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आजादी:१५ अगस्त का दिन कहता है,आजादी अभी अधूरी है

Posted On: 12 Aug, 2015 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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आजादी: १५ अगस्त का दिन कहता है, आजादी अभी अधूरी है
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पंद्रह अगस्त का दिन कहता है,
आजादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी हैं,
हमारी शपथ अभी अधूरी है।

परम सम्मानीय भाई स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी अपने व्याख्यान में हमेशा ये कहते थे कि १५ अगस्त १९४७ को भारत को स्वराज्य से परिपूर्ण आजादी हासिल नहीं हुई थी। उसे अंग्रेजों की गुलामी से पूर्णतः मुक्ति भी नहीं मिली थी, सिर्फ पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में सत्ता के हस्तांतरण की संधि भर हुई थी। ये ठीक वैसा ही था, जैसे चुनाव के बाद पुराना प्रधानमंत्री नए प्रधानमंत्री को संविधान का पालन करने की शर्त के साथ सत्ता सौप देता है। १४ अगस्त १९४७ की रात को १२ बजे लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में कुछ शर्तों के साथ सौपी थी। सबसे बड़ी शर्त थी, भारत और पाकिस्तान का बंटवारा। ये दोनों इंडिपेंडेंट नेशन (स्वतंत्र राष्ट्र) नहीं बल्कि डोमिनियन स्टेट्स (एक बड़े राज्य के अधीन छोटे राज्य) घोषित किये गए।
अंग्रेजों की संसद ने कुछ शर्तों के साथ ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ (भारत के स्वतंत्रता का कानून) पारित किया था। ये एक बहुत बड़ा कड़वा सत्य है कि लम्बे समय तक चली भारत की आजादी की लड़ाई में करोड़ों देशभक्तों की कुर्बानी देने के वावजूद भी हमने अंग्रेजों से आजादी छीनी नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी सरकार ने कुछ शर्तों के साथ हमें सत्ता सौपी थी। अंग्रेजों की कुटिल चालाकी के अनुसार इसका सीधा सा अर्थ है कि अंग्रेजों ने अपना राज हमको सौंपा है ताकि हम लोग कुछ दिन इसे चला लें और यदि न चला पाये तो वो दुबारा देश पर कब्जा जमाने आ सकते हैं। आप जरा गहराई से सोचिये कि हमारे देश पर कई दशकों तक अवैध और बर्बर ढंग से कब्जा जमाने वाली अंग्रेज सरकार और उसकी संसद कौन होती है हमें आजादी देने वाली?
इसी बात को लेकर गांधी जी की बेहद नाराजगी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखने वाले और उस समय की भारतीय राजनीती के सबसे बड़े पुरोधा गांधी जी १४ अगस्त १९४७ की रात को दिल्ली में नहीं थे। गाँधी जी ने नोआखाली से जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी, उसपर जरा गौर कीजिये- “मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित आजादी आ रही है, ये मै नहीं लाया। ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है। मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है।” ग़ांधी जी की दिली नाराजगी और सत्ता के हस्तांतरण की संधि से उनके दिल को लगी ठेस उनकी इस प्रेस विज्ञप्ति में साफ़ झलकती है।
इस संधि का कमाल ही है कि ‘कामनवेल्थ नेशंस’ के तहत ब्रिटेन की महारानी आज भी भारत की नागरिक हैं और ब्रिटेन का उपनिवेश रह चुके भारत जैसे ७१ देशों में वो बिना वीजा के जा सकती हैं, जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बिना बीजा के ब्रिटेन नहीं जा सकते हैं। भारत में सिर्फ नए बने राष्ट्रपति को २१ तोपों की सलामी दी जाती है, उसके अलावा अन्य किसी को भी नहीं। लेकिन ब्रिटेन की महारानी जब भी भारत आती हैं तो उन्हें २१ तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? क्या ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक हैं या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है? क्या ‘कामनवेल्थ नेशंस’ आज भी ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति हैं? ये सब यही दर्शाता है कि हम आज भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम हैं।
भारत का नाम इंडिया अंग्रेजों द्वारा सन १७०२ में पूर्वी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से बनाई गई ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ की कुटिल और बर्बर नीतियों की याद दिलाता है। जिसने रिश्वत और धोखा देकर, जनता पर बेहद क्रूर अत्याचार करके तथा ‘फूट डालो राज करो’ की कुटिल नीति अपनाकर कई देशों में सदियों तक राज किया। आजादी के बाद हम इंडिया नाम से छुटकारा पा सकते थे, परन्तु ये अंग्रेजों से हुई संधि का ही दबाब था कि ये भारत के जगह इंडिया हो गया। अंगेज ‘वन्दे मातरम’ गीत से नफरत करते थे, क्योंकि उन्हें इसमें समाहित असीम देशभक्ति की भावना पसंद नहीं थी। अंग्रेजों के रचे दुष्चक्र का ही परिणाम था कि आजादी पाने के बाद भी हम पचास वरसों तक अपने देश की संसद में इस राष्ट्रगीत को नहीं गा सके।
आपको ये जानकर हैरत होगी कि सत्ता हस्तांतरण संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस जी को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था। भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी की घर वापसी का रास्ता ही अंग्रेजों ने बंद कर दिया था। सत्ता पाने के लालच में हमारे देश के रहनुमा इसके खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाये। सुभाष चन्द्र बोस जी ने आजाद हिंद फौज बनाई थी और १९४२ में हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजो के दुश्मन जर्मन और जापानी की बहुत मदद की थी। आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया था। अपने ही देश के लिए बेगाने हो चुके नेता जी कब कहाँ शरीर छोड़े, यह ठीक ठीक आज तक पता नहीं चला। अंगेजों के अनुसार अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे महान क्रांतिकारी आतंकवादी थे और आजादी के बाद भी बहुत दिनों तक यही हमारे स्कूलों में पढाया जाता था।
राष्ट्रभाषा हिंदी का विकास अंगेज ही अवरुद्ध करके गए। सन १९४० में लोर्ड मैकोले ने कहा था कि “हिंदी भाषा भारत की रीढ़ की हड्डी है और हमें इसे तोडना है।” उसने भारतीय शिक्षा व्यस्था का अंग्रेजीकरण किया और आविष्कार या रिसर्च की जगह महज डिग्री बांटना उसका मुख्य उद्देश्य बनाया। अंग्रेजों ने भारत में लम्बे समय तक राज करने और भारतियों के मन में भाषा को लेकर फूट डालने के मकसद से देश की आधिकारिक भाषा को अंग्रेजी बनाया, जो आज भी है। इतना ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के बनाये बहुत से कानून देश में आज भी लागू हैं। भाई राजीव दीक्षित जी के अनुसार, “सत्ता हस्तांतरण की संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा। इसलिए आज भी इस देश में ३४७३५ कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था।”
अंगर्जों ने यह भी शर्त रखी थी कि उनके समय में स्थापित १२६ विदेशी कंपनियां भारत में रहकर अपना कारोबार करेंगी और सरकार उन्हें पूरा संरक्षण देगी। ये विदेशी कपनिया आज भी भारत को आजादी से पहले की ही भांति बेरोक टोक लूट-खसोट रही है। इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे। देश में आज भी लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है। रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, फ्रेजर रोड, बेली रोड सहित देशभर में ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, जो सब के सब वैसे के वैसे ही हैं, जैसे अंग्रेजों के समय में थे। आज भी देश के हर बड़े शहर में कोई न कोई भवन या सड़क अंग्रेजों के नाम से रखे मिल जायेंगे। कितने शर्म की बात है कि इन अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के साथ साथ हमारे सदियों पुराने आयर्वेद और गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया था और हम आज भी उन दुष्टों को याद रख्रे हुए हैं।
दरअसल अंग्रेजों का गुणगान करने और उन्हें देशभर में महिमामंडित करने में आज़ादी के समय के हमारे कुछ बड़े नेताओं का बहुत बड़ा हाथ था। पंडित नेहरू जैसे नेता देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन, कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे। उनके लिए तो अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, कृषि व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और कानून व्यवस्था सब आदर्शमय थी, इसलिए उन्होंने स्वदेशी नीति बनाने की जगह अंग्रेजों की बनाई हुई सब व्यवस्था लागू कर दी, जो किसी भी दृष्टि से हमारे देश के अनुकूल नहीं है। भाजपा जैसी देशभक्त पार्टी और राष्ट्रवादी मोदी सरकार को इन सब चीजों का संज्ञान लेना चाहिए और अंग्रेजों से पूर्णरूपेण छुटकारा पाने का प्रयास करना चाहिए, तभी हमारी आधी अधूरी आजादी पूरी होगी। अंत में भारत रत्न से सम्मानित हमारे देश के महान नेता और भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की रचित एक कविता ‘आजादी अभी अधूरी है’ की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

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आलेख और प्रस्तुति=सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी,प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम,ग्राम-घमहापुर,पोस्ट-कन्द्वा,जिला-वाराणसी.पिन-२२११०६.
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