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'नया विकल्प' मोदी के विजय रथ के लिए संकट !!

Posted On: 9 Dec, 2013 Politics में

राजनीतिक सरगर्मियॉabout political thoughts,stability, ups and downs, scandals

Ram Pandey Editor Jagran Prakashan Limited

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ऐतिहासिक उपलब्धि मात्र एक वर्ष की राजनीति में नवजात पार्टी ‘आप’ ने हासिल कर दिखा दिया कि उसे अब एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया जाए। दिल्ली उकता गई थी परिपक्व राजनीति के छल-प्रपंच से और उसे विकल्प दे दिया केजरीवाल ने। नई पार्टी ने जनता में उम्मीद की नई किरण का पूरा-पूरा लाभ उठाया और भाजपा को क्लीन स्वीप करने से रोक दिया। ‘आप’ की इस सफलता ने राजनीति को एक नई परिभाषा प्रदान की है जिस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।


नए किस्म की राजनीति

साम-दाम-दण्ड-भेद से ऊपर उठकर विनम्र, सदाशयता से युक्त, आमजन के सुख-दुख में भागीदारी वाली राजनीति का नया रंग कुछ कह रहा है जिसे खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि इस विनम्रता और आमजन की राजनीति के पीछे की रणनीति कम राजनैतिक नहीं है परंतु जो मुजाहिरा इस ‘आप’ ने किया है वो न सिर्फ़ चौंकाने वाला है वरन् राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस-भाजपा के अतिरिक्त एक बिलकुल नया विकल्प पेश करने का संकेत भी दे दिया है। जब तक जनता के पास कोई विकल्प नहीं था तब तक या तो कांग्रेस थी या फिर भाजपा लेकिन नई परिस्थिति में ‘आप’ अपने अभियान को भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचाने के संकल्प के साथ नया विकल्प बन सकती है।


मोदी के विजय रथ पर संकट

कांग्रेस के खिलाफ माहौल वैसे भी होना है क्योंकि लगातार दो बार सत्ता का स्वाद वह चख चुकी है और जनता को एक नया विकल्प चाहिए। महंगाई और भ्रष्टाचार ने कांग्रेस को बेहद कमजोर किया है जिसका लाभ भाजपा को लोकसभा चुनाव के दौरान देखने को मिलेगा। कांग्रेस इस बात को अच्छी तरह जानती है भले ही वह इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न करे। कांग्रेस के समर्थक और स्वयं कांग्रेसी भी दबे-छुपे इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि 2014 के चुनाव में उनकी हार तय है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को आश्चर्यजनक सफलता मिल सकती है। किंतु इसी दर्मियान ‘आप’ का उभार और उसकी भावी रणनीति मोदी और भाजपा की संभावित सफलता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है। केजरीवाल की भावी रणनीति है दिल्ली से बाहर पांव पसारने की जिसका खुलासा उनकी पार्टी के कई नेता कर भी चुके हैं। उनकी इच्छा है कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में ‘आप’ को एक सशक्त विकल्प के रूप में पेश किया जाए। दिल्ली के चुनावी परिणाम इस बात की आंशिक ही सही लेकिन मजबूत ढंग से पुष्टि भी करते नजर आते हैं।


मुश्किल तो है किंतु नकार भी नहीं सकते

साध्य और साधन की पवित्रता को नकारने के बावजूद भी आज केजरीवाल साफ-सुथरी राजनीति के प्रतीक के तौर पर उभर रहे हैं जिसको अन्ना का समर्थन भी मिलना तय है। भले ही अन्ना यह कहें कि वह राजनीतिक पार्टी होने के कारण ‘आप’ का समर्थन नहीं करेंगे किंतु भावी परिदृश्य यही कहता है कि अन्ना अपना मूक समर्थन पहले से कहीं ज्यादा देंगे ताकि ‘आप’ की सफलता का मार्ग प्रशस्त हो सके। मोदी और उनके समर्थकों के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है कि राष्ट्रीय राजनीति में अगर केजरीवाल 40-50 सीटें पाने में कामयाब रहे तो कहीं उनके सपने दिल्ली की तरह धराशायी न हो जाएं!!!!



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