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सुप्रीम कोर्ट के गंभीर संकट पर - एक कविता

Posted On: 13 Jan, 2018 Others में

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Ravindra K Kapoor

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A Poem currently in Hindi on Today’s grave crisis of our Supreme Court – हमारे सुप्रीम कोर्ट के गंभीर संकट पर वर्तमान में – हिंदी में एक कविता –

न्याय मुर्तियों के – कलके विक्षोभ ने
पहली बार – भारत के इतिहास में
अचंभित कर दिया- जन मानस को
कैसे, ऐसा क्या हो गया – कि उनका
विक्षोभ – इतना उग्र हो गया
कि आवश्यकता पड़ी – जनता के सामने
आकर बतलाने की – अपनी व्यथा. 01
.
ये न्याय दिलाने के -ये वो प्रहरी हैं
जिनके भरोसे – पूरा देश रहता है
कि कम से कम – अपनी सर्वोच्च अदलालत
से मिलेगा न्याय – अन्याय के इस
घोर जंगल में – जहां छल कपट – हरपल
ताक में रहते हैं – गरीब और शोषित की
खून की एक एक बूँद – तक चूसने को. 02
.
झूठे और मक्कारी के मुक़दमे चलाना
आज के अनेक वकीलों का -जहां
आज एक आम और ख़ास – पेशा हो
छल और कपट मुँह बाए – जहां इंतज़ार करता हो
हर पग पर गरीबों और अनपढ़ – लोगों की
जेब नोंचने को- जब तक उनके पास का
सारा पैसा -रुपया-दौलत, ख़त्म नहीं हो जाता. 03
.
वो दौड़ते रहते हैं – न्याय की इसी आस में
कि भले ही देश की – निचली अदालतों से
न्याय न मिल पाए – पर हमारी सर्वोच्च अदालत
जरूर देगी हमें न्याय – भले ही सब कुछ
छिन और खो चुका हो – न्याय पाने की आस में,
भले ही जवानी से निकल – बुढ़ापा आ चुका हो,
एक अंतिम न्याय की – चिर उम्मीद में
सर्वोच्च अदालत के – इन गुमनाम से माननीयों से. 04
.
ऐसे गुमनाम से इन महा जनों में – विक्षोभ
वो भी केवल इसलिए कि – कुछ मुक़दमे
आपको नहीं दिए गए – और दूसरों को दिए गए
आपसे ज्यादा – इस देश के जन मानस को
विचलित कर देगा कि वो कैसे – न्याय पा सकेगा
उन महा जनों से – जो खुदही दुखी और उदास हैं
टूट गयी कल आपके विक्षोभ से – उसकी मजबूत आस्था. 05.
.
काश आप सब महान जन – ढूंढ पाते कोई और रास्ता
काश अभी भी और न बिगड़े – ये तकलीफ और ये बात
क्योंकि घात में हैं – देश के दुश्मन और मक्कार
आपके विक्षोभ और इस स्थिति का फायदा उठाने को. 06
Ravindra K Kapoor
13th Jan. 2018

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