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कैसा विकास? गाँवों की टूटीफूटी सड़कें, गलियों में बहता घरों का गंदा पानी

Posted On: 26 Nov, 2016 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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देश का विकास तेजी से हो रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं, किन्तु हमारे गाँवों की टूटीफूटी सड़कें और गलियों में बहता गंदा पानी यही कह रहा है कि वहां पर कोई विकास या सुधार नहीं हो रहा है. इस ब्लॉग में मैं अपने गाँव की स्थिति बयान कर रहा हूँ. वाराणसी के कन्दवा क्षेत्र में स्थित लगभग पांच हजार की आबादी वाला घमहापुर गाँव शहर से सटा हुआ है, लेकिन विकास के नाम पर इसकी स्थिति शून्य है. चितईपुर से कंदवा पोखरा तक सड़क कुछ हद तक ठीक है, किन्तु कन्दवा पोखरा से घमहापुर गाँव तक जाने वाली ईंट बिछी वर्षों पुरानी सड़क बेहद खस्ताहाल में है. बारिश के मौसम में तो इस सड़क पर चलना तक दुश्वार हो जाता है. आश्रम के एक शिष्य कई महीने बाद दिखाई दिए, कारण पूछा तो बोले जुलाई में गुरु पूर्णिमा के मौके पर फिल्म सिटी के पास पानी भरे एक गड्ढे में बाइक समेत उलट गया था. पैर में फ्रैक्चर होने से कई महीने तक परेशानी झेलनी पड़ी. ऐसी परेशानी अक्सर लोंगो को होती रहती है.
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प्राइवेट वाहलों के अलावा कई स्कूलों की गाड़ियां भी रोज इस सड़क पर आती जाती हैं. उखड़ी हुई ईंटों और गड्डों के कारण जो परेशानी आम लोंगो और स्कूली बच्चों को होती है, उसका वर्णन करना कठिन है. इस सड़क की मरम्मत के लिए विधायक से लेकर मंत्री तक के पास लोग दौड़ लगाए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. घमहापुर गाँव और उसके आसपास बनी कालोनियों में पानी निकासी का कोई भी समुचित प्रबंध नहीं हैं. सड़क और चकरोट के साथ-साथ नाला न बना होने से पानी निकासी का कोई रास्ता नहीं है. कई जगहों पर जिस नाली से पानी बह रहा था, वहां पर नया मकान बनते ही नाली को बंद कर दिया गया. कई नाले पाटकर कालोनाइजरों द्वारा बेच दिए गए. कई नाले बरसाती मिटटी से पट गए हैं और उनकी फिर से खुदाई हुई ही नहीं. सड़क और गलियों के चकरोट के एक तरफ नाला न होने से पानी निकासी की समस्या गहरा गई है. घरों से निकलने वाला पानी गलियों में एकत्रित हो जाता है.

बहुत सी गलियां कच्ची होने के कारण वहां पर हमेशा कीचड़ की समस्या बनी रहती है. इससे लोगों को आने-जाने में काफी परेशानी झेलनी पड़ती है. कई गलियों में भरे गंदे पानी और कीचड़ से आसपास दुर्गंध फैली रहती है. खतरनाक मच्छरों के बढ़ने से मलेरिया और डेंगू का ख़तरा भी बना रहता है. कॉलोनी के लोगों ने कई बार प्रशासन से कॉलोनी में मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने की मांग की, लेकिन आज तक समस्या का समुचित समाधान नहीं हुआ. प्रशासन को चाहिए कि वो सड़क और चकरोट के साथ-साथ नाले व नाली का निर्माण भी कराये. इस क्षेत्र में कूड़ा कचरा फेंकना भी एक बड़ी समस्या है. न तो कूड़ा कचरा फेंकने की कोई जगह है और न ही कूड़ा कचरा उठा के ले जाने की कोई शासकीय व्यवस्था है. कई जगहों पर लगे कूड़े कचरे के ढेर संक्रामक बीमारियों को आमन्त्रण दे रहे हैं. मज़बूरी में गाँव में लोग घर से निकलने वाले कचरे के ढेर से कागज व प्लास्टिक आदि अलग कर जला देते हैं और सब्जी के छिलके पशुओं को खिला देते हैं.
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गाँव में बिजली की स्थिति यह है कि बिजली तो रहती है, किन्तु सही बोल्टेज मिलने की समस्या अक्सर बनी रहती है. कई जगहों पर फेस है तो न्यूट्रल गायब. जमीन से अर्थ लेकर काम चलाना अधिकतर लोंगों की मज़बूरी बन गई है. इससे कुछ हद तक ही समस्या हल हो पाती है, लेकिन यह बेहद जोखिम भरा है. स्थानीय लोंगों ने जेई से लेकर उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल तक अपनी शिकायत पहुंचाई, परंतु कोई कार्यवाही नहीं हुई. अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. फिर वही यक्ष प्रश्न वोट किसे दें और क्यों दें? लोग चुनाव में वोट देते हैं, किसलिए, क्षेत्र के विकास के लिए, तो फिर क्षेत्र का विकास तो होना चाहिए, नहीं तो वोट देने से फायदा क्या है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मैं बहुत इज्जत करता हूँ और उन्हें भविष्य का एक बेहतर राष्ट्रीय नेता भी मानता हूँ, उनसे मेरी गुजारिश है कि वो इस फ़क़ीर के चाय के न्यौते को स्वीकार कर गाँव में आएं, हमारी समस्याएं देंखे और उसका समुचित समाधान करें.

गाँवों की बदहाली दूर करने की चुनौती

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश का विकास तेजी से हो रहा है, किन्तु हमारे गाँवों की टूटी-फूटी सड़कें और गलियों में बहता पानी यही कह रहा है कि वहां पर कोई विकास का कार्य नहीं हो रहा है. विकास के नाम पर देश के अधिकांश गावों की स्थिति शून्य है. गाँवों में सड़कों की स्थिति जर्जर है. बारिश के मौसम में तो उन सड़कों पर चलना तक मुश्किल हो जाता है. ग्रामीण जगत में अधिकांश दुर्घटनाएं खराब सड़कों की वजह से होती हैं. गाँवों में स्कूलों का भी घोर अभाव है, जिससे बच्चों को कई किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए जाना पड़ता है. स्कूलों की दशा भी बेहद खराब है. गाँवों में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति तो और भी बदतर है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सबसे पहले तो डॉक्टर मिलते ही नहीं हैं, वो अक्सर अपनी ड्यूटी से नदारद रहते हैं. भूले भटके यदि वहां पर डॉक्टर कभी मिल भी जाएं तो न दवाइयां मिलती हैं और न ही जांच पड़ताल की सुविधा है.

गाँवों में बैंकिंग व्यवस्था की स्थिति भी बेहद खराब है. एक तो ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कम बैंकों की शाखाएं हैं, दूसरे आजकल नोटबन्दी की वजह से बैंकों में इतनी भीड़ चल रही है कि बैंक में जिस दिन किसी का काम पड़ जाता है तो समझिये कि उसका पूरा दिन उसी में चला जाता है. जाहिर है कि यदि देश को आगे ले जाना है तो गांवों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचानी होंगी. गाँवों को हर हाल में खुशहाली के मार्ग पर आगे ले जाना होगा. गाँवों की उन्नति किये बिना केवल शहरों में हो रहे विकास के बल पर भारत बहुत आगे नहीं जा पायेगा और उसकी उन्नति भी सर्वांगीण और चहुँमुखी विकास वाली नहीं मानी जायेगी. चाहे केंद्र सरकार हो राज्य सरकार, गाँवों की बदहाली दूर करना उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है. सड़क, पानी, बिजली, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवाएं, हर क्षेत्र में भारत के गाँवों की बदहाली देखकर तो नहीं लगता कि इसे लेकर सरकारें गंभीर हैं.

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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