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राम ने नहीं सीता ने किया था राजा दशरथ का पिंडदान, ये पांच जीव बने थे साक्षी

Posted On: 4 Dec, 2015 Others में

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रामायण से जुड़ी ऐसी कई कहानियां है जो सभी के लिए आश्चर्य का विषय है. श्रीराम के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती रामायण की कथाएं कोई न कोई सीख देती है. देखा जाए तो रामायण की रोचक कहानी की शुरुआत श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के 14 साल के वनवास गमन के बाद ही आरंभ होती है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता  के वनवास जाने के पश्चात राजा दशरथ ने पुत्र वियोग में प्राण त्याग दिए थे. वाल्मिकी रामायण के अनुसार राजा दशरथ का अंतिम संस्कार भरत और शत्रुघ्न ने किया था लेकिन क्या आप जानते हैं उनका पिंडदान राम ने नहीं बल्कि देवी सीता ने किया था.


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‘गया स्थल पुराण’ के अनुसार एक पौराणिक कहानी मिलती है जिसके अनुसार राजा दशरथ की मृत्यृ के बाद राम के अयोध्या में न होने के कारण भरत और शत्रुघ्न ने अंतिम संस्कार की हर विधि को पूरा किया था. लेकिन राजा दशरथ की आत्मा तो राम में बसी थी. इसलिए अंतिम संस्कार के बाद उनकी चिता की बची हुई राख उड़ती हुई गया में नदी के पास पहुंची. उस दौरान राम और लक्ष्मण स्नान कर रहे थे जबकि सीता नदी किनारे बैठकर रेत को हाथों में लिए विचारों में मग्न थी. इतने में देवी सीता ने देखा कि राजा दशरथ की छवि रेत में दिखाई दे रही है. उन्हें ये समझते हुए देर न लगी कि राजा दशरथ की आत्मा राख के माध्यम से उनसे कुछ कहना चाहती है. राजा ने सीता से अपने पास समय कम होने की बात कहते हुए अपने पिंडदान करने की विनती की. सीता ने पीछे मुड़कर देखा तो दोनों भाई जल में ध्यान मग्न थे. सीता ने समय व्यर्थ न करते हुए राजा दशरथ की इच्छा पूरी करने के लिए उस  फाल्गुनी  नदी के तट पर पिडंदान करने का फैसला किया.


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उन्होंने राजा की राख को रेत में मिलाकर हाथों में उठा लिया. इस दौरान उन्होंने फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी, अक्षय वट और एक ब्राह्मण को इस पिंडदान का साक्षी बनाया. पिंडदान करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण जैसे ही सीता के करीब आए. देवी सीता ने सारी कथा कह सुनाई. ये बात सुनकर राम को सीता पर विश्वास नहीं हुआ. सीता ने राम को समझाने के बहुत प्रयास किए. अंत में सीता ने राजा दशरथ के पिंंडदान के साक्षी पांच जीवों को बुलाकर सत्य बताने का आग्रह किया. लेकिन श्रीराम को क्रोधित देखकर फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी, और ब्राह्मण ने असत्य बोलते हुए ऐसी किसी भी घटना के होने से इंकार कर दिया. जबकि अक्षय वट ने सत्य बोलते हुए सीता का साथ दिया.



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अन्य सभी जीवों की बातें सुनकर सीता शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठी. उन्होंने चारों जीवों को श्राप दे दिया. जबकि अक्षय वट को वरदान देते हुए कहा ‘तुम हमेशा पूज्नीय रहोगे और जो लोग भी पिंडदान करने के लिए गया स्थल आएंगे वो अक्षय वट के पास भी जरूर पूजन करेंगे तभी उनकी पूजा सफल होगी. असत्य बोलने वाले जीवों में सीता ने गाय को श्राप दिया था कि वो लम्बे समय तक नहीं पूजी जाएगी. वही फाल्गुनी नदी के पानी को सूख जाने का श्राप दिया. इस नदी में आज भी ज्यादा पानी नहीं रहता. वहीं तुलसी को गया में न उगने का श्राप दिया. आखिर में ब्राह्मण को श्राप देते हुए देवी सीता ने कहा कि तुम कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाओगे. वस्तुओं को पाने की लालसा आप में हमेशा रहेगी…Next


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