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अभिव्यक्ति या अश्लीलता - Jagran Junction Forum

Posted On: 12 Mar, 2013 Others में

नई दिशा की ओरआसमां और भी हैं …

आर.एन. शाही

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एक तरफ़ जहाँ देश में स्कूली शिक्षा के स्तर पर छोटे-छोटे बच्चों को यौन शिक्षा देने का मन बनाया जा रहा हो, वहीं इस पर बहस के दौरान ही पटना आर्ट्स काँलेज में गोपाल शून्य नामक कला के विद्यार्थी को मात्र इस आधार पर फ़ेल कर दिया जाना कुछ समझ में नहीं आया, कि उसने अपनी महिला टीचर को असाइनमेंट के तहत कामसूत्र के लघुचित्र प्रस्तुत करने की ज़ुर्रत कर डाली । यदि कला के उस विद्यार्थी का कृत्य आपत्तिजनक मानकर काँलेज प्रबंधन द्वारा एकमत से उसे फ़ेल करने के निर्णय को न्यायोचित माना जाय, तो फ़िर इस प्रश्न का खड़ा होना स्वाभाविक और समयानुकूल ही कहा जाएगा, कि आखिर अपनी किस मानसिक परिपक्वता की बिना पर हम छोटे स्कूली बच्चों को यौनशिक्षा प्रदान करने की तैयारियाँ कर रहे हैं ?

पटना आर्ट्स काँलेज प्रकरण जो प्रकाश में आकर वहाँ बहस-बवाल का मुद्दा बना हुआ है, उसका सार-संक्षेप यह है कि पाठ्यक्रम के तहत क्लास में मांगे गए लघुचित्र-असाइनमेंट में गोपाल शून्य नामक आर्ट के विद्यार्थी द्वारा कामसूत्र पर आधारित कुछ चित्र बनाकर अपनी महिला शिक्षिका रीता शर्मा को दिया गया, जिसे शिक्षिका ने उसकी विकृत मानसिकता का परिचायक मानते हुए काँलेज प्रबंधन के पास विद्यार्थी गोपाल द्वारा जानबूझ कर यौन प्रताड़ना की मंशा से अश्लील चित्र प्रस्तुत किये जाने की शिकायत की । प्राचार्य चन्द्रभूषण श्रीवास्तव की अध्यक्षता में काँलेज प्रबंधन की हुई बैठक में विद्यार्थी के कृत्य को सर्वसम्मति से आपत्तिजनक क़रार देते हुए उसे फ़ेल कर दिया गया ।

विद्यार्थी का पक्ष है कि उसकी पढ़ाई का विषय चूँकि ‘कामुकता’ पर ही केंद्रित रहा है, अतएव उसे लघुचित्र में कामसूत्र को कला के रूप में शामिल करने में कुछ भी असामान्य नहीं लगा था । असाइनमेंट में किसी स्थापित शैली की प्रतिकृतियाँ ही बनानी होती हैं । इस महाविद्यालय में प्रथम वर्ष में ही ‘नग्नता’ विषय की पढ़ाई होती है, फ़िर कामसूत्र से जुड़े चित्र, जिन्हें मुगलकाल तक में आपत्तिजनक नहीं माना गया, अश्लील माने जाने का कोई औचित्य नहीं बनता । कामसूत्र को तो हमारी परम्पराओं में भी कला के रूप में मान्यता दी गई है, फ़िर कला सिखाने वाले महाविद्यालय को इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।

जबकि शिक्षिका एवं काँलेज प्रबन्धन का तर्क़ है कि इस काँलेज में लड़कियाँ भी पढ़ती हैं, अत: ऐसी विकृत मानसिकता को बढ़ावा देकर हम गलत उदाहरण प्रस्तुत करने का मौका किसी विद्यार्थी को नहीं दे सकते । सम्बन्धित विद्यार्थी विकृत मानसिकता का है । यदि कामकला परम्पराओं में है, तो गुरुशिष्य परम्परा भी हमारे देश की ही परम्परा है, जहाँ किसी शिष्य को अपने गुरु की भावनाओं एवं सम्मान का ध्यान रखते हुए ही अपना आचरण निश्चित करना चाहिये । बहरहाल, इस विवाद में गोपाल शून्य का पलड़ा काफ़ी हल्का है, क्योंकि काँलेज के अधिकांश विद्यार्थी भी सम्भवत: उसकी सोच से इत्तफ़ाक़ नहीं रखते, और विरोध में मुखर हो रहे हैं ।

अब फ़िर वही पेचीदा सवाल सामने खड़ा है, कि क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं । साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है ।

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