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डॉक्टर कलाम: दुखद है ऐसे सामान्य भारतीय का चले जाना

Posted On: 29 Jul, 2015 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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डॉक्टर कलाम: दुखद है ऐसे सामान्य भारतीय का चले जाना
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“यदि आप लोग मुझसे प्रेम करते हैं तो मेरी मृत्यु पर अवकाश घोषित मत करना, बल्कि एक दिन और ज्यादा काम करना।” अवुल पकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम जी की यही इच्छा थी, जो पूरी भी हुईे। भारत के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ हो कि किसी राष्ट्रपति की मृत्यु पर सरकारी अवकाश घोषित न हो और स्कूल, कालेजों में पढाई हो। ‘मिसाइल मैन’ के नाम से मशहूर भारत के ११वें राष्ट्रपति भारत रत्न डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की ८४ वर्षों की संघर्षमयी और सबके लिए बेहद प्रेरणादायी जीवनी को सलाम। उन्हें कोटि कोटि नमन। ईश्वर ऐसी महान आत्मा को शांति और सद्गति दें, बस यही प्रार्थना है।
एयरोस्पेस इंजिनियर और मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से ग्रेजुएट डॉक्टर कलाम की वैज्ञानिक प्रतिभा की बात करें तो डिफेंस रिसर्च ऐंड डिवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) में कई वर्षों तक काम करते हुए उन्होंने इंडियन आर्मी के लिए छोटा हेलिकॉप्टर डिजाइन किया। डीआरडीओ में जब वो कार्य कर थे तब अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से पूरे अनुशासन के साथ कार्य लेने के साथ ही उनसे मानवतापूर्ण और अच्छे व्यवहार के लिए भी जाने जाते थे। एक बार उनके एक अधीनस्थ कर्मचारी को अपने बच्चों को प्रदर्शनी ले के जाना था, परन्तु वो अपने कार्य में इतने व्यस्त थे कि उन्हें छुट्टी मिलना था। तब डॉक्टर कलाम खुद उनके बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने ले गए थे।
सन १९६२ में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) में आने के बाद सब उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा के कायल हो गए। स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण और ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डिवेलपमेंट प्रोग्राम’ की सफलता में उनकी अहम भूमिका रही। पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी-३) से रोहिणी सैटलाइट को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक छोड़की बात हो या फिर त्रिशूल, पृथ्वी, आकाश, नाग, अग्नि और रूस के साथ संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस जैसी स्वदेशी मिसाइलें बनाने की बात हो, उनका योगदान अभूतपूर्व और अविस्मरणीय है।
भारत को एक विकसित और सुपरपावर देश बनाने का उनका सपना तब परवान चढ़ा, जब साल १९९८ में ११ और १३ मई को भारत द्वारा पोकरण में सफल परमाणु परीक्षण किया गया। इसके बाद से तो वो भारत के ‘मिसाइल मैन’ कहे जाने लगे। डॉक्टर कलाम भारत द्वारा सफलतापूर्वक परमाणु परिक्षण करने जैसी एक बहुत बड़ी उपलब्धि से ही संतुष्ट नहीं थेे। उनका मानना था कि भारत को सुपर पावर बनाने के लिए कृषि एवं खाद्य प्रसंस्ककरण, ऊर्जा, शिक्षा व स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी, परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा प्रौद्योगिकी आदि, इन सब क्षेत्रों में समुचित विकास होना जरुरी है।
डॉक्टर कलाम की देशभक्ति अतुलनीय है। देश के विकास के लिए उन्होंने मंत्रिपद भी ठुकरा दिया था। वो उन दिनों में प्रधानमंत्री के चीफ साइंटिफिक अडवाइर और डीआरडीओ के चीफ सेक्रेटरी थे, जब १९९८ में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उन्हें मंत्री पद का ऑफर दिया था। मंत्रिपद से ज्यादा रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाना उन्हें महत्वपूर्ण लगा, इसलिए उन्होंने मंत्री पद स्वीकार नहीं किया। आज के सत्तालोलुप और मंत्री पद के लालची नेताओं को उनसे सबक सीखना चाहिए। उनकी सादगी और मानवीयता की भी जितनी भी तारीफ की जाये, वो कम है।
अपने सार्वजनिक जीवन में अपनी सादगी और उच्च स्तर के मानवीय व्यवहार के कारण ही वो ‘जनता के राष्ट्रपति’ कहे गए। सन २००२ में राष्ट्रपति बनने के बाद डॉक्टर कलाम जब पहली बार राष्ट्रपति के रूप में केरल गए तो राजभवन में जिन दो ख़ास मेहमानो को मिलने के लिए उन्होंने बुलाया, उनमे से एक सड़क किनारे जूते सिलने वाले मोची और दूसरे एक छोटे से होटल के मालिक थे। ये दोनों उनके पुराने साथी थे, जिन्हे वो सफलताओं के शिखर पर पहुंचकर भी नहीं भूले थे।
डॉक्टर कलाम अपने सरल और सहज व्यवहार के कारण बच्चों से लेकर युवा और बूढ़ों तक सबके बीच बेहद लोकप्रिय थे। सन २०१२ में आजमगढ़ में वो एक निजी अस्पताल का शुभारम्भ करने गए थे। वहां से वाराणसी लौटते समय रानी की सराय बाजार में उन्होंने अपने काफिले को रुकवाया और सड़क के किनारे स्थित चाय की छोटी सी दूकान पर जाकर समोसे के साथ चाय की चुस्की ली और दुकानदार से क्षेत्र का हालचाल पूछा। उन्होंने कई लोगों को आटोग्राफ भी दिया।
डॉक्टर कलाम की सादगी का एक और प्रसंग है। दस जुलाई २०१३ को वो आईआईटी बीएचयू के प्रथम दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप मे शामिल हुए थे। जब वो मंच पर आये तो उनके लिए लगाई गई एक विशेष ऊँची कुर्सी पर बैठने से उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा, मैं एक साधारण भारतीय हूँ, कोई वीआईपी नहीं। दिखावा और चाटुकारिता से परिपूर्ण वीआईपी संस्कृति उन्हें पसंद नहीं थी। उनके लिए दूसरी कुर्सी मंगवाई गई, तब उसपर बैठे।
डॉक्टर कलाम बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। शास्त्रीय संगीत के वो बहुत शौकीन थे। एक तरफ उन्हें कुरआन से लगाव था तो दूसरी तरफ उतना ही लगाव गीता से भी था। वो मस्जिद जाते थे तो दूसरी तरफ रामेश्वरम के श्री रामनाथस्वामी मंदिर से भी उहे बचपन से ही बेहद लगाव था। वो अपने जीवन में अनुशासनप्रियता, शाकाहारी भोजन, और ब्रह्मचर्य को बहुत अधिक महत्व दिए तथा मदिरा का सेवन करने से हमेशा दूर रहे। युवाओं को इससे शिक्षा लेनी चाहिए। महात्मा गांधी के बाद डॉक्टर कलाम दूसरी ऐसी गैर-राजनीतिक सख्सियत थे, जिन्हे जनता का अभूतपूर्व समर्थन और प्यार मिला। जीवन के अंतिम पंद्रह वर्षों में उन्होंने युवाओं को सलाह और दिशा देना अपने जीवन का अंतिम मिशन बना लिया था। वो अपने इसी मिशन पर आईआईएम शिलांग गए हुए थे, जहाँ पर ‘जीवन योग्य ग्रह’ नामक विषय पर व्याख्यान देते हुए हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई। अंत में हम सब के जीवन में मार्गदर्शन देने वाली कुछ बातें, जो डॉक्टर कलाम ने समय समय पर कही थीं।
१- मैं एक सामान्य भारतीय हूँ।
२- सपने सच हों, इसके लिए सपने देखना जरूरी है।
३- छात्रों को प्रश्न जरूर पूछना चाहिए। यह छात्र का सर्वोत्तम गुण है।
४- आओ, हम अपना आज कुर्बान करें, ताकि हमारे बच्चों का कल बेहतर हो।
५- हमें हार नहीं माननी चाहिए और समस्याओं को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
६- मनुष्य को मुश्किलों का सामना करना चाहिए, क्योंकि सफलता के लिए यह जरूरी है।
७- भगवान उसी की मदद करता है, जो कड़ी मेहनत करते हैं। यह सिद्धान्त स्पष्ट होना चाहिए।
८- अगर एक देश को भ्रष्टाचार मुक्त होना है तो मैं यह महसूस करता हूं कि हमारे समाज में ३ ऐसे लोग हैं, जो ऐसा कर सकते हैं। ये हैं- पिता, माता और शिक्षक।
९- जब तक भारत विश्व की बराबरी में नहीं खड़ा होगा, तब तक कोई हमारा सम्मान नहीं करेगा। इस विश्व में डर की कोई जगह नहीं है। यहां केवल शक्ति ही शक्ति का सम्मान करती है।
१०- अलग ढंग से सोचने का साहस करो, आविष्कार का साहस करो, अज्ञात पथ पर चलने का साहस करो, असंभव को खोजने का साहस करो और समस्याओं को जीतो और सफल बनो। ये वो महान गुण हैं, जिनकी दिशा में तुम अवश्य काम करो।
११- जब हम बाधाओं का सामना करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे भीतर साहस और लचीलापन मौजूद है, जिसकी हमें स्वयं जानकारी नहीं थी, और यह तभी सामने आता है जब हम असफल होते हैं। जरूरत हैं कि हम इन्हें तलाशें और जीवन में सफल बनें।

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी.पिन- २२११०६)
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