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श्रीराम ने भक्त हनुमान पर किया था ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, इस कारण से पवनपुत्र के बचे प्राण

Posted On: 14 Jan, 2016 Spiritual में

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कहते हैं आज तक के इतिहास में संकटमोचक हनुमान जैसा भक्त न हुआ है और न ही होगा. वाल्मिकी रामायण में रामभक्ति से जुड़े हुए पवनपुत्र हनुमान के कई प्रसंग मिलते हैं. जैसा कि हम सभी जानते हैं प्रभु श्रीराम द्वारा सीता को लंका से वापस लाने के प्रयासों में रामभक्त हनुमान ने शुरू से अंत तक श्रीराम का साथ दिया था. इतना ही नहीं लंका में युद्ध के समय लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर हनुमान द्वारा लाई गई संजीवनी बूटी से लक्ष्मण को जीवन दान मिला था. वहीं दूसरी ओर महाभारत काल में कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने थे. उस समय भी हनुमान अपने लघु रूप में रथ पर विराजमान थे. भगवान श्रीराम भी हनुमान को अपने भाईयों जितना ही स्नेह करते थे.


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लेकिन पद्मपुराण में वर्णित एक कहानी के अनुसार एक बार श्रीराम ने अपने गुरू के कहने पर भक्त हनुमान पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था. नारद मुनि को हनुमान से असुरक्षा की भावना आने लगी क्योंकि वो भगवान विष्णु के अवतार राम के भक्त थे. उन्हें प्रतीत होता था कि उनसे अधिक भगवान राम को कोई प्रेम नहीं कर सकता इसलिए उन्होंने भक्त हनुमान की परीक्षा लेने की योजना बनाई. एक बार भगवान राम ने एक भोज का आयोजन किया, जिसमें बहुत से ऋषि-मुनियों को निमंत्रण दिया गया. उस भोज में गुरु विश्वामित्र भी आए थे. नारद मुनि ने बड़ी योजनाबद्ध युक्ति से हनुमान से गुरु विश्वामित्र का सत्कार न करने का सुझाव दिया था.

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उन्होंने कहा विश्वामित्र को ज्यादा सेवा-सत्कार पसंद नहीं है. वहीं दूसरी ओर नारद ने विश्वामित्र को हनुमान के प्रति उकसा दिया कि हनुमान ने अंहकारवश आपको अनदेखा किया. विश्वामित्र ने नारद मुनि की बातों में आकर राम को हनुमान को दंडित करने का आदेश दिया. अपने गुरु की बात को राम टाल नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने ध्यान में मग्न हनुमान को मारने के लिए कई हथियारों का प्रयोग किया. लेकिन हनुमान पर असर नहीं हुआ. तब श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया लेकिन इस बार भी हनुमान को कोई हानि नहीं पहुंची. नारद ये सब देखकर हैरान थे. उन्होंने आगे बढ़कर हनुमान से इस बारे में पूछा, क्योंकि ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाना असंभव था.


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हनुमान ने नारद मुनि को कहा ‘मैं राम नाम जपने में व्यस्त था. मुझे इस बात का अनुभव ही नहीं हुआ कि आसपास क्या हो रहा है. मुझे स्वंंय को किसी से श्रेष्ठ साबित करके क्या प्राप्त हो जाएगा. मेरे लिए रामभक्ति ही मेरा कर्म है’. हनुमान के मुख से ऐसी बातें सुनकर नारद मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ. वे आत्मग्लानिता से भर उठे. उन्होंने हनुमान से अपनी करनी के लिए क्षमा मांगी और सारी बात श्रीराम को भी बताई. श्रीराम ने नारद मुनि से कहा ‘वो पहले से ये बात जानते थे किंतु नारद को एक सीख देना चाहते थे. जिसके कि उनका अंहकार टूट सके…Next


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