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ग़ज़ल : जुल्फ़ के पेंचों में कमसिन शोख़ियों में

Posted On: 9 Jan, 2014 Others में

Saarthi BaidyanathGhazal, Poetry & Thoughts.

Saarthi Baidyanath

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जुल्फ़ के पेंचों में कमसिन शोख़ियों में
मुब्तला हूँ हुस्न की नादानियों में
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क्या ज़रूरत आसमां के चाँद की अब
चाँद रहता है नज़र की खिड़कियों में
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सोचता हूँ अब उसे माँ से मिला दूँ
छुप के बैठी है जो कब से चिठ्ठियों में
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वो अदाएं दिलवराना क़ातिलाना
अब कहाँ वो रंग यारों तितलियों में
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चार मिसरों से कहो कांधे पे अपने
ले चलें मुझको सुखन की वादियों में

#saarthibaidyanath

 

 

 

नोट : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं।

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