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कुछ दुराचारी साधु संतों के कारण समाज में खलबली

Posted On: 26 Apr, 2018 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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कुछ साधु संतों के अनैतिक कृत्यों और उन्हें न्यायालय द्वारा समुचित सजा मिलने से पीडितों को निश्चित रुप से इंसाफ मिला है। लेकिन आध्यात्मिक रूप से जो भारी क्षति हुई है, उसके कारण समूचे भारतीय जनमानस के साथ ही पूरे देश भर में फैला साधु समाज भी बहुत आहत है। सबको यही लग रहा है कि यदि अब जल्द ही साधु संतों के लिए कड़ी आचार संहिता नहीं बनाई गई तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आध्यात्मिक पहचान तथा वर्तमान समय की समूची संतई ही खतरे में पड़ जाएगी। सब जानते हैं कि आजकल के समय में बहुत से तथाकथित साधु महात्मा अवैध कब्जों, हत्याओं और सेक्स स्कैंडलों में लिप्त पाए जा रहे हैं।

 

 

हमारे समाज का पढालिखा बुद्धिजीवी वर्ग व्यंगय से कह रहा है कि कुछ मठों और आश्रमों में होने वाले बलात्कार, तरह तरह के केस मुकदमों में फंसकर न्यायालयों में झोले लेकर खड़े होने वाले तथाकथित महंतों और रजिस्ट्री दफ्तरों में जमीनें खरीद बेच रहे ढोंगी साधु-संतों को देखकर लगता ही नहीं है कि हमारे देश में संन्यास की प्राचीन परंपरा कहीं शेष बची है। साधुओं के लिए कही जा रही ये बातें बहुत कड़वी और शर्मनाक हैं, लेकिन आज के दौर में जारी ये ऐसी हकीकत है, जिससे आप मुंह नहीं मोड सकते। देश के जागरूक बुद्धिजीवी और पत्रकार काफी हद तक सही बात कह रहे हैं।

 

भोगवादी तूफान में आज हमारी सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक धरोहर सब कुछ बिखर रही है, लेकिन जागरूक भारतीय समाज और सच्चे साधु संत एकजुट होकर अब भी बहुत कुछ बचा सकते हैं। देशभर के साधु-संतों को एक मंच पर आकर चिंतन करना चाहिए। उन संतों को चिन्हित किया जाना चाहिए, जिनके कारण संत परम्परा बर्बाद हो रही है। संत जगत भोग विलास में लिप्त ढोंगी संतों को अपनी मंडली से बहिष्कृत करे। अमीरों और सत्ताधीशों के साथ साथ साधु संतों में भी अब धन बटोरने की हवस जाग गई है, जिसका असर उनकी नैतिकता पर भी पड़ा है। संत जगत के वरिष्ठ आचार्यों को मिल बैठ कर इसका हल खोजना होगा, जिससे भारतीय परंपराओं और आध्यात्मिक मर्यादाओं का संरक्षण किया जा सके। आज जो हो रहा है, वह निश्चय ही चिंता का विषय है।

 

साधु संतों ने सदैव ही भटके हुए समाज को सही दिशा प्रदान की है। लेकिन कुछ पथभ्रष्ट साधुओं के अनैतिक कारनामों के कारण आज ऐसा लगता है जैसे समूचा साधु समाज ही पतन के कगार पर आ गया हो। साधु समाज यानि आश्रमों और मठों में आये दिन होने वाला बलात्कार यही बताता है कि आज नैतिक शिक्षा कहीं नहीं रही, संसार से संयास लेने वाले साधुओं के पास भी नहीं। साधुओं को दीक्षा के समय बताया जाता है कि आंखों से दिखने वाली माया के प्रति सदैव मन में मातृ भाव रखें और साधु होने के बाद सदैव जीभ और लिंग पर नियंत्रण रखें। सच्चे साधु संत न अपने पैर छूने देते हैं और न ही किसी को अपने हाथों से छूते हैं। शिष्य यदि सात समन्दर पार है तो भी सच्चे गुरू इतनी दूर से भी आशीर्वाद देने में समर्थ होते हैं।

 

भारत के साधु संत अब दुनिया में ईश्वर भक्त, सिद्ध और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि धन दौलत व सत्ता सुख के लालची, भोगी और ढोंगी के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। सच्चे साधु संत सनातन भारतीय सभ्यता संस्कृति और आध्यात्मिक धरोहर की ऐसी दुर्दशा होते देखसुनकर भी मौन साधे हुए हैं, यही सबसे दुखद बात है। अब उन्हें चेतना चाहिए। यदि सनातन धर्म प्रेमी भारतीय समाज और सच्चे साधु संत अब भी न जागे तो बहुत देर हो जाएगी। हमारी भारतीय सभ्यता व संस्कृति की मूल पहचान संयास और आध्यात्म आज के समय में जारी भोगवादी पाखंडी आंधी में विलुप्त हो जाएगी। भारतीयों के लिए इससे बडी शर्म की बात और क्या होगी। जयहिंद।

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