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यारो मैं भी तो कवि हूँ- शाही जी की कलम से

Posted On: 18 Jun, 2012 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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(भाई राजकमल शर्मा उर्फ कांतिलाल गोडबोले उर्फ श्री श्री……की खास डिमांड पर)

प्रस्तावना-

इसे मैं अपना सौभाग्य ही कहूँगा कि अपने जबरन बनाए हुए गुरु श्री आर० एन० शाही जी की इस कालजयी रचना पर मुझ जैसे तुच्छ स्वयंभू लेखक को दो-दो बार प्रस्तावना लिखने अमूल्य अवसर मिला है| जबरन बनाए हुए गुरु इसलिए कि हम जबरन उनके पैरों पर चिपके हुए हैं और वे बार-बार पैरों को झटक कर हमें छुडाने की भरसक कोशिश करते रहते हैं| लेकिन हम भी ऐसे वैसे चेले नहीं हैं कि इतनी आसानी से गुरु को छोड़ दें, बल्कि हम तो उस सिद्धांत पर यकीन रखते हैं कि-

हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी…….

इस लेख पर पहली बार प्रस्तावना ९ मार्च २०११ को तब लिखनी पडी थी जब हमने जबरन चिपक कर गुरूजी की ये रचना अपने ब्लॉग पर पोस्ट की थी| अब दुबारा ये मौक़ा मिला है अपने भाई श्री  राजकमल शर्मा जी की वजह से जो कि खुद भी बहुत ही पहुंचे हुए गुरु बल्कि गुरु-घं…..हैं| कल ही फेसबुक पर उन्होंने गुरूजी की कुछ रचनाएं जो कि  संयोग से मेरे पास सुरक्षित बच गईं, पुनः पोस्ट कर शिष्य-धर्म निभाने की कसम दे डाली| ये पाठकों का सौभाग्य ही है कि गुरूजी की एक-दो रचनाएं जिनके पुनर्संस्करण के अधिकार मैंने गुरूजी से जबरन चिपक कर हासिल किये थे, मेरे ब्लॉग पर सुरक्षित बच गईं वरना गुरूजी ने तो जेजे और मंच पर डोगा ब्रीड के फैलते संक्रमण से खफा होकर अपने ब्लॉग की चिंदी-२ कर अज्ञातवास ही ले लिया था| अब गुरूजी फिर से इस मंच पर लौट आये हैं और धमाकेदार परफॉर्मेंस भी दे रहे है तो निश्चित ही उन्हें अपनी पुरानी और प्रिय रचनाओं की भी याद जरूर आती होगी| इस स्थिति पर हमें अपनी ही तुकबंदी याद आती है कि-

फाडकर फेंक दिए थे कभी जो खत तेरे मैंने,

अब उन्हें शहर के कूड़ेदानों में ढूँढता फिरता हूँ…

तो मेरे लेखक कम पाठक मित्रों (क्योंकि इस मंच पर आप ही लेखक भी हैं और पाठक भी), आपको ज्यादा बोर न करते हुए और अपने शिष्य धर्म का पालन करते हुए भाई राजकमल शर्मा की स्पेशल डिमांड पर गुरु जी का ये जोरदार व्यंग्य पेश है-

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प्रस्तावना

चूंकि इस जागरण जंक्शन के मंच पर मेरा पदार्पण  काफी देर में यानी कि अक्टूबर २०१० में हुआ था, अतः इस मंच के बहुत से बेहतरीन लेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर पाया. लेकिन अभी हाल ही में आदरणीय शाही जी की एक पुरानी पोस्ट जिसे उन्होंने सितम्बर २०१० में पोस्ट किया था, पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो वो गुदगुदी हुई कि क्या कहूँ. कहाँ तो मैं खुद को ही महा खुरापाती समझता था और कहाँ गुरूजी के दर्शन हो गए. इस पोस्ट को पढते ही मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं शाही जी से इसे पुनः पोस्ट करने का निवेदन करूँगा और अगर वे नहीं माने तो मैं खुद ही इसे पोस्ट कर दूंगा. ये मेरी खुशनसीबी ही थी कि उन्होंने सहर्ष ही इसकी अनुमति मुझे दे दी. पुनः पोस्ट करने का खास कारण यह है कि मैं चाहता हूँ कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस हास्य-व्यंग्य का लुत्फ़ उठायें और उदासी को अपने पास भी न फटकने दें.

इस पोस्ट को पढ़ने से पहले मैं भी यही सोचता था कि बीच-बीच में फिलर के तौर पर मैं भी ‘कही की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती का कुनबा जोड़ा’ की तर्ज पर कुछ तुकबंदिया ठोक कर लोगों की पीठ खुजा दिया करूँगा, बाकी मेरी पीठ लोग खुजा ही देंगे. लेकिन अब तो इतना ही कहूँगा कि- ‘यारों मैं कवि नहीं हूँ, मैं कवि नहीं हूँ.’

और कृपया इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया शाही जी को ही संबोधित कर प्रेषित करें क्योंकि ये उन्हीं की महान खुराफात…..म्मेरा मतलब रचना है.

तो पेशे खिदमत है शाही जी की कलम से –

यारो मैं भी तो कवि हूँ (व्यंग्य)

मैं जब बहुत व्यथित होता हूँ, तब ज्ञानी जी की शरण लेता हूँ । मेरे घर के पास जो गुरुद्वारा है, ज्ञानी जी वहां ग्रंथी हैं । मंदिर थोड़ा दूर पड़ता है, इसलिये सुकून की तलाश में मुझे ज्ञानी जी से बेहतर डेस्टीनेशन कोई नहीं दिखता । वहां न सिर्फ़ मेरी आस्था का बेहतर तुष्टिकरण हो पाता है, बल्कि ज्ञानी जी की कृपा से गाहे-बगाहे चलने वाले लंगरों में भी मुझे निहायत अपनेपन के साथ तर माल उड़ाने का मौक़ा भी खूब नसीब होता है ।
मैं जब गुरुद्वारे की दहलीज़ पर पहुंचा, तो देखा कि ज्ञानी जी अकेले गुरुग्रंथ साहिब की सफ़ाई में व्यस्त थे । मैंने हवाई चप्पल को सीढ़ियों के नीचे खिसकाते हुए सिर पर रूमाल बांधा, और तख्त की ओर मुखातिब हो अरदास के शब्द बुदबुदाने लगा । ज्ञानी जी ने एक उचटती सी नज़र मुझपर डालते हुए वहीं आकर सामने बैठ जाने का इशारा किया । मैं खामोशी से बैठ कर ज्ञानी जी के फ़ारिग होने का इंतज़ार करने लगा । थोड़ी ही देर में ज्ञानी जी मेरे पास आ गए, और मेरे लटके हुए थोबड़े पर निगाह पड़ते ही उनका चेहरा भी थोड़ा परेशान सा हो गया ।
‘ओए पुत्रां की होया, ये फ़टकार सी क्यूं बरस रही है आज, कल तो भले-चंगे दिख रहे थे!’ मुझसे पुत्रवत स्नेह रखने वाले ज्ञानी जी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखते हुए पूछा ।
‘बस क्या बताऊँ ज्ञानी जी, यूं ही कुछ अच्छा नहीं लग रहा । रात से ही थोड़ी बेचैनी सी महसूस हो रही है’ । मैंने स्थिति बताई ।
‘भई बात तो बता, वो तो मैंनू भी दिख रया सी कि कुछ न कुछ गड़बड़ है । और ये तेरे ब्लाँग लिखने के टैम पे इधर कैसे आ गया?’ ज्ञानी जी ने दूसरा प्रश्न दे मारा ।
‘अब क्या सफ़ाई दूँ ज्ञानी जी!’ मैं कुछ कुढ़ी हुई आवाज़ में बोला, ‘उधर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा आजकल जंकशन पर’। मेरे नयन पसीज़ आए ।
‘ऐ लो जी, ये क्या बात हुई, कोई लेख-वेख फ़ीचर नहीं किया क्या जागरण वालों ने?’
ज्ञानी जी का एक और सवाल दगते ही मैंने बेचैनी से पहलू बदलते हुए अपना दर्द बयान किया- ‘अजी नहीं, फ़ीचर तो कर रहे हैं, लेकिन आने वाले दिन कुछ अंधकारमय से दिख रहे हैं’।
‘सो क्यूं पुत्तर?’ ज्ञानी जी का अगला सवाल ।
‘वो इसलिये ज्ञानी जी, कि उधर अब कवियों का बोलबाला हो चला है । आप तो जानते ही हो मेरी कमज़ोरियां, ये कविता-वविता अपने वश की बात है नहीं, तो भला कैसे रहेगा वज़ूद? काफ़ी देर बाद मुझे भी एक सवाल दागने का मौक़ा मिल ही गया ।
ज्ञानी जी ने इतनी ज़ोर का ठहका लगाया कि मेरे कान बहरे हो गए । बोले, ‘धत्त तेरे की । खोदा पहाड़ और निकली मिरगिल्ली चुहिया । ये भी कोई परेशान होने की बात है पुत्तर?’
‘तो क्या खुश होऊं अपनी इस बेबशी पर?’ मैंने शिक़ायती निगाह से ज्ञानी जी को देखते हुए पूछा ।
‘रहे तुम भी चुकन्दर के चुकन्दर ही’ ज्ञानी जी समझाने की मुद्रा में आ गए- ‘ये चिन्ता अपने तरपाठी साब के आगमन से पैले साहित्यकारों में आमतौर से पाई जाती थी । अब कहां रहे वो सवैया, दोहों, चौपाइयों और छंदों के ज़माने जो तेरे को इतनी चिन्ता हो गई?’
‘आप का मतलब सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी से तो नहीं?’ मैंने आँखें बन्द कर महान कवि का स्मरण करते हुए पूछा ।
‘बिल्कुल ठीक पकड़ा, वही । उन्होंने आकर तेरे जैसों का कितना कल्याण किया है, ये भी कोई याद कराने दी गल्ल है भला!’ ज्ञानी जी बोले ।
‘राम-राम ज्ञानी जी, क्या कह रहे हैं? उन जैसे महान कवि को मेरे जैसों के साथ खड़ा कर रहे हैं! आपको पता भी है उनकी रचनाओं की श्रेणी के बारे में?’ मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा ज्ञानी जी की बातें सुनकर ।
‘अरे नहीं पुत्तर! तू शायद समझा नहीं ठीक से, कि मेरा अभिप्राय क्या है । मैं भी सिर्फ़ गुरुमुखी सीखकर ही ज्ञानी नहीं बन गया पुत्तर! पीएचडी भी की है हिन्दी साहित्य से । मेरा मतलब निराला जी की कविताओं के काव्यार्थ और भावार्थ से नहीं है रे, मैं उनकी गद्यात्मक काव्यशैली की बात कर रहा हूं, जिसे अपना कर हिन्दी जगत में आधुनिक कवियों की बाढ आ गई, कुछ समझा?’ ज्ञानी जी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा ।
‘लगता है थोड़ा-थोड़ा समझ पा रहा हूँ ज्ञानी जी’। मेरी आँखों में हल्की सी चमक आ गई, ‘आपका मतलब है कि गद्यात्मक शैली को अपना कर मैं भी कुछ तीर छोड़ने की कोशिश कर सकता हूँ, यही न?’
‘अब तू ठीक-ठीक समझने लगा । यही बताना चाह रहा था मैं तेरे को । लेकिन ये तीर की भी कोई ज़रूर्त नहीं है पुत्तर, तू तुक्के ही चलाकर देख ले न, खुद-बखुद तीर बन जाएंगे’। ज्ञानी जी की घनी सफ़ेद मूँछों के बीच रहस्यमय मुस्कान खेल रही थी।
‘लेकिन ज्ञानी जी इतना आसान नहीं है’, मेरा चेहरा एक बार फ़िर बुझ गया, ‘कविता जैसी भी हो, काव्यार्थ और भावार्थ के बिना कविता कैसी?
‘अरे नासमझ! अब कैसे समझाऊँ तेरे को’, ज्ञानी जी के स्वर में हल्की खीझ आ गई, ‘ये समस्या आई थी शुरू-शुरू में नव-कवियों के सामने, लेकिन बड़ी खूबसूरती से उन्होंने रास्ता निकाल लिया था’। ज्ञानी जी ने कुछ और ज्ञान दिया ।
‘वो कैसे ज्ञानी जी?’ मैंने उत्कंठित होकर पूछा ।
‘अच्छा तू पहले मेरे को ये बता, कि अभी जो कविताएं आ रही हैं जंक्शन पर, उनमें से कितने परसैंट ऐसी हैं, जो तेरी समझ में आती हैं?’ ज्ञानी जी ने उल्टा सवाल किया ।
मेरा दिमाग उनके सवाल से चकरघिन्नी की तरह नाच गया । ये राज की बात थी । अगर मैं सच्ची बात बता दूँ, कि गद्यात्मक वाली एक भी कविता का काव्यार्थ और भावार्थ समझ पाने में मैं नाक़ामयाब रहा हूँ, तो ज्ञानी जी की नज़रों में मेरी विद्वता पर प्रश्नचिह्न लग जाने का भारी खतरा था ।
मैंने थोड़ा सोचने का अभिनय किया, और अन्त में झूठ बोलते हुए बताया- ‘यही कोई पाँच से दस पर्सेंट तो समझ ही लेता हूँ’।
‘तो बस वही पाँच दस पर्सैंट ही हैं, जिन्हें तुम थोड़े कवि मान सकते हो । दरअसल जब नए लोगों को कवि बनने के रास्ते में भावार्थ का रोड़ा महसूस हुआ था, तो उन्होंने एक अनूठी ईज़ाद की । निराला जी की शैली पर महादेवी जी के छायावाद का मुलम्मा चढ़ाकर उनका काम निकल आया, और फ़िर तो जैसे क्रांति ही आ गई । बस तू भी वही मंत्र अपना ले पुत्तर, सुखी और प्रसन्न हो जाएगा, समझा?’ ज्ञानी जी बोले ।
‘समझ तो गया आपकी बात ज्ञानी जी, परन्तु जागरण वालों ने पकड़ लिया, तब क्या होगा? फ़िर तो पतली वाली गली बचेगी, जहां कोई सेंती में भी नहीं पूछता । फ़ीचर नहीं होने देंगे’। मैंने आशंका व्यक्त की ।
‘तू रहेगा घोंचू ही’, ज्ञानी जी ने अपना माथा ठोंकते हुए कहा, ‘अरे भइये, जब कविता लिखने वाले खुद नहीं जानते कि वे जो लिख रहे हैं उसका कोई अर्थ भी निकलता है कि नहीं, तो ये जागरण वाले कौन से अन्तर्यामी हो गए भला? अच्छा पिछले दिनों में तेरे फ़ीचर्ड का रिकार्ड क्या है?’ ज्ञानी जी ने कुछ सोचते हुए पूछा ।

‘एक दो को छोड़कर लगभग सभी फ़ीचर्ड ही रहे हैं’। मैंने मन ही मन याद करते हुए बताया।
‘बस तो हो गया काम । जैसे पुलिस वाले स्थिति नार्मल रहने पर ऊंघते हुए चोरों को निकलने का रास्ता दे बैठते हैं, वैसे ही तेरी स्थिति अभी नार्मल जा रही है । धीरे से लगा देना लैन में, बेड़ापार हो जाएगा वाहे गुरु जी की किरपा से, जा अब देर मत कर पुत्तर, आजकल समय की भी कुछ कीमत होती है’। ज्ञानी जी ने कहा, और जम्हाई लेते हुए उठ गए ।
‘लऽ…लेकिन टिप्पणियों का क्या होगा ज्ञानी जी! वहाँ तो सभी धुरंधर हैं, एक से एक पुराने दिग्गज़ । बाजपेयी साहब, चातक जी, खुराना साहब, आकाश जी और न जाने कौन-कौन जी, सभी स्थापित कवि और शायर भरे हुए हैं वहाँ तो । नहीं ज्ञानी जी नहीं, बख्श दीजिये । पकड़ जाऊंगा, बड़ी लानत होगी’। मैंने पल्ला झाड़ने का आखिरी प्रयास किया ।
‘सचमुच लानत के क़ाबिल है तू । अरे पगले, तू देता है टिप्पणियां तो क्या कभी भावार्थ देखकर दिया क्या, आयं? सब चलता है । वहां बस एक ही मंत्र सिक्के की तरह चलता है, तू मेरी खुजा मैं तेरी खुजाता हूँ, समझा क्या? अभी भी नहीं समझा? दूसरों की खुजाता जा, तेरा कल्याण वाहे गुरु करेंगे । अब जा भग यहां से ।
मेरा दिल ज्ञानी जी से ज्ञान पाकर बल्लियों उछल रहा था ।

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दृश्य दो – लेखक का कम्प्यूटर टेबल । ध्यानमग्न होकर अपनी पहली कविता का सृजन कर रहा हूँ । श्रीमती जी चाय की प्याली लिये सिर के पीछे खड़ी प्रतीक्षारत हैं, कि हाथ बढ़ाकर कब उनका हाथ खाली करूंगा, लेकिन अफ़सोस! उन्हें निराशा हाथ लगी । थोड़ी देर यूं ही दाँत पीसती खड़ी रहीं, और जब बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो टेबल पर रखे यूपीएस पर प्याली रखा, और पैर पटकती अन्तर्ध्यान हो गईं ।
कविता की पंक्तियां धाराप्रवाह टाइप हो रही हैं, पूरी निरन्तरता के साथ, खट खटाखट खट-खट-खट । थोडी ही देर में जंक्शन के डैशबोर्ड से होती हुई पहले सेव ड्राफ़्ट, फ़िर पब्लिश्ड की गति को प्राप्त हो जाएंगी । पेशेखिदमत है –

यारो मैं भी तो कवि हूँ ।
जात पर न पात पर,
ज्ञानी जी की बात पर,
टैटू गुदाए हाथ पर,
अपनी ही दीवार पर,
माला पहने इक छवि हूँ,
यारो मैं भी तो कवि हूँ । ।

पद्मिनियों की आह चाह,
उनकी परस्पर ईर्ष्या डाह,
चातक सी चहुं ओर निहार,
पलक झपकते लेतीं राह,
भांड नहीं जी, लिच्छवि हूँ ।
यारो मैं भी तो कवि हूँ । ।

आंय बांय धांय टांय,
धूम धड़ाका सांय सांय,
कहां पियें और कहां खायं
तुम निकलो तब तो हम जायं,
एक उदीयमान रवि हूँ।
यारो मैं भी तो कवि हूँ । ।

व्याकुल आँखें रहीं निहार,
प्यार मोहब्बत का व्यौपार,
सैयां उतरें कैसे पार,
इतराती पनघट पर नार,
शव-साधन की भैरवि हूँ,
यारो मैं भी तो कवि हूँ । ।
लखन उधर चल- नहर पर टहल- बतख मत पकड़- नटखत मत बन- बरगद तक सरपट चल- गिटपिट मत कर ।

सुन्दरियों के नर्तन-वर्तन,
नहिं भाते अब मांजें बर्तन,
खड़ताल बजा के करें कीर्त्तन,
लगतीं शैतान की नानी हैं,
कहतीं झाँसी की रानी हैं,
वैसे तो बड़ी सयानी हैं,
लेकिन अब भरतीं पानी हैं,
ये आफ़त की परकाला हैं,
पूरी ड्रैगन की खाला हैं,
दिखती हैं जैसे बाला हैं,
अब बनीं ये खुद की निवाला हैं
कहने को अबला नारी हैं,
ये कन्या नहीं कुंवारी हैं,
इक बार न बोलें देवी हूँ ।
यारो मैं भी तो कवि हूँ । ।

नैन बिछाए बाँहें पसारे, तुझको पुकारे, देश तेरा — आ अब लौट चलें –

मुसकाएं तो मधुबाला हैं,
मटकें तो बिजन्तीमाला हैं,
छज्जे पर बैठी बिल्ली हैं,
लपको तो दूर की दिल्ली हैं,
लगती तो नार नवेली हैं,
पर भुतही कोई हवेली हैं,
तुम कहां फ़ंसे मेरे भाई,
इनकी तो ज़ात ही हरजाई,
तू मूढ़ ब्रह्म की मूरत है,
इस देश को तेरी ज़रूरत है,
बेहतर है पल्ला झाड़ ले तू,
कोई सच्चा मक़सद जुगाड़ ले तू,
ये झूठ-मूठ घोषित करतीं,
घंटेवाले की जलेबी हूँ ।
पर, यारो मैं भी तो कवि हूँ ! !

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इससे पहले कि किसी की पलकें झपकी लें, पर्दा गिरता है —

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