मेरु की पंक्ति का स्पर्श करे. उसके बाद ह्रदय का स्पर्श करे और यंत्र के कमल पंखुड़ी का स्पर्श करे. पुनः घुटनों का स्पर्श करे तथा यंत्र के पंखुड़ियों के आधार रेखा का स्पर्श करे. और अंत में पैर के तलवे का स्पर्श करे तथा यंत्र के आधार का स्पर्श करे.
उसके बाद निम्न मन्त्र को एक बार केवल श्वास लेते हुए तथा दूसरी बार केवल श्वास छोड़ते समय पढ़े–
ॐ क्लीं मातरेषा धरं धरं ध्ररीं पुलाहोजन्या कं चं टं तं पं लं ह्रां ह्रीं उतिष्ठ जाग्रय प्रकाश पिंडानाम अन्तःस्थं कुरु कुरु स्वाहा.
इस प्रकार यंत्र का राजयोग प्रभाव जागृत हो जाता है.
आगे इसपर मात्र उपरोक्त मन्त्र पढ़कर एक पुष्प चढ़ायें और अपने काम पर चलें,
कुछ दिनों बाद अपने शरीर के अन्दर ही राजयोग की सारी शक्तियाँ चलायमान हो जाती हैं.
—प्रायः व्यवसायी एवं नेता गणों के भाग्य उदय का यह अमोघ अस्त्र है. इससे राजनीति में महत्वपूर्ण सफलता मिलती है. नौकरी एवं कृषि कर्म करने वालों के लिये यह उपयुक्त नहीं है.
यह एक सत्यापित एवं प्रत्यक्ष सिद्ध योग प्रक्रिया है.
(क्रमशः)

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