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बुरा मानो या भला

Posted On: 31 Aug, 2011 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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आपने टेलीपैथी के बारे में सुना ही होगा और शायद कभी-२ इसका अनुभव भी किया होगा| मुझे आज एक बार फिर इसका अनुभव हुआ| आज ही राजकमल जी का लेख जो कि अनीता पाल पर केंद्रित था, पढ़ा | इसके बाद अनीता जी के लेख पर जाकर उसे पढ़ा और साथ ही लोगों की प्रतिक्रियाएं भी पढीं| सोच रहा था कि इस विषय पर जरूर लिखूंगा कि इतने में अपने लेख पर अनीता जी की एक संक्षिप्त टिप्पणी प्राप्त हुई| अब ये पता नहीं ये टेलीपैथी की वजह से हुआ या राजकमल जी के लेख के बाद उन्होंने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है, पर ये एक संयोग ही है|

 

लगभग ८-९ महीने पहले जब इस प्लेटफार्म पर ब्लॉग्गिंग करनी शुरू की थी तो मैं भी यहाँ पर नया-२ बकरा था| धीरे-२ लोगों की पीठ खुजा कर अपनी पीठ पर खुजली करवाने की कला भी समझ में आई| आदरणीय शाही जी के लेखों ने भी काफी कुछ सिखाया जिसकी सहायता से मैंने भी कुछ समय तक ज्यादा पठित, ज्यादा चर्चित और अधिमूल्यित कैटेगरी में घुसने की होड की और कुछ हद तक सफलता भी पाई|

 

लेकिन इस खेल की शुरुआत करता है जागरण जंक्शन| एक सधी-सधाई स्ट्रेटेजी के तहत जेजे नए मुर्गे तलाशता है और सबसे पहला चुग्गा फेंकता है ‘मोस्ट व्यूड ब्लोगर ऑफ द वीक’ का| सिर्फ २-३ पोस्ट लिखकर ही एक चीकना पात इस खिताब पा लेता है (एक-बार से ज्यादा चुने हुए अपवाद हैं)| इस झांसे में मैं भी आ चुका हूँ, बल्कि जिस रचना पर मैं ‘मोस्ट व्यूड ब्लोगर ऑफ द वीक’ बना था वो मेरे अपने नजरिये से ही इस काबिल नहीं थी| अब जब आदमी इस महान खिताब को पा लेता है तो फिर उसकी नजर पड़ती है ज्यादा पठित, ज्यादा चर्चित और अधिमूल्यित कैटेगरी पर, बस फिर वो महान लेखक इस कैटेगरी में घुसने की होड में उसी प्रकार की हरकतें करने लगता है जैसे कि एक भुट्टा भूने जाते समय भडभड़ाता है| इस सारे खेल को समझते-२ एक कच्चा ब्लॉगर इस भट्टी में भली भाँती भुनकर एक तपा हुआ ब्लॉगर बनकर बाहर निकलता है |

 

मेरा तो सुझाव है कि जैसे ही कोई नया ब्लॉगर जेजे पर ज्वाइन करता है उसे शाही जी की रचना ‘टॉप ब्लॉगर’ इंस्ट्रक्शन मैनुअल के तौर पर पढ़ने को देनी चाहिये जिससे कि वो बकरा न बन पाए|  वरना नया-२ ब्लॉगर अपनी तरफ से तो बड़ी सफाई से काम करता है पर उसे ये एहसास नहीं होता कि यहाँ पर एक से बढ़के एक खुर्रांट ब्लॉगराचार्य सारी हरकतों पर नजर रखे हुए हैं| मैंने बहुत कोशिश की कि मैं भी अपनी छाती पर कुछ तमगे लटकाकर टॉप पे लटक जाऊं पर तमाम कोशिशों के बावजूद ३५-४० रचनाओं पर भी कुल मिलाकर इतने तमगे नहीं लटका पाया जितने कि कोई-कोई एक ही रचना पर खुद ही टाँक लेता है|

 

वैसे ये प्रतिक्रियाओं का खेल है बड़ा मजेदार| कोई एक करे तो आप उसका जवाब तीन किश्तों में भी दे सकते हो| इस प्रकार आपको वास्तविक कमेन्ट तो एक मिलता है पर कम्प्यूटर गिनता है चार, और खुदान्खास्ता कोई पंगे बाज कमेन्ट कर दे तो तुम भी उसके उंगली करते रहो और दो के चार, चार के आठ,……करते रहो और बल्ले-२ करते रहो….

 

वैसे कभी-२ अपवाद भी हो जाते हैं, अर्थात कोई रचना ही ऐसी महान होती है जिन पर लेखक को खुद कमेन्ट करने की जरूरत ही नहीं होती बल्कि लोग खुद ही ताबडतोड कमेन्ट कर देते हैं| पिछले वर्ष एक महान रचना जो कि बाबा रामदेव पर लिखी गई थी, पर लेखक को इतनी गालियां पड़ीं कि उन्हें अपना एक भी कमेन्ट करने की जरूरत ही नहीं हुई और वो रचना साल की सर्वाधिक चर्चित, पठित और टॉप रचनाओं में थी| इस महान उपलब्धि का पैमाना क्या था, और वो कौन से टोटके थे जिन्हें मैं आज तक समझ नहीं पाया|

 

लगता है कि मैं फिर मेन मुद्दे से भटक रहा हूँ, इसी वजह से लेख कई गज लंबे हो जाते हैं और बेचारे फीते वालों को इनकी लम्बाई मापने में कष्ट उठाना पड़ता है|

 

तो आज राजकमल जी का अनीता जी पर केंद्रित लेख अनीता पाल’ राजकुमारी एक खलनायिका” पढ़ा| प्रतिक्रियाओं में भी उनके विचारों से बहुत से लोग सहमत थे| फिर मैंने अनीता जी का वह लेख भी पढ़ा जिस पर कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया करते हुए मर्यादा को भी पहचानने से इनकार कर दिया था| मेरा अपना मत है कि अनीता जी के अपने विचार हैं और राजकमल जी के भी अपने विचार हैं, बल्कि हर मनुष्य के विचार भिन्न-२ होते हैं इसीलिये मनुष्य भेड नहीं है| विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है| राजकमल जी ने तो अपनी सधी हुई शैली में अपने विचार व्यक्त किये पर अक्सर देखा गया है कि प्रतिक्रिया करते हुए कुछ लोग अपना एक माइंड सेट कर लेते हैं और फिर अपनी गलत बात को ही आगे बढाने के लिए झुकने को राजी नहीं होते| बल्कि मेरा विचार है कि ज्यादातर लोग लेख ठीक से पढते ही नहीं बल्कि ‘आई स्कैनिंग’ करते हैं और इस स्कैनिंग में उनकी आँख ने अच्छा पकड़ लिया तो अच्छा और बुरा पकड़ लिया तो फिर उनकी प्रतिक्रिया वहीं से शुरू हो जाती है|

 

अनीता जी के लेखों में उनके अपने विचार हैं और आपके लेखों में आपके | आप उनके विचारों से सहमत हों या न हों ये आपका अधिकार है, पर आप इसके लिए नाराज नहीं हो सकते| आप उनके लेखों पर प्रतिक्रिया दें न दें ये आपका अधिकार है और वे आपके लेखों पर प्रतिक्रिया करें न करें, ये उनका अधिकार है| ये जरूरी नहीं है कि आप अन्ना हजारे के समर्थक हों तो पूरे हिन्दुस्तान से ये ऐसी अपेक्षा रखें अन्यथा नाराज हो जांय| जरूरी नहीं कि सारा भारत वर्ष बाबा रामदेव का भक्त हो| आप लौकी-तोरी खुद खाएं, इसके फायदे भी बताएं पर किसी से उम्मीद न रखें कि वो आपकी बात मान ही लेगा| भला मुर्गे की हड्डियां तक उदर में उतार देने वाला आपकी बात मानेगा? हमारे देश के लोग इस कदर भावनात्मक हैं कि कब किसके भक्त हो जांय और कब किसके लात लगा दें, पता ही नहीं चलता| और जिनके पीछे जनता पागलों की तरह झंडा उठाकर पागल हुई जा रही है वो कब गुलाटी मार दें इसका भी जनता को पता नहीं है| कल तक स्वामी अग्निवेश टीम अन्ना में थे और उनकी भी जय-जयकार हो रही थी और आज देखिये कि सारा देश उन्हें लतिया रहा है| यदि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और डबल श्री का लक्ष्य एक है, यानी देश और जन की सेवा तो सब  साथ मिलकर आंदोलन क्यों नहीं करते| क्यों ये लोग एक-दूसरे के आन्दोलनों में फ़्लाइंग विजिट पर आते हैं|

 

चलते-चलते यही कहना चाहूँगा कि प्रतिक्रियाएं करते समय अपने विचार जरूर व्यक्त करें पर अपनी भावनाओं पर भी काबू रखें| ये संभावना जरूर लेकर चलें कि आपकी भाषा किसी को भी आहत कर सकती है और दूसरी ओर से भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया आ सकती है जो कि एक निरर्थक और अंतहीन बहस को जन्म देकर अप्रिय माहौल बनाती है|

 

अब बुरा मानो या भला, आपकी मर्जी|

 

धन्यवाद|

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