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पाकिस्तान की 'तालिबानी' सोच

Posted On: 9 Aug, 2016 Others में

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ravikant

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पाकिस्तान की ‘तालिबानी’ सोच
पाकिस्तान की सोच हमेशा विपरीत रही है। यही वजह है कि आजादी के कई दशक बाद भी वह स्थिर राष्ट्र नहीं बन सका है। वह विकसित राष्ट्रों की ओर टकटकी लगाए रहता है कि कोई उसकी मदद करे। अमेरिका और चीन जैसे बड़े राज्य उसकी मदद करते रहते हैं। इसके बदले फायदा उठाने से भी पीछे नहीं रहते। हालांकि, इधर के दिनों में अमेरिका ने थोड़ा हाथ खींचना जरूर शुरू किया है। क्योंकि, उसे पुख्ता सबूत मिल चुका है कि पाकिस्तान ही आतंक का गढ़ है। यूं तो पाकिस्तान में आतंकवादी घटना ठीक उसी तरह से है, जिस तरह बड़े शहरों में गोलीबारी की घटना घटती है। पिछले दिनों पाकिस्तान में कई बड़े आतंकवादी हमले हो चुके हैं। आठ अगस्त, 2016 को क्वेटा में घटना घटी और 75 निर्दोष लोगों की मौत हो गई। कई दर्जन लोग बुरी तरह जख्मी हो गए हैं। इसके बाद भी दुनिया के कई देशों में इसे बड़ी घटना नहीं मानी गई। इधर, क्वेटा घटना के फौरन बाद पाकिस्तान ओर से बयान आया कि इसके पीछे भारत का हाथ है। दुनिया के देशों में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जो विभिन्न धर्मों को सम्मान देता है। ऐसा कहने से पहले पाकिस्तान को आत्ममंथन करना चाहिए था, क्योंकि निर्दोष लोगों की जानें उसकी तालिबानी सोच की वजह से गई है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के रूटीन वर्क में आतंकवाद को बढ़ावा, उन्हें फंडिंग देना भी है। तभी तो अनेक देशों को उसपर विश्वास नहीं है। यह अलग बात है कि राजनीतिक स्वार्थ में कई देश उसकी मदद करते हैं। क्वेटा मामले में भारत को घसीटकर उसने सुर्खियों बटोरनी चाहीं। हालांकि वह खुद सुर्खियों में आ गया, उसपर कई देशों के मीडिया ने आरोप लगाया कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद के प्रति गंभीर रहता तो ऐसी घटनाएं घटतीं ही नहीं। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कई इलाकों में ‘सोमालिया’ सा दृश्य देखने को मिलता है। इसके अलावा भी वह अनगिने संकट से जूझ रहा है। फिर भी सुरक्षा और युद्ध के लिए उसका बजट हिंदुस्तान से थोड़ा ही कम है। युद्ध और विपरीत सोच को छोड़कर उसे आतंकवाद को खत्म करने की मुहिम चलानी चाहिए, इस पुनीत काम में कई देश उसकी मदद करते। पड़ोसी देश होने के नाते भारत पाकिस्तान में शांति चाहता है। लेकिन भूत, वर्तमान के अनुभव से ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तान कोई पॉजिटिव कदम उठाने जा रहा है।
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पाकिस्तान की सोच हमेशा विपरीत रही है। यही वजह है कि आजादी के कई दशक बाद भी वह स्थिर राष्ट्र नहीं बन सका है। वह विकसित राष्ट्रों की ओर टकटकी लगाए रहता है कि कोई उसकी मदद करे। अमेरिका और चीन जैसे बड़े राज्य उसकी मदद करते रहते हैं। इसके बदले फायदा उठाने से भी पीछे नहीं रहते। हालांकि, इधर के दिनों में अमेरिका ने थोड़ा हाथ खींचना जरूर शुरू किया है। क्योंकि, उसे पुख्ता सबूत मिल चुका है कि पाकिस्तान ही आतंक का गढ़ है। यूं तो पाकिस्तान में आतंकवादी घटना ठीक उसी तरह से है, जिस तरह बड़े शहरों में गोलीबारी की घटना घटती है। पिछले दिनों पाकिस्तान में कई बड़े आतंकवादी हमले हो चुके हैं। आठ अगस्त, 2016 को क्वेटा में घटना घटी और 75 निर्दोष लोगों की मौत हो गई। कई दर्जन लोग बुरी तरह जख्मी हो गए हैं। इसके बाद भी दुनिया के कई देशों में इसे बड़ी घटना नहीं मानी गई। इधर, क्वेटा घटना के फौरन बाद पाकिस्तान ओर से बयान आया कि इसके पीछे भारत का हाथ है। दुनिया के देशों में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जो विभिन्न धर्मों को सम्मान देता है। ऐसा कहने से पहले पाकिस्तान को आत्ममंथन करना चाहिए था, क्योंकि निर्दोष लोगों की जानें उसकी तालिबानी सोच की वजह से गई है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के रूटीन वर्क में आतंकवाद को बढ़ावा, उन्हें फंडिंग देना भी है। तभी तो अनेक देशों को उसपर विश्वास नहीं है। यह अलग बात है कि राजनीतिक स्वार्थ में कई देश उसकी मदद करते हैं। क्वेटा मामले में भारत को घसीटकर उसने सुर्खियों बटोरनी चाहीं। हालांकि वह खुद सुर्खियों में आ गया, उसपर कई देशों के मीडिया ने आरोप लगाया कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद के प्रति गंभीर रहता तो ऐसी घटनाएं घटतीं ही नहीं। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कई इलाकों में ‘सोमालिया’ सा दृश्य देखने को मिलता है। इसके अलावा भी वह अनगिने संकट से जूझ रहा है। फिर भी सुरक्षा और युद्ध के लिए उसका बजट हिंदुस्तान से थोड़ा ही कम है। युद्ध और विपरीत सोच को छोड़कर उसे आतंकवाद को खत्म करने की मुहिम चलानी चाहिए, इस पुनीत काम में कई देश उसकी मदद करते। पड़ोसी देश होने के नाते भारत पाकिस्तान में शांति चाहता है। लेकिन भूत, वर्तमान के अनुभव से ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तान कोई पॉजिटिव कदम उठाने जा रहा है।

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