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मानसिक शोषण करतीं सोशियल साइट्स

Posted On: 17 May, 2012 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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अभी कुछ दिन पहले की ही बात है जब मैंने आम दिनों की भाँति फेसबुक पर एक फोटो अपलोड किया था तो उस पर अपने एक परिचित का कमेन्ट पढकर मुझे अत्यंत आश्चर्य हुआ जिसमें कि उन्होंने मुझसे अपनी नाराजगी जताते हुए प्रतिक्रिया की| आश्चर्य इसलिए हुआ कि उनके और मेरे बीच कभी ऐसी कोई बात ही नहीं हुई थी और न ही उस फोटो में ऐसा कुछ था कि किसी प्रकार की कोई नाराजगी होती| उनसे इस बाबत पूछने पर उन्होंने कोई जवाब भी नहीं दिया| अंततः मैंने अपनी ईश्वर प्रदत्त और सीमित बुद्धि से यही निष्कर्ष निकाला कि शायद वे इस बात से नाराज थे कि मैं सामान्यतः उनके किसी पोस्ट पर लाइक या कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था|

 

इसी प्रकार की एक और घटना अभी हाल ही की है जिसमें कि मैंने एक ग्रुप में अपनी पोस्ट डाली और वहाँ से अपने एक अन्य मित्र जो कि उसी ग्रुप में सदस्य थे, को उस पोस्ट पर मेंशन करने की कोशिश की लेकिन कर नहीं पाया| बाद में मुझे पता चला कि मेरे उन मित्र को उस ग्रुप के एडमिनिस्ट्रेटर ने किसी बात से नाराज होकर ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था| चूंकि मैं अपने उन मित्र को उस पोस्ट पर मेंशन करने में सफल नहीं हो पा रहा था और इस बात से अनभिज्ञ था कि तब वे ग्रुप में सदस्य नहीं रहे थे तो मैंने ग्रुप एडमिनिस्ट्रेटर से निवेदन किया कि वे इस पोस्ट को मेरे उन मित्र के वाल पर शेयर कर दें क्योंकि ग्रुप पोस्ट शेयर करने का अधिकार केवल ग्रुप एडमिनिस्ट्रेटर को ही होता है| इसके जवाब में उस ग्रुप एडमिनिस्ट्रेटर की प्रतिक्रया अत्यंत अविश्वश्नीय और आश्चर्यजनक रूप से डांटने वाले अंदाज में आई कि एक ग्रुप एडमिनिस्ट्रेटर का यह काम नहीं है और जो करना है मैं स्वयं करूं| जवाब में जब मैंने उन्हें इस जमीनी हकीकत से रूबरू कराने की कोशिश की कि वे किसी बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी के एडमिनिस्ट्रेटर नहीं बल्कि एक तुच्छ से फेसबुकिया ग्रुप के एडमिनिस्ट्रेटर हैं जिसकी कोई औकात नहीं है तो उन्होंने नाराज होकर मुझे भी उस ग्रुप से चलता कर दिया जिसमें कि उन्होंने स्वयं और बिना पूछे मुझे जोड़कर कभी असीम मानसिक शान्ति पाई थी| ये बात और है कि इस प्रकार बिना मेरी अनुमति के उन्होंने अपने ग्रुप में जोड़कर मुझे मानसिक अशांति प्रदान की थी| पर हाँ चाहे उनकी सोच और समझ कितनी भी घटिया हो, अप्रत्याशित रूप से उन्होंने मुझे उस ग्रुप से मुक्ति देकर मुझे बाद में असीम शान्ति भी प्रदान कर दी| हालांकि ये कार्य मैं स्वयं भी कर सकता था पर मेरे इस कृत्य से उनको जो मानसिक अशांति हो जाती, बार-बार यही ख़याल मन में आ जाता था|

 

ये तो बस चंद उदाहरण मात्र हैं, वास्तव में रोज ही फेसबुक और कई अन्य सोशियल साइट्स पर न जाने कितने ही लोग आपस में बिना किसी बात के आपस में लड़-झगड रहे हैं| आश्चर्य की बात तो यह है कि अधिकांशतः लोग न तो आपस में कभी एक-दूसरे से मिले हैं और न ही परिचित है| इसके अलावा ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो कई वर्षों बाद अपने पुराने परिचितों से फेसबुक के माध्यम से मिले पर यहाँ पर बिना बात के आपस में उलझ गए जबकि इससे पूर्व उनका आपस में कोई मनमुटाव ही नहीं था| मुझे मोहम्मद रफ़ी के गाये एक गाने की चंद पंक्तियाँ याद आती हैं कि-

 

क्या हुआ है, हुआ कुछ नहीं है,

बात क्या है, पता कुछ नहीं है…

 

अब क्या हुआ है, पता नहीं और बात क्या है, ये भी पता नहीं है पर दिलों में नाराजगी पता नहीं क्यों हो रही है| मैंने बहुत से लोगों अक्सर को उनके पोस्ट्स पर लाइक या सकारात्मक प्रतिक्रिया करने या उनके बनाए ग्रुप में ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोडने के लिए रिरियाते देखा है| बहुत से लोगों ने तो इस आत्मिक शान्ति को पाने के लिए कई-कई फर्जी एकाउंट भी बना रखे हैं और वे स्वयं ही अपनी पोस्ट पर लाइक और कमेन्ट कर किसी के भरोसे नहीं रहते, यानि कि अपना हाथ जगन्नाथ| अब ये तो पता नहीं कि इस बिना वेतन की नौकरी से उन्हें कौन सी मानसिक शांति प्राप्त हो रही है पर हाँ लाइक या सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने पर उन्हें मानसिक अशांति जरूर हो रही है|

 

इसी प्रकार की झक-झक और बक-बक से ऊबकर मैंने बहुत पहले ही जागरण जंक्शन पर प्रतिक्रियाएं करने से तौबा कर लिया था कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी| न किसी को भला कहो और न बुरा, अच्छा हो या बुरा, बस पढ़ो और उसको पचा लो| जो लिखना है बस लिख दो, उस पर प्रतिक्रियाएं मिलें न मिलें, सकारात्मक हों या नकारात्मक कोई परवाह न करो, बस अपना लेखन धर्म निभाते रहो| धीरे-धीरे जागरण जंक्शन से एक दूरी सी हो चली थी कि फेसबुक पर एक लेख का लिंक देखकर लेख और उस पर लोगों की प्रतिक्रियाएं पढीं और यह देखकर फिर से उसी चिरपरिचित और असीम शान्ति का अहसास किया| वही भोले-भाले आम जन की मानवीय भावनाएं, बिना किसी बात के अनजान लोगों से नाराजगी और किसी को बिना कोई वेतन दिए तू-तू मैं-मैं का मजा लूटती सोशियल साइट्स| हींग लगे न फिटकरी, और रंग चोखा| बस कभी-कभी किसी प्रतियोगिता के नाम पर एक-दो लेग पीस झुण्ड के बीच फेंक दो और फिर देखो कि मार-झपट्टा का खेल| कमबख्त अच्छी ब्रीड पर तो काफी खर्चा होता है, बड़ी देखभाल करनी पड़ती है, इसलिए बेहतर यही है कि डोगा ब्रांड ब्रीड पर ध्यान दो, जिस पर कोई खर्चा करने की भी जरूरत नहीं है और वफादारी ब्रीडेड से भी कही ज्यादा मिलेगी| जहां ब्रीडेड को पूरे पीस देने पड़ते हैं वहीं डोगा ब्रांड ब्रीड बुरी तरह से कुरेद-कुरेद कर चूसी हुई निपट नंगी हड्डियों को भी कई दिन तक ऐसे चूसती रहती है कि मरे हुए जानवर की भी रूह काँप उठती होगी और वो यही दुआ करता होगा कि हे ईश्वर अगले जन्म में चमगादड़ बनाना जिसे कोई खा न सके|

 

लेकिन कमबख्त इस जानवर की फितरत ही ऐसी है कि उचित सम्मान न मिलने के बावजूद भी वह कभी-कभार पुराने मोहल्ले में आ ही जाता है भले ही वहाँ उसे डोगा ब्रांड ब्रीड वालों के क्रोध का सामना ही क्यों न करना पड़े| अपनी फितरत पर काबू न रख पाने वाले इस प्राणी के लबों पर हमेशा यही गीत रहता है-

 

तेरे वास्ते मेरा इश्क सूफियाना…..

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