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ग़ज़ल : रात दिन आवारगी होने लगी

Posted On: 6 Mar, 2014 Others में

Saarthi BaidyanathGhazal, Poetry & Thoughts.

Saarthi Baidyanath

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रात दिन आवारगी होने लगी
तुम मिले तो शायरी होने लगी
……………………………………….
पाँव माँ के मैं दबाता हूँ यहाँ
मंदिरों में हाज़िरी होने लगी
……………………………………….
आरिज़े गुल पर पसीने की लकीर
चांदनी क्या शबनमी होने लगी
……………………………………….
आज फिर उससे मेरी आँखें मिलीं
शाखे-ग़म फिर से हरी होने लगी
……………………………………….
मौत ने मुझको छुआ फिर ये हुआ
ज़िन्दगी से आशिक़ी होने लगी

#saarthibaidyanath

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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