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पिता की पगड़ी

Posted On: 23 Mar, 2017 Others में

Ruchi ShuklaHeights of emotion................Direct Dil Se...

ruchishukla

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पिता की पगड़ी
वो हमारे जनक हैं, हमारे संसारी होने के उतने ही जिम्मेदार जितनी की हमारी मां….हां …पिता…सिर्फ संबोधन नहीं….एक वैधानिक प्रमाण भी है हमारे अस्तित्व का…पहले पहल हम उनके बूते ही तो सीखते हैं जिंदगी का हर ज़रूरी पाठ…हंसना-मुस्कुराना, खेलना, पढ़ना, समझना, संभलना, संभालना, दायरे में रहना, प्यार करना, कद्र करना और समझौते करना। उनकी आंखों से दुनिया देखते-देखते कई बार खुद की आंखों से देखना भूल जाते हैं। पिता…बहुत बड़ा ओहदा है रिश्तों में…आसान नहीं है पिता होना। मैंने पढ़ा है उनके चेहरे के बनते-बिगड़ते भावों में जिंदगी का हर कड़वा सच…कभी कहा नहीं उनसे पर शुक्रिया हमेशा अदा किया भीतर ही भीतर….क्योंकि पिता से ज्यादा कुछ कहने का नियम नहीं था हमारे बचपन में…हर बात मां से कहने की हिदायत गाहे-ब-गाहे मिलती रहती थी, पर पिता के लिए मन में प्रेम और सम्मान हमेशा अपने सर्वोच्च स्तर पर रहता था। उनके चेहरे की लकीरों की तादाद ना बढ़े इसलिए कभी कुछ मांगा नहीं उनसे…लेकिन उन्होंने अपनी चादर से ज्यादा पांव पसारने दिया हमेशा….हर बेटी को एक ऐसे ही पिता की तो ख्वाहिश होती है, जो बिना कहे सुन सके, बिना मांगे दे सके….जो बिना जताए समझ सके…. और इन सभी बातों के बदले कुछ मांगे भी ना। ऐसे पिता का स्थान एक बेटी की नज़र में ईश्वरतूल्य होता है….पिता की पगड़ी संसार की सबसे कीमती चीज़ होती है उसकी नज़र में….
इन्हीं बातों के बीच कब अचानक बेटी बड़ी हो जाती है….कब उसके अपने ही घर में पराएपन का एहसास बढ़ने लगता है…पता ही नहीं चलता। ये किसी के लिए नया नहीं…सभी को पता है कि एक न एक दिन बेटी का नाम किसी और के राशनकार्ड पर छपना है… किसी और की चौखट की लाज रखनी है….किसी और के नाम का बीड़ा उठाना है…….तो क्या अब बेटी की जिंदगी में पिता की भूमिका बदल जानी चाहिए….क्या वाकई बेटी की आने वाली जिंदगी की तमाम खुशियों की कीमत पिता की पगड़ी है….पिता की पगड़ी….यानि उनका सम्मान…जिसकी खातिर एक बेटी बचपन से ही संभलकर चलने को वचनबद्ध होती है….अपनी तमाम ख्वाहिशों को सिर्फ इसलिए रौंद देती है क्योंकि सवाल पिता के ओहदे का होता है। दुनिया की किसी भी बेटी को अपने पिता के सम्मान की कीमत पर कोई खुशी नहीं चाहिए…
सदियों से होता रहा है….बेटी के जन्म से ही पिता की जिम्मेदारियों का फिक्स डिपॉजिट चालू हो जाता है….जिम्मेदारी बढ़ने से पहले पहले उसे किसी के खाते में ट्रांस्फर करने का भारी दबाव होता है….इसके लिए पिता अपनी सारी कमाई….सारा सम्मान….सारी आदमियत दांव पर लगा देता है….क्योंकि लड़केवालों को बेटे के जन्म के समय अस्पताल के खर्च से लेकर पढ़ा-लिखा गंवार बनने तक का सारा खर्चा जो निकालना होता है….फिर बेटी कितनी ही काबिल, संस्कारी, सुंदर और हर तरह से योग्य ही क्यों ना हो….एक पिता को याचक मुद्रा में आना ही पड़ता है….यही बात एक बेटी को सबसे ज्यादा अखरती है….
बेटियां…दुनिया की हर खुशी की हकदार हैं लेकिन इसकी कीमत देने को तैयार नहीं….आज के दौर में कोई भी बेटी किसी ऐसे इंसान का संसार नहीं सजाना चाहेगी जिसके कारण उसके पिता के सम्मान को हल्की आंच भी आई हो। अब वो समय आ गया है कि एक बेटी का पिता भी शान से सिर ऊंचा करके चले, क्योंकि वो दाता है….औऱ मांगने वाले से देने वाले का स्थान हमेशा बड़ा होता है…तो अपनी पगड़ी और बेटी दोनों की कीमत समझिए….
क्योंकि …आहिस्ता-आहिस्ता ही सही पर वक्त करवट ले रहा है….हवा का रुख बदल रहा है…बेटियां केवल दायित्व नहीं…एक अकूत संपत्ति भी हैं…इन्हें सिर्फ उन हाथों में ही सौंपे जिनपर आपको खुद से ज्यादा भरोसा हो…और हां ध्यान रहे…आप पिता हैं…पिता….याचक नहीं…याचक की मुद्रा में उन्हें होना चाहिए जो आपकी सबसे अनमोल कृति को हमेशा हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते हैं।

em-ke-anh-nghe-2वो हमारे जनक हैं, हमारे संसारी होने के उतने ही जिम्मेदार जितनी की हमारी मां….हां …पिता…सिर्फ संबोधन नहीं….एक वैधानिक प्रमाण भी है हमारे अस्तित्व का…पहले पहल हम उनके बूते ही तो सीखते हैं जिंदगी का हर ज़रूरी पाठ…हंसना-मुस्कुराना, खेलना, पढ़ना, समझना, संभलना, संभालना, दायरे में रहना, प्यार करना, कद्र करना और समझौते करना। उनकी आंखों से दुनिया देखते-देखते कई बार खुद की आंखों से देखना भूल जाते हैं। पिता…बहुत बड़ा ओहदा है रिश्तों में…आसान नहीं है पिता होना। मैंने पढ़ा है उनके चेहरे के बनते-बिगड़ते भावों में जिंदगी का हर कड़वा सच…कभी कहा नहीं उनसे पर शुक्रिया हमेशा अदा किया भीतर ही भीतर….क्योंकि पिता से ज्यादा कुछ कहने का नियम नहीं था हमारे बचपन में…हर बात मां से कहने की हिदायत गाहे-ब-गाहे मिलती रहती थी, पर पिता के लिए मन में प्रेम और सम्मान हमेशा अपने सर्वोच्च स्तर पर रहता था। उनके चेहरे की लकीरों की तादाद ना बढ़े इसलिए कभी कुछ मांगा नहीं उनसे…लेकिन उन्होंने अपनी चादर से ज्यादा पांव पसारने दिया हमेशा….हर बेटी को एक ऐसे ही पिता की तो ख्वाहिश होती है, जो बिना कहे सुन सके, बिना मांगे दे सके….जो बिना जताए समझ सके…. और इन सभी बातों के बदले कुछ मांगे भी ना। ऐसे पिता का स्थान एक बेटी की नज़र में ईश्वरतूल्य होता है….पिता की पगड़ी संसार की सबसे कीमती चीज़ होती है उसकी नज़र में….

इन्हीं बातों के बीच कब अचानक बेटी बड़ी हो जाती है….कब उसके अपने ही घर में पराएपन का एहसास बढ़ने लगता है…पता ही नहीं चलता। ये किसी के लिए नया नहीं…सभी को पता है कि एक न एक दिन बेटी का नाम किसी और के राशनकार्ड पर छपना है… किसी और की चौखट की लाज रखनी है….किसी और के नाम का बीड़ा उठाना है…….तो क्या अब बेटी की जिंदगी में पिता की भूमिका बदल जानी चाहिए….क्या वाकई बेटी की आने वाली जिंदगी की तमाम खुशियों की कीमत पिता की पगड़ी है….पिता की पगड़ी….यानि उनका सम्मान…जिसकी खातिर एक बेटी बचपन से ही संभलकर चलने को वचनबद्ध होती है….अपनी तमाम ख्वाहिशों को सिर्फ इसलिए रौंद देती है क्योंकि सवाल पिता के ओहदे का होता है। दुनिया की किसी भी बेटी को अपने पिता के सम्मान की कीमत पर कोई खुशी नहीं चाहिए…

सदियों से होता रहा है….बेटी के जन्म से ही पिता की जिम्मेदारियों का फिक्स डिपॉजिट चालू हो जाता है….जिम्मेदारी बढ़ने से पहले पहले उसे किसी के खाते में ट्रांस्फर करने का भारी दबाव होता है….इसके लिए पिता अपनी सारी कमाई….सारा सम्मान….सारी आदमियत दांव पर लगा देता है….क्योंकि लड़केवालों को बेटे के जन्म के समय अस्पताल के खर्च से लेकर पढ़ा-लिखा गंवार बनने तक का सारा खर्चा जो निकालना होता है….फिर बेटी कितनी ही काबिल, संस्कारी, सुंदर और हर तरह से योग्य ही क्यों ना हो….एक पिता को याचक मुद्रा में आना ही पड़ता है….यही बात एक बेटी को सबसे ज्यादा अखरती है….

बेटियां…दुनिया की हर खुशी की हकदार हैं लेकिन इसकी कीमत देने को तैयार नहीं….आज के दौर में कोई भी बेटी किसी ऐसे इंसान का संसार नहीं सजाना चाहेगी जिसके कारण उसके पिता के सम्मान को हल्की आंच भी आई हो। अब वो समय आ गया है कि एक बेटी का पिता भी शान से सिर ऊंचा करके चले, क्योंकि वो दाता है….औऱ मांगने वाले से देने वाले का स्थान हमेशा बड़ा होता है…तो अपनी पगड़ी और बेटी दोनों की कीमत समझिए….

क्योंकि …आहिस्ता-आहिस्ता ही सही पर वक्त करवट ले रहा है….हवा का रुख बदल रहा है…बेटियां केवल दायित्व नहीं…एक अकूत संपत्ति भी हैं…इन्हें सिर्फ उन हाथों में ही सौंपे जिनपर आपको खुद से ज्यादा भरोसा हो…और हां ध्यान रहे…आप पिता हैं…पिता….याचक नहीं…याचक की मुद्रा में उन्हें होना चाहिए जो आपकी सबसे अनमोल कृति को हमेशा हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते हैं।

ऐसी ही एक बेटी की कलम से….

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