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एक इंतज़ार का प्रेम गीत

Posted On: 3 Aug, 2014 Others में

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Ravindra K Kapoor

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नोट:
ये गीत मेरी एक नई कहानी स्क्रिप्ट “Ritu Ek Kahani” का एक भाग है. आप में से अगर कोई मेरी एक नयी प्रकार की कहानी को पढ़ना चाहे तो कृपया निचे दिए URL को कॉपी पेस्ट करके Tumbhi.com की website पर पढ़ सकते हैं. कहानी और गीत दोनों ही स्क्रिप्ट या लिरिक्स में पढ़ने को मिल सकेंगे. आशा है आप कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने का कृपा करेंगे. सुभकामनाओं के साथ …रवीन्द्र
यूआरएल
http://tumbhi.com/home
Writing पर जा कर Script या Lyrics पर click करें .
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है बेखुदी का आलम,
कुछ इतना बेपरवा,
कि भूल बैठी हूँ खुद को ही,
तुझे बस देख कर ही मेरे यार.
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है तेरे आने की राह देखने की,
तमन्ना, कुछ, इतनी बेशुमार,
कि वक़्त मिलता कहाँ है, कि देख लूं,
खुद को भी, कभी ओ यार.
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ये मचलती हुई, हवाएँ जो छू रहीं हैं, तेरी जुल्फों को,
इन्हीं को, देख के, घटाएं भी,
रह- रह के, चूम लेती हैं, दरख्तों को.
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ये झरनों से उमड़ता हुआ सा, पानी का सैलाब,
डाल रहा है चेहरे पे, कुछ ठंडी सी फुहार,
तेरे आने की, बाट जोहते नहीं थकी हैं फुहारें,
कि जा के ये, कहीं सो जाएँ.
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इससे पहले कि पानी का ये उमड़ता सैलाब,
बंद कर दे अपने बहने की, रवानी को,
और बंद कर दें, ये भूरे बादल भी,
उमड़- घुमड़ के, बरसाना, अपने पानी को.
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आ जाओ, मेरे नसीब, मेरे ख़्वाबों के शाहजादे,
कब से, तेरी राहों में, बिछाये बैठी हूँ,
मैं , ये नज़रें अपनी.

Ravindra K Kapoor
Kanpur India 4th August 2014

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