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स्वतंत्रता दिवस की मेरी भावनाएँ

Posted On: 18 Aug, 2013 Others में

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Ravindra K Kapoor

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६७ वें ‘स्वतंत्रता दिवस की मेरी भावनाएँ’
.
ये कविता स्वतंत्रता दिवस पर उठी मेरी भावनाओं को
केवल जनमानस तक पहुंचाने की एक चेष्टा है, जो की
मूल रूप से इंग्लिश में लिखी गई थी और १५ अगस्त को ही
Poetry Soup पर इसे ‘FEELINGS ON OUR INDEPENDENCE DAY’
के शीर्षक से पोस्ट कर दिया गया था . जागरण जंक्शन
पर इसका हिन्दी भाव मूल कविता पर टिप्पणियों के साथ
प्रस्तुत है. अपने जागरण के हिन्दी साथियों की प्रतिक्रिया का मुझे
इन्तजार रहेगा और में उसके लिए आपका आभारी रहूँगा.
रवीन्द्र
http://poetrysoup.com/poems_poets/poem_detail.aspx?ID=499066
.
.

मेरे देश को, अभी देखना शेष है
एक झलक, ऐसे फूलों से महकते
मनमोहक मौसम की
जब हवाएँ, बदलती ऋतुओं को देखकर
मौसम की ताल पर, प्रवाहित होंगी
पक्षी और तितलियाँ
हर गीत गा रहे और आनंदमग्न
मेरे देशवासियों को
अपना मनमोह लेने वाले न्रत्य दिखायेंगी. ०१
.
मैं अपने स्वतन्त्रता दिवस को
आनन्दित हो मानना चाहता हूँ
जिसके लिए मैं कोशिस भी कर रहा हूँ
अपने उदास चेहरे पर
एक मुस्कान लाने की
पर मैं कैसे प्रसन्न हो सकता हूँ
जबकि मेरे देश की स्वतंत्रता ही
खतरे में हो
और भारत को घेरे चिरस्थायी शक्तियाँ
हमें विचलित कर
लगातार कोशिस कर रही हैं
इस विकास उन्मुख देश की
शांती और सम्रद्धि को नष्ट करने की. ०२
.
कब तक हम देखते रहें और कैसे
भरोसा कर इंतज़ार करते रहें
ओ’ हमारे स्वप्न निर्माताओं
तुम्हारे झूठे स्वप्नों की
“एक सुनहरे और रंगीन भविष्व के”
जब कि एक बहूत बड़ी संख्या में
हमारे स्वप्नों के निर्माता
भ्रष्टाचार के गहरे पानी में
आकंठ डूबे हुए हैं
और कुछ गंभीरतम
अपराधों के दलदल में. ०३
.
कई लोग अभी भी पुनः
अपने वोट बैंक को सुरक्षित
करना चाहते हैं
धर्मं और जाती के आधार पर
लोगों को बाँट कर
राष्ट्र की सुरक्षा की कीमत पर
फिर भले ही कुछ मासूम लोगों को
अपने घर और अपनों को छोड़ कर
अपने साथियों से दूर बेबस हो
किसी दूसरी जगह जा
अपनी जान बचाने हेतु मजबूर हो
क्यों न रहना पड़े
जो की सदियों से
रह रहे थे अपने ही घरों में. ०४
.
ऐसे कई स्वप्न निर्माता
घुटनों डूबे खड़े हैं
लालच की नशीली नदी में
और फिर भी उन्हें चाहत है
अधिक और अधिक अंतहीन धन
और दौलत के साथ
हथियार और गोला बारूद की
और इनसे भी कहीं अधिक ऊँची से ऊँची
कुर्सी की जहां से वो
अपनी जहर रुपी बकवास को
पुरे देश में फैला सकें. ०५
.
हमारे स्वप्नों के कुछ निर्माता
अपने स्वार्थ लाभ के लिए
चुनते हैं कुछ ऐसे व्यक्ति
जो कि आकंठ भ्रस्टाचार में लिप्त हैं
और कुछ के हाँथ ही नहीं उनके
चेहरे भी दागदार हैं
अपराधिक गुनाहों के
निम्नतम अपराधों से. ०६
.
यह एक महान राष्ट्र के लिए
कैसी दयनीय बेचारगी है
जिसके पास हो एक शक्तिशाली
मजबूत सेना
और एक अति विशाल युवा पढ़ी
फिर भी वो असहाय हो कर
केवल देख रहा हो अपनी सीमाओं पर
शत्रुओं के चलते नियमित खेल को
और उन दुश्मनों के खेल को भी
जो कि देश के अन्दर से ही
इस देश को मिटाने की हर संभव
कोशिस लगातार कर रहे हों. ०७
.
ये हमारी सीमाओं के बहार के
और सीमाओं के अन्दर के
दोनों ही शत्रु
लगातार उन योजनाओं को बनाने
मैं व्यस्त हैं
जिससे कि देश में
घुसपैठ और विनाश जैसी स्थित
बनाई रख्खी जा सके.
.
भारत से नफरत करने वाले
इन सुप्रशिक्षित दोनों ही प्रकार के
दुश्मनों के द्वारा
जो अक्सर एक शांतिप्रिय नागरिक
के भेष में छुप कर भी हमारे बीच
कार्य करते हैं और कभी
एक नेता के भेष में भी. ०८
.
मेरे राष्ट्र को घेरे ये दुश्मन
केवल छिनने में विश्वास रखते हैं.
न केवल मेरे देश की और
हिमालय की शांति
वरन पूरी पृथ्वी की शांति को भी
क्यों कि ये विश्वास रखते हैं
केवल धोखे, झूठ , हिंसा और विनाश में.

क्यों कि इनके आकागण
पूरी पृथ्वी को
अपने अधीन करना चाहते हैं
बुद्धा और यशु की तरह नहीं
प्रेम और शांति के द्वारा
वरन नफरत और हिंसा से
हर संभव विनाश की कीमत पर
फिर विनाश चाहे मनुष्य का हो
या प्रक्रति का. ०९
.
मगर देश की सीमाओं पर
खड़े ये दुश्मन युद्धउन्मादित देश
जो की झूठ और धोके की
नींव पर खड़े हैं
इस राष्ट्र की वास्तविक ताक़त को
नहीं समझते
जो है हमारे जनमानस में
और है राष्ट्र के साहस में
हमारी सशस्त्र सेना के मनोबल में
जो उन्हें दे सकने में सक्षम हैं
एक अच्छा सबक
अगर आवश्यकता हुई संप्रभुता को
बचाने की इस शान्ति प्रिय राष्ट्र की. 10 .

रवीन्द्र
कानपूर भारत 15th Aug. 2013

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