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एक समाचार जो समाचार नहीं बन सका

Posted On: 9 Sep, 2013 Others में

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Ravindra K Kapoor

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कभी कभी मैं सोचने के लिए बाध्य हो जाता हूँ कि अखबारों में छपने वाले समाचार लोगों को प्रभावित करते हैं या कि छपने वाले समाचारों के कारण लोग प्रभावित होते हैं. कैसा अजीब समय है बलात्कार, चोरी और डकैती, लूट और मोटर बाइक्स के सवारों द्वारा किये गए अपराधों के साथ घिनोनै अपराध समाचारों के मुख्या शीर्षक बन आप पढ़ें तो और नहीं पढ़ें तो समाचार पत्रों मैं भरे होते हैं पहले पन्ने से अंतिम पन्ने तक, पर अगर किसी कलाकार की कलाकृति के बारे में कोई समाचार हो तो वो न्यूज़ अधिकतर या तो सिर्फ एक दो लाइन की न्यूज़ बन कर रह जाती है या फिर वो हमेशा के लिए खो जाती है अनगिनत ख़बरों की न देखी जा सकने वाली लम्बी कतार में. किसी की उपलब्धि का समाचार हो, तो अखबारों के पन्नो में इसके लिए स्थान मिलना शायद इस बात पर निर्भर करता है कि उसे एडिट करने वाले के पास इन बातों को समझ कर लिखने का समय है भी या नहीं.
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ऐसा ही एक समाचर को मैंने कानपूर के दो प्रमुख अखबारों में यह सोच कर दिया, कि प्रदेश ही नहीं देश के नाम को जिन छोटी बड़ी घटनाओं से विश्व पटल पर उंचा बन उभरने का सम्मान मिलता है, कभी कभी वो समाचार भी इस देश के समाचार पत्रों के लिए एक गैरजरूरी खबर होती है, क्यों कि उसमे कोई सेक्स का मसाला नहीं होता, किसी बलात्कारी दरिन्दे कि करतूतों को चाव से पढ़ सकने जैसा सस्पेंस नहीं होता और शायद अच्छी न्यूज़ को जान कर उसे एक सुन्दर शब्दों में पिरोने का समय नहीं होना भी एक मुख्या कारण हो सकता है, इन ढेर सारी अपराधों की ख़बरों को मुख्या खबर बनाने का.
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पर दुःख तब होता है जब कोई महत्वपूर्ण खबर जिसका प्रभाव समाज से जुडा होता है, वो भी अक्सर अनदेखी बन रह जाती है. ऐसा ही एक समाचार आज से कई साल पूर्व भी मैंने गंगा की दुखदायी दशा देख कर एक लेख के रूप मैं लिख कर अपनी इस मां समान नदी के महत्व को लोगों तक पहुंचाने हेतु दिया था. कारण था, उस समय गंगा के पुल पर से गंगा में बहते काले रंग के पानी को देख कर मेरी आत्मा मुझे धिक्कारने लगी, कि क्या इस देश कि आत्मा इतनी मर चुकी है कि हम अब इस पवित्र पावनी नदी में केवल सीवेज और केमिकल्स का जहर भी स्वीकार करने लगेगें.
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जब ये लेख किसी भी पत्र में नहीं छपा तो मैंने गंगा बेराज के पास एक स्वामी जी को इसे पढने के लिए दे दिया. स्वामीजी ने इसे अपने संपर्क से प्रमुख पत्रों में छपवाने का भरोसा दिलवाया. और मैं इन्तजार करता रहा. उसके कुछ दिनों के बाद अचानक मैंने देखा कि कानपूर में कुछ संगठन भी गंगा बचाने के लिए बन चुके हैं और कुछ लोगों ने तो इसको इस शहर में अपना एक स्थान बनाने में भी प्रयोग कर लिया. ये देख कर मन को कुछ सकून मिला कि कम से कम मेरा प्रयास कुछ तो रंग लाया. उसका लेख का शीर्षक था ” गंगा प्रश्न हमारी आस्था का या अस्तित्व का” और ये मैंने कुछ प्रमुख दैनिक पत्रों में स्वयं जाकर दिया भी था, पर वो लेख भी कहीं ख़बरों कि भीड़ में खो गया, जैसे कि मेरी छोटी सी उपलब्धि का ये समाचार. उस समय मैं जागरण जंक्शन का सदस्य नहीं था, वरना कम से कम वो लेख, इस सुन्दर मंच पर जरूर रखता. कम से कम जागरण द्वारा दिए गए इस मंच के लिए, हम सभी इस दैनिक के ह्रदय से आभारी हैं जिस कारण ये कुछ मैं यहाँ लिख कर आप तक पहुंचा रहा हूँ.
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पर ये देख कर थोडा दुःख होता है कि अब वो सारी बातें बैमानी हो चुकी हैं, कि देश का उत्थान और पतन उस देश के साहित्य और समाचार पत्रों में साहित्य, कविता और कला के लिए मिलने वाले स्थान को देख कर मालूम किया जा सकता है. जब इन बातों को और इन के रचियताओं को सम्मान मिलता है, तो वो देश और संस्कृत फलती और फूलती है. देश कि सम्पन्नता का प्रतिक होता है उस प्रदेश और देश का साहित्य, संगीत, कला और कविता. और जब ये विलुप्त होने लगते हैं तो देश की संम्पन्नता भी विलुप्त होने लगती है.
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ऐसी ही एक उपलब्धि को मैंने अपने सहर कि उपलब्धि समझ कर बाटना चाह था, कि मेरे एक अंग्रेजी कि गीत को विश्व के सर्वशेष्ट्र गीतों में ‘SONG OF THE YEAR’ पहला स्थान भले ही नहीं मिल पाया हो, पर सेमीफाइनल तक पहुँचने का अवसर भी पुरे भारत में अकेले कानपूर को प्राप्त हुआ था, पर जब ये पांच सितम्बर 2013 कि खबर लिख कर देने के बाद भी जब वो समाचार अपना इन सम्मानित अखबारों में अपना स्थान नहीं बना सका तो मुझे ये यकीन होने लगा कि शायद इस देश में किसी बदलाव कि उम्मीद करना केवल अपने को धोके में रखना है.
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फिर भी जंक्शन के साथी लेखकों में इस बात और छोटी सी खुसी को बाँट कर, मेरा अपने को धोखे में रखना शायद कुछ दिन तक मेरे एक बदले भारत कि उम्मीदों के सपनों को जीवित रख सकेगा, जो देश और प्रदेश के रोज रसातल में जाते राजनैतिक और सामाजिक मूल्यों को देख कर हर दिन एक महान भारत कि तस्वीर को धीरे धीरे मिटते देख बस आहात हो रह जाता है.
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मैंने अपने इस म्यूजिक विडियो को “SUMMER DAYS ARE COMING’ जिसे कि विश्व के उत्कृष्ट गीतों में से एक गीत होने का एवार्ड मिला है अपने You Tube के म्यूजिक चैनल “RavindraKK1” पर डाल दिया है और आप भी इसे देख और सुन सकते हैं. गीत का हिंदी अनुवाद भी मैं इसी लेख में दे रहा हूँ.

गीत को सुनने के लिए You Tube URL है

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Poetry Soup पर गीत को अंग्रेजी में देखने के लिए URL है, जिस पर आप इस गीत के कमेंट्स भी देख सकते हैं.
इस गीत को मिले International Award ko निम्न URL पर देखा जा सकता है
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http://songwriting.songoftheyear.com/ravindrakapoor.html
गीत – “SUMMER DAYS ARE COMING”-
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“गर्मी के दिन आ रहे हैं” अंग्रेजी का एक रॉक सांग
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गर्मी के आने वाले दिनों में
मैं भर लूँगा तुम्हें अपनी बाहों में
और गर्मी की रातों में
हम गायेंगे अपने प्रेम गीत . 01
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जब चन्द्रमा की रौशनी अपने स्पर्श से
सागर की सोती लहरों को जगाएँगी
और जब तुम्हारी नर्म मुलायम बाहें
समेट रही होंगी मुझे अपने आगोश में . 02
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गर्मी के आने वाले दिनों में
मैं भर लूँगा तुम्हें अपनी बाहों में
और गर्मी की रातों में
हम गायेंगे अपने प्रेम गीत . 03
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मुझे अहसास है , कि तुम क्यों देखती हो
चुम्बन हेतु ऊपर उठती सागर कि लहरों को
जिस समय चन्द्रमा उड़ेल रहा होता है
अपने प्रेम का अमृत रस सागर पर . 04
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सागर कि ऊपर उठती लहरों का आनंद देख
तुम हमेशा ही प्रेम आल्हादित हो जाती हो
और जल वृष्टि करने वाले बादलों की तरह
तुम अपने प्रेम की वृष्टि से मुझे भिगो दोगी. 05
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गर्मी के आने वाले दिनों में
मैं भर लूँगा तुम्हें अपनी बाहों में
और गर्मी की रातों में
हम गायेंगे अपने प्रेम गीत . 06
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ओ, प्रियतमा , मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
गर्मी के उन दिनों के आने की
जब गर्मी के दिनों में तुम अपने
प्रेमरस की बारिस से मुझे भिगो देती हो .07
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गर्मी के आने वाले दिनों में
मैं भर लूँगा तुम्हें अपनी बाहों में
और गर्मी की रातों में
हम गायेंगे अपने प्रेम गीत . ०८
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रवीन्द्र
कानपूर ०९ ०९ २०१३

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