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जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना...

Posted On: 12 Nov, 2012 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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सर्वप्रथम तो आप सभी को दीवावली के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं| साथ ही यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि यह कोई लेख नहीं है बल्कि एक अपील मात्र है और मुझे लगता है कि यह मंच भी एक सशक्त माध्यम है अधिक से अधिक लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का| अतः आप सभी सुधी जनों से करबद्ध अपील है कि-

– कृपया दीपावली पर दीये और रोशनी से इस पावन पर्व पर्व को मनाएं|


– मिट्टी के दीये प्रयोग करें जो कि इनवायरनमेंट फ्रेंडली भी हैं और किसी को आजीविका का साधन भी प्रदान करते हैं|


-कृपया उस व्यक्ति से ज्यादा मोल-भाव न करें जो मेहनत कर अपनी आजीविका चलाता है| ये अत्यंत हास्यापद बात है कि लोग एक सब्जी वाले से या रिक्शेवाले से तो 5-10 रुपये के लिए मोलभाव करते हैं लेकिन शराब की दुकान पर मूल्य से कहीं ज्यादा पैसे देने के लिए भी तैयार रहते हैं|


– कृपया आतिशबाजी का कम से कम प्रयोग करें, ये न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक, बल्कि धन का अपव्यय भी है| इस धन से आप किसी गरीब का कुछ भला कर सकते हैं| यदि आतिशबाजी करनी ही हो तो कृपया तेज आवाज के बम व पटाखे न चलाएं इससे बहुत से लोगों को परेशानी हो सकती है|


– जो गलती हम करते आये हैं उसे कृपया विरासत में हस्तांतरित न करें| विरासत में दें स्वच्छ पर्यावरण, सही सीख और मानव समाज के कल्याण के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा|



गोपालदास ‘नीरज’ जी की यह महान रचना तो सभी ने पढी ही होगी, इसे एक बार और पढ़ें, इसका मर्म समझें और इसका आनंद उठायें…


जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।



आपके इस अमूल्य सहयोग के लिए धन्यवाद|

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