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तुम्हारी खता की हमने सजा पाई

Posted On: 4 Oct, 2011 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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क्या कारण है कि 1962 के युद्ध में भारत ने चीन के हाथों से करारी पराजय देखी !


कांग्रेस के नेता आरम्भ से ही निकृष्ट और निर्लज्ज प्रवत्ति के रहें हैं, ये बात विश्वविख्यात है, पर देश की सेना का सत्यानाश कैसे किया था तनिक आप स्वयं ही अध्ययन कर लीजिए :-


भारत के सैनिक मोर्चो से पीछे हटते हिमालय की वादियों में नंगे पैर, बिना भोजन और औषधियों के कई-कई किमी. भटकते रहे. दिशाहीन एवं बदहवास भटकते हजारों सैनिक मृत्यु की नींद सो गए. 15 वर्ष की स्वतंत्रता देख रहा देश जिन बंदूकों से लड़ रहा था, उसका बैरल 25-50 राउंड फायर करने के पश्चात इतना गरम हो जाता था कि उसे चलाना तो क्या पकड़ना भी संभव नहीं होता था. बर्फ से आच्छादित हिमालय में पहनने के जूते नहीं, गरम कपड़े नही और र्प्याप्त प्रशिक्षण भी नही. युद्ध आरम्भ होने के लम्बे समय पश्चात हिन्दी-चीनी भाई-भाई जैसे नारों के जन्मदाता व प्रवर्तक तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, नारा छोड़कर देश के लिए लड़ों-मरो के भाषण देने लगे. ऐसे खोखले भाषणों से कभी कोई सेना लड़ी है क्या? अपने आपको विश्व की महान हस्ती बनाने की कूटनीतिक त्रुटियाँ करते चले गए. कबूतरों को उड़ाकर देश की वायु सीमाओं को सुरक्षित समझते रहे. गुलाब का प्रयोग उन्हे शत्रु देशों को परास्त करने में गोला-बारूद दृष्टिगोचर होता रहा.

1950 में भारत से दूर कोरिया पर चीन ने आक्रमण किया तो नेहरू विश्व में घूम-घूम कर उस पर चिन्ता व्यक्त करते रहे. ठीक इसी वर्ष 1950 में चीन ने तिब्बत पर भी आक्रमण किया, जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत खतरनाक था.  परन्तु इस सम्बंध में न तो नेहरू बोले, न कृष्ण मेनन, न सरकार का कोई अधिकारी. सब मुहं में दही जमा कर बैठे रहे !!


1950 से 1960 के 10 वर्षों में चीन ने तिब्बत से हिमालय की अग्रिम चौकियों तक सड़क मार्ग बना डाले. यातायात के बढ़िया संसाधन खड़े कर लिए. हिमालय की सीमा तक वह सेना के साथ बढ़ता चला आया. नेहरू आंखे बंद कर चुप रहे. प्रायोजित भीड़ के बीच हाथ हिला-हिलाकर हिन्दी चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे. दिल्ली की राजनीतिक पार्टियों में चीनियों के साथ सामूहिक फोटो खिंचाकर पंचशील का मंत्र जपा जाता रहा.  चीन के राजनेता और कूटनीतिज्ञ प्रसन्न थे- नेहरू और उसके साथियों के इस आत्मघाती, आत्ममुग्ध व्यवहार पर. हिमालय की सुरक्षा के सम्बंध में हमारी क्या रणनीति है, यह आज जितनी कमजोर है, तो उस समय के बारें में आप स्वयं ही कल्पना कर सकते हैं. चीन अधिकृत हिमालय में उसकी सीमा के भीतर अंतिम छोर पर चीन ने पक्की सड़के बना  ली है. भारी गोला बारूद और रसद ले जाने के लिए उनके पास अग्रिम मोर्चे तक पक्की सड़के हैं.


दूसरी ओर भारत की ओर से सीमा पर पंहुचने के जो मार्ग हैं, उनमें कई स्थानों पर पक्की सड़क के अंतिम बिंदु से सीमा चौकियों तक पंहुचने का माध्यम तब भी खच्चर था और आज भी खच्चर है. आज भी बेस कैम्प से अग्रिम सीमा चौकी तक जाने में कहीं-कहीं तीन से चार दिन का समय लगता है. आज भी, पर्याप्त सीमा तक, भारतीय सेना और आईटीबीपी अपने शस्त्र व रसद खच्चरों पर ढ़ोकर सीमा पर ले जाती है.


सोचिये, 1962 में जब चीन ने आक्रमण किया था तब क्या स्थिति रही होगी. पराजय की भीषणता का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है. इस पूरी पराजय, दुरावस्था और अपमान के लिए यदि कोई एक व्यक्ति उत्तरदायी है तो वे हैं केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू. 1962 की लज्जास्पद पराजय के पश्चात अपने मंत्री से त्यागपत्र मांगने के स्थान पर नेहरू स्वयं त्यागपत्र देते तो सीमा पर शहीद हुए सैनिक तो नहीं लौट सकते थे, पराजय विजय में तो नहीं बदल सकती थी, परन्तु त्रुटी पर थोड़ा पश्चाताप जनमानस के अवसाद और पीड़ा को तो कम कर ही सकता था. परन्तु हमारे नेहरूजी….. लता मंगेशकर के एक गीत पर चंद आंसू बहाकर सैनिकों को श्रद्धांजलि दे फिर से प्रधानमंत्री बने रहने में व्यस्त हो गए.


चीन के हाथों हुई हमारी पराजय और चीन के कब्जे वाला भारत का वह भू-भाग भारत के मुहं पर एक ऐसा तमाचा है, जिसे कम से कम आने वाली एक शताब्दी तक तो नहीं भूला जा सकता. यहां फिर प्रश्न पैदा होता है कि सुभाषचन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर से न हटाया गया होता, वे विदेश ना जाते, देश में रहकर अंग्रेजों से लड़ते रहते तो स्वतंत्र भारत में वे क्या होते? अपनी श्रेष्ठता के कारण वे निश्चित ही भारत के प्रधानमंत्री होते.


वे होते तो भारत की कूटनीति और विदेश नीति फूलों और पक्षियों से नहीं समझाते, अपितु ”तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे विजयश्री दूंगा” जैसे नारों से जनता को बताते. सुभाष के रहते चीन के हाथों भारत की पराजय सपने में भी संभव नहीं थी. तब चीन ने भारत पर आक्रमण तो दूर तिब्बत पर भी आक्रमण करने से पूर्व हजारों बार सोचना था, परन्तु अफसोस ऐसा नहीं हुआ.

लेखक- अश्विनी श्रीधर

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