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मुंशी प्रेमचंद का क्रिकेट प्रेम

Posted On: 3 Sep, 2011 Others में

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राजेंद्र भारद्वाज

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महान उपन्यासकार और कहानीकार मुंशी प्रेमचंद आम जनता के कथाकार थे | उनके उपन्यास और कहानियाँ खासतौर पर निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के सुख-दुःख, आशा-आकांक्षा और उत्थान-पतन का सजीव चित्रण करती हैं और पाठकों के ह्रदय को छूती हैं| वे रवीन्द्र और शरद के साथ भारत के ऐसे महान कथाकार हैं जिनको पढ़े बिना भारत को समझना संभव नहीं है|

 

प्रेमचंद के समय में भारत में क्रिकेट का खेल शायद इतना प्रसिद्द नहीं रहा होगा जितना कि अब है| लेकिन उन्होंने अपने उपन्यास ‘वरदान’ के अध्याय १५ में जिस अंदाज में क्रिकेट के एक रोचक मैच का सजीव चित्रण किया है उससे प्रेमचंद के क्रिकेट प्रेम और उस समय में क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता का साफ़ पता चलता है| प्रेमचंद के द्वारा किया गया इस मैच का सजीव चित्रण न केवल रोचक और गुदगुदाने वाला है बल्कि उतने ही साहित्यिक अंदाज में भी है| मेरा दावा है कि इतने साहित्यिक अंदाज में और आम जनता की भाषा में किया गया क्रिकेट मैच का सजीव चित्रण दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा|

 

तो आइये प्रेमचंद द्वारा चित्रित इस मैच का लुत्फ़ उठायें-  

 

“उधर प्रतापचंद्र का प्रयाग में जी लगने लगा था। व्यायाम का तो उसे व्यसन था ही। वहां इसका बड़ा प्रचार था। मानसिक बोझ हलका करने के लिए शारीरिक श्रम से बढ़कर और कोई उपाय नहीं है। प्रात: काल जिमनास्टिक करता, सांयकाल क्रिकेट और फुटबाल खलता, आठ-नौ बजे रात तक वाटिका की सैर करता। इतने परिश्रम के पश्चात् चारपाई पर गिरता तो प्रभात होने ही पर आंख खुलती। छ: ही मास में क्रिकेट और फुटबाल का कप्तान बन बैठा और दो-तीन मैच ऐसे खेले कि सारे नगर में धूम हो गयी।

 

आज क्रिकेट में अलीगढ़ के निपुण खिलाडियों से उनका सामना था। ये लोग हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध खिलाडियों को परास्त कर विजय का डंका बजाते यहां आये थे। उन्हें अपनी विजय में तनिक भी संदेह न था। पर प्रयाग वाले भी निराश न थे। उनकी आशा प्रतापचंद्र पर निर्भर थी। यदि वह आध घण्टे भी जम गया, तो रनों के ढेर लगा देगा। और यदि इतनी ही देर तक उसका गेंद चल गया, तो फिर उधर का वारा-न्यारा है। प्रताप को कभी इतना बड़ा मैच खेलने का संयोग न मिला था। कलेजा धड़क रहा था कि न जाने क्या हो।

 

दस बजे खेल प्रारंभ हुआ। पहले अलीगढ़ वालों के खेलने की बारी आयी। दो-ढाई घंटे तक उन्होंने खूब करामात दिखलाई। एक बजते-बजते खेल का पहिला भाग समाप्त हुआ। अलीगढ़ ने चार सौ रन किये। अब प्रयाग वालों की बारी आयी पर खिलाडियों के हाथ-पांव फूले हुए थे। विश्वास हो गया कि हम न जीत सकेंगे। अब खेल का बराबर होना कठिन है। इतने रन कौन करेगा। अकेला प्रताप क्या बना लेगा ? पहिला खिलाड़ी आया और तीसरे गेंद मे विदा हो गया। दूसरा खिलाड़ी आया और कठिनता से पॉँच गेंद खेल सका। तीसरा आया और पहिले ही गेंद में उड़ गया । चौथे ने आकर दो-तीन हिट लगाये, पर जम न सका। पॉँचवे साहब कालेज मे एक थे, पर यहाँ उनकी भी एक न चली। थापी रखते-ही-रखते चल दिये।

 

अब प्रतापचन्द्र दृढ़ता से पैर उठाता, बैट घुमाता मैदान में आयां दोनों पक्ष वालों ने करतल ध्वनि की। प्रयोग वालों की दशा अकथनीय थी। प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि प्रतापचन्द्र की ओर लगी हुई थी। सबके हृदय धड़क रहे थे। चतुर्दिक सन्नाटा छाया हुआ था। कुछ लोग दूर बैठकर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि प्रताप की विजय हो। देवी-देवता स्मरण किये जा रहे थे। पहिला गेंद आया, प्रताप ने खाली दिया। प्रयोग वालों का साहस घट गया। दूसरा आया, वह भी खाली गया। प्रयाग वालों का कलेजा नाभि तक बैठ गया। बहुत से लोग छतरी संभाल घर की ओर चले। तीसरा गेंद आया। एक पड़ाके की ध्वनि हुई ओर गेंद लू (गर्म हवा) की भॉँति गगन भेदन करता हुआ हिट पर खड़े होने वाले खिलाड़ी से सौ गज आगे गिरा। लोगों ने तालियॉँ बजाईं । सूखे धान में पानी पड़ा। जाने वाले ठिठक गये। निराशों को आशा बँधी। चौथा गेंद आया और पहले गेंद से दस गज आगे गिरा। फील्डर चौंके, हिट पर मदद पहँचायी | पॉँचवॉँ गेंद आया और कट पर गया। इतने में ओवर हुआ। बालर बदले, नये बालर पूरे वधिक थे। घातक गेंद फेंकते थे। पर उनके पहिले ही गेंद को प्रताप ने आकाश में भेजकर सूर्य से र्स्पश करा दिया। फिर तो गेंद और उसकी थापी में मैत्री-सी हो गयी। गेंद आता और थापी से पार्श्व ग्रहण करके कभी पूर्व का मार्ग लेता, कभी पश्चिम का, कभी उत्तर का और कभी दक्षिण का, दौड़ते-दौड़ते फील्डरों की सॉँसें फूल गयीं, प्रयाग वाले उछलते थे और तालियॉँ बजाते थे। टोपियॉँ वायु में उछल रही थीं। किसी न रुपये लुटा दिये और किसी ने अपनी सोने की जंजीर लुटा दी। विपक्षी सब मन मे कुढ़ते, झल्लाते, कभी क्षेत्र का क्रम परिवर्तन करते, कभी बालर परिवर्तन करते। पर चातुरी और क्रीड़ा-कौशल निरर्थक हो रहा था। गेंद की थापी से मित्रता दृढ़ हो गयी थी। पूरे दो घन्टे तक प्रताप पड़ाके, बम-गोले और हवाइयॉँ छोड़ता रहा और फील्डर गेंद की ओर इस प्रकार लपकते जैसे बच्चे चन्द्रमा की ओर लपकते हैं। रनों की संख्या तीन सौ तक पहुँच गई। विपक्षियों के छक्के छूटे। हृदय ऐसा भर्रा गया कि एक गेंद भी सीधा न आता था। यहां तक कि प्रताप ने पचास रन और किये और अब उसने अम्पायर से तनिक विश्राम करने के लिए अवकाश मॉँगा। उसे आता देखकर सहस्रों मनुष्य उसी ओर दौड़े और उसे बारी-बारी से गोद में उठाने लगे। चारों ओर भगदड़ मच गयी। सैकड़ो छाते, छड़ियॉँ, टोपियॉँ और जूते ऊर्ध्वगामी हो गये मानो वे भी उमंग में उछल रहे थे। ठीक उसी समय तारघर का चपरासी बाइसिकल पर आता हुआ दिखायी दिया। निकट आकर बोला-‘प्रतापचंद्र किसका नाम है!’ प्रताप ने चौंककर उसकी ओर देखा और चपरासी ने तार का लिफाफा उसके हाथ में रख दिया। उसे पढ़ते ही प्रताप का बदन पीला हो गया। दीर्घ श्वास लेकर कुर्सी पर बैठ गया और बोला-यारो ! अब मैच का निबटारा तुम्हारे हाथ में है। मेंने अपना कर्तव्य-पालन कर दिया, इसी डाक से घर चला जाँऊगा। यह कहकर वह बोर्डिंग हाउस की ओर चला।”

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