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नागपंचमी विशेष : इस वजह से मनाई जाती है नागपंचमी, ऐसे हुई थी नागों की उत्पत्ति

Posted On: 15 Aug, 2018 Spiritual में

Pratima Jaiswal

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दुनिया रहस्यों से भरी हुई है. इन रहस्यों में से एक है सांपों की रहस्यम कहानियां. हमारे पुराणों में सांपो से जुड़ी हुई कई कहानियां मिलती हैं, वहीं सांपों को धार्मिक अनुष्ठानों से भी जोड़कर देखा जाता है. सांपों से जुड़ा ऐसा ही एक त्यौहार नागपंचमी. आइए, जानते हैं नागों से जुड़ा पौराणिक महत्व.

 

क्यों मनाई जाती है नागपंचमी
ऐसी मान्यता है कि श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि को समस्त नाग वंश ब्रह्राजी के पास अपने को श्राप से मुक्ति पाने के लिए मिलने गए थे। तब ब्रह्राजी ने नागों को श्राप से मुक्ति किया था, तभी से नागों का पूजा करने की परंपरा चली आ रही हैएक दूसरी कथा भी प्रचलित है जहां पर ब्रह्राजी ने धरती का भार उठाने के लिए नागों को शेषनाग से अलंकृत किया था तभी से नाग देवता की पूजा की जाती है। एक कहानी के अनुसार समुद्रमंथन में वासुगि नाग को रस्सी बनाकर मंथन किया गया था, जिसके बाद नागों के महत्व के कारण नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है.

पुराणों में उल्लेखित कहानियों के अनुसार ऐसे हुई थी इन नागों की उत्पत्ति
नागों का जन्म ऋषि कश्यप की दो पत्नियों कद्रु और विनता से हुआ था।
शेषनाग
शेषनाग का दूसरा नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने अपनी दूसरी माता विनता के साथ हुए छल के कारण गंधमादन पर्वत पर तपस्या की थी। इनकी तपस्या कारण ब्रह्राजी ने उन्हें वरदान दिया था। तभी से शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर संभाले हुए है। धर्मग्रंथो में लक्ष्मण और बलराम को शेषनाग के ही अवतार माना गया है। शेषनाग भगवान विष्णु के सेवक के रूप में क्षीर सागर में रहते हैं।

 

वासुकि नाग
नाग वासुकि को समस्त नागों का राजा माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के समय नागराज वासुकि को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया था। त्रिपुरदाह यानि युद्ध में भगवान शिव ने एक ही बाण से राक्षसों के तीन पुरों को नष्ट कर दिया था। उस समय वासुकि शिव के धनुष की डोर बने थे।

तक्षक नाग
तक्षक नाग के बारे में महाभारत में एक कथा है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के श्राप के कारण तक्षक नाग ने राजा परीक्षित को डसा था जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। तक्षक नाग से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आकर गिरने लगे। तब आस्तीक मुनि ने तक्षक के प्राणों की रक्षा की थी। तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता हैNext

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