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रा वन- एक और फिल्म समीक्षा

Posted On: 14 Dec, 2011 Others में

अंगारMy thoughts may be like 'अंगार'

राजेंद्र भारद्वाज

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हिन्दी फिल्म इतिहास की शायद ये पहली फिल्म होगी जिसमें की माँ और बेटा आपस में कंडोम के बारे में हंस-हंस कर बात करते हैं या हो सकता है की मैंने ऐसी हिन्दी फिल्म पहली बार देखी हो| ऐसे ही एक अन्य दृश्य में बेटा अपनी माँ यानी कि करीना कपूर को एक बदमाश के ‘सेंटर पाइंट’ पर अटैक करने के लिए कहता है| इस क्रांतिकारी सोच के लिए मैं शाहरुख खान, गौरी खान और करीना कपूर को बधाई देना चाहता हूँ जिन्होंने की ऐसा महान सोचा और परफॉर्म भी कर के दिखाया|

 

‘डर्टी पिक्चर’ की मेरी पिछली समीक्षा पर मेरे कुछ काबिल दोस्तों का कहना था की एक कलाकार का काम ही होता है नए-२ चैलेंजिंग रोल करना| और देखिये शाहरुख और करीना कपूर जैसे कलाकारों ने कितनी सहजता से इसे कर दिखाया|

 

सुना तो था की सफलता आदमी का दिमाग खराब कर देती है पर शाहरुख खान का दिमाग इतनी जल्दी खराब हो जाएगा ये सोचा नहीं था| शाहरुख खान ने क्या सोचकर ये पिक्चर बनाई, मालूम नहीं| लगता है शाहरुख खान ने रजनीकान्त की रोबोट नहीं देखी जो रा वन से कहीं ज्यादा बेहतर और सफल फिल्म है| आज के समय में हॉलीवुड फ़िल्में भारतीय दर्शकों की पहुँच से दूर नहीं है और इस तरह की कई फ़िल्में, बल्कि इससे कहीं बेहतर फ़िल्में हॉलीवुड में बहुत पहले ही बन चुकी हैं और लोग इन्हें देख भी चुके हैं| यही कारण है की रा वन बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुई|

 

मैंने कभी पढ़ा था कि फ़िल्मी सितारों का सामान्य ज्ञान बहुत कम होता है क्योंकि वे कुँए के मेंढक की तरह अपनी ही दुनिया में मगन रहते हैं| बहुत सी फ़िल्मी हस्तियों को ये भी पता नहीं होता कि हमारा राष्ट्रीय गान या गीत कौन सा है, हमारे गृह मंत्री, रक्षा मंत्री कौन हैं, लोक सभा स्पीकर कौन हैं, आदि-२ | अभी तक तो सिर्फ पढ़ा ही था लेकिन अब रा वन देखने के बाद मुझे इस तथ्य की सच्चाई पर यकीन होने लगा है| शाहरुख खान की सोच भी शायद अपनी फ़िल्मी दुनिया तक ही सीमित है वर्ना वे ऐसी फिल्म की कल्पना ही न करते|

 

रा वन में करीना कपूर जल्दी ही विधवा हो जाती है| लेकिन कोई बन्धु जिसने कि ये फिल्म देखी हो, मुझे बता दे कि पूरी फिल्म में अगर कहीं भी क्षण मात्र को भी ऐसा एहसास होता है कि करीना कपूर विधवा हो गई है| बल्कि विधवा होने के बाद जल्दी ही वो जी वन के साथ लाल साड़ी-लाल ब्लाउज और सफ़ेद स्कर्ट में ‘छम्मक छल्लो’ जैसी महान गीत रचना पर अंग-प्रदर्शन और ऐसा मादक नृत्य करती दिखाई पड़ती हैं जिसमें कि भारतीय हिप्स पश्चिमी स्टाइल में हिलाए जाते हैं | अब भले इसे मेरा पिछड़ापन कहें चाहे मेरी अज्ञानता, पर ईमानदारी से कहूं तो मुझे इस गाने के बोल ही समझ नहीं आये| किसी भाई को समझ में आये हों तो सिर्फ इतना बता दे कि क्या समझ आया| ऐसे महान गीत के लेखक और गायक को मेरा शत-२ नमन है|

 

फिल्म में कई जगह अभद्र हरकतें, इशारे और संवाद हैं जैसे नायक शाहरुख द्वारा विधवा नायिका करीना कपूर के हिप्स पर हाथ मारना, छाती पर हाथ रखना जिसके बाद नायिका शोखी भरे नाराजगी के अंदाज में नायक से कहती है कि तुम मेरे इस जगह हाथ नहीं रख सकते| हो सकता है कि इस फिल्म के माध्यम से शाहरुख खान जवान विधवाओं को कोई संकेत देना चाह रहे हों या एक नए ट्रेंड की शुरुआत करना चाह रहे हों| ये भी सकता है कि शाहरुख खान शायद नए जमाने और नई सोच के राजा राम मोहन रॉय बनना चाहते हों|

 

एक फ़िल्मी हस्ती ने एक उटपटांग फिल्म में काम करने के बाद कहा था कि दर्शकों को अपना दिमाग घर पर छोड़ कर फिल्म देखने जाना चाहिए और सिर्फ मनोरंजन के नजरिये से फिल्म देखनी चाहिए| लेकिन भईया फ़िल्मी दुनिया के लोगों को भी अपना दिमाग घर में छोड़ कर फिल्म बनाने नहीं जाना चाहिए| मेरा दिमाग कभी मेरे साथ न हो ये हो नहीं सकता, और दिमाग सोचना बंद कर दे ये मैं होने नहीं दूंगा|

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