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भारत: जहाँ डाल-डाल पर 'सोने की चिड़िया' करती थी बसेरा

Posted On: 11 Aug, 2015 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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जहाँ डाल-डाल पर ‘सोने की चिड़िया’ करती थी बसेरा
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जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा।
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा।

राजेन्द्र कृष्ण जी का लिखा हुआ ये मशहूर गीत हर साल १५ अगस्त पर रेडियो और टीवी पर सुनने को मिल जाता है। सुनने में ये गीत बहुत अच्छा लगता है, परन्तु हम सब भारतवासी जानते हैं कि ये कर्णप्रिय गीत वास्तविकता से कोसो दूर है। भ्रस्टाचार के दलदल में डूबा हुआ सत्य, हिंसा के आगे जड़वत और तटस्थ हो चुकी अहिंसा तथा अधर्म और व्यवसाय की चादर ओढ़ लोगों को पग-पग पर भरमाता, ठगता और जन्मने से लेकर मरने तक लूटता हुआ धर्म। अभी भी देश में इतनी गरीबी और भुखमरी है कि वो भूखे-प्यासे, फटे-नंगे बदन रो रो कर यही कह रही है कि हमारे देश के पेड़ों पर अब सोने की तो क्या ताम्बे की चिड़िया तक भी बसेरा नहीं करती हैं।
आज आप देश के अविकसित क्षेत्रों और विकट समस्यायों पर विचार करें तो भारत को सोने की चिड़िया कहना मूर्खतापूर्ण और कभी पूरा न होने वाला स्वप्न मात्र लगेगा, प्रन्तु आप को ये जानकर बहुत हैरानी और ख़ुशी होगी कि अपने स्वर्णिम अतीत में भारत कई सदियों तक ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता रहा। अंगेजों ने भारत पर कब्जा करने के उद्देश्य से पूरे विश्व भर में यह अफवाह फैलाई थी कि भारत ‘सपेरों का देश’ है और हम उसे सभ्य बनाने जा रहे हैं। अंग्रेज भारत के स्वर्णिम अतीत से भलीभांति परिचित थे। सभ्यता, संस्कृति और कला सबसे पहले भारत में विकसित हुई थी। वो जानते थे कि जब वो लोग असभ्य और जंगली जीवन जी रहे थे, तब भारत सभ्यता के शिखर पर था।
स्कॉटिश इतिहासकार मार्टिन के अनुसार, “जब इंग्लैंड के निवासी बर्बर और जंगली जीवन बिताते थे तब भारत में सबसे बेहतरीन कपडा बनता था और विश्व के बाजारों में बिकता था। मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं की भारवासियों ने पूरी दुनिया को कपडा बनाना और पहनना सिखाया है। रोमन साम्राज्य के सभी राजा-रानी भारत से कपडा मंगाते रहे और पहनते रहे हैं।”
फ़्रांस के इतिहासकार फ्रांस्वा पैराड ने सन १७११ में भारत के बारे में लिखा था, “मेरी जानकारी में भारत में ३६ तरह के ऐसे उद्योग हैं जिनमें बनी हर चीज विदेशों में निर्यात होती है। भारत के सभी शिल्प और उद्योग उत्पादन में सर्वोत्कृष्ट, कलापूर्ण व् कीमत में सबसे सस्ते हैं। मुझे मिले प्रमाणों के अनुसार भारत का निर्यात दुनिया के बाजारों में पिछले ३००० सालों से बिना रुके चल रहा है।”
१७वीं सदी के सम्पन्न और सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के बारे में लेखक विलियम डिग्बी अपनी पुस्तक में लिखते हैं, “भारत के व्यापारी सबसे होशियार हैं। भारत का कपडा और अन्य वस्तुएं पूरे विश्व में बिक रही हैं। भारत के व्यापारी इनके बदले में सोने-चांदी की मांग करते हैं और अन्य देशों के व्यापारी उन्हें हाथों-हाथ दे देते हैं। इससे भारत में सोना-चाँदी ऐसे प्रवाहित होता है जैसे नदियों में पानी। जैसे भारत की नदियों का पानी बहकर महासागर में गिरता है वैसे ही विश्व का सोना-चाँदी बहकर भारत में गिरता है ,पर यह भारत से बाहर जाता नहीं है, क्योंकि वे मात्र निर्यात करते हैं, आयात करते ही नहीं हैं। वो हर चीज का उत्पादन करते हैं, इसलिए आयात की जरूरत ही नहीं पड़ती है।”
अठारहवीं सदी में भारत कितना सम्पन्न था, इसका अंदाजा थोमस बी. मेकाले की बातों को पढकर लगा सकते हैं। वो १७ वर्ष तक भारत में रहकर पूरे भारत का भ्रमण और गहनता से अध्ययन किये। लन्दन वापस जाकर २ फ़रवरी सन १८३५ को इंग्लैंड की संसद के सदन ‘हाउस ऑफ़ कॉमन्स’ में भाषण देते हुए उन्होंने कहा, ”मै भारत में हर तरफ घूमा पर मुझे वहाँ न कोई भिखारी मिला और न ही चोर। मैंने भारत में इतनी धन-सम्पदा देखी है कि हम इस देश को जीतने के बारे में नहीं सोच सकते, क्योंकि संपन्न और धनवान लोगों को गुलाम बनाना बहुत मुश्किल होता है। में जिस व्यक्ति के घर गया था, वहां पर सोने के सिक्कों का ऐसा ढेर लगा हुआ था, जैसे किसान के घर में चने और गेहूं का। भारत के लोग उन्हें गिन नहीं पाते हैं, इसीलिए वो लोग सिक्कों को तौलकर देते हैं।”
फ़्रांसिसी इतिहासकार त्रेवारनी ने सन १७५० में लिखा था कि, “भारत के वस्त्र इतने हलके और सुंदर हैं कि हाथ पर रखने पर उनका वजन पता ही नहीं चलता है।”
अंग्रेज इतिहासकार विलियम वार्ड के अनुसार, “भारत का १३ गज लम्बा कपडा हम एक छोटी सी अंगूठी से खींचकर बाहर निकाल सकते हैं। १५ गज के कपडे के थान का वजन १०० ग्राम से भी कम होता है और कुछ थानों का वजन तो १५ -२० रत्ती तक ही होता है। भारत का मलमल इतना विलक्षण है कि अगर इसे घास पर बिछा दो और उस पर ओस की बूँद गिर जाये तो तो दिखाई नहीं देती है, क्योंकि जीतनी हलकी ओस की बूँद होती है उतना ही हल्का वह मलमल होता है। हम अंग्रेजों ने तो कपडा बनाना सन १७८० के बाद शुरू किया जबकि भारत में तो ३००० सालों से कपडा बनता और विश्व भर में बिकता रहा है।”
भारत में गवर्नर रह चुके एक अंग्रेज अधिकारी थोमस मुनरो ने भारत की बनी शोल की प्रशंसा करते हुए सन १८१३ में लन्दन की संसद में कहा था, “में भारत से एक शॉल लाया, जिसे ७ सालों से प्रयोग कर रहा हूँ, फिर भी उसकी क्वालिटी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। मैंने पूरे यूरोप में प्रवास किया है, पर किसी भी देश में ऐसी शॉल बना नहीं पाया। भारत का वस्त्र उद्योग अतुलनीय है।”
अंगेजों के भारत आने से पहले पूरे विश्व बाजार में भारत की स्थिति बहुत मजबूत और गौरवान्वित करने वाली थी। सन १८१३ में ब्रिटेन की संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार सारी दुनिया के कुल उत्पादन का ४३% उत्पादन भारत में होता था। भारत का निर्यात ३३% और आमदनी २७% थी। उस समय अमेरिका, ब्रिटेन सहित यूरोप के २७ देशों का निर्यात सिर्फ ३ से ४ % और आमदनी ४ से ५% मात्र थी।
इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि अंग्रेजों के भारत में आने से पहले तक विश्व बाजार में भारत की व्यावसायिक स्थिति बहुत मजबूत थी, प्रन्तु अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा कर यहाँ के किसानों, कारीगरों और कलाकारों पर बर्बर अत्याचार कर भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाले देश का सोना, चांदी, हीरा, कीमती खजाना, खनिज पदार्थ और बेशुमार प्राकृतिक सम्पदा लूटकर अंग्रेज अपने देश ले गए।
भारत के गौरवशाली अतीत और उसकी हर क्षेत्र में विकसित तकनीकी श्रेष्ठता पर विश्व के अनेक विशेषज्ञों ने शोध किया है। १८वीं सदी के भारत के बारे में शोधकर्ता कैम्पबेल ने कहा है, ”देश में उत्पादन सबसे अधिक तभी होता है, जब वहां विकसित तकनीक हो। तकनीकी श्रेष्ठता तभी संभव है जब वहां विज्ञान हो। भारत के जोड़ का स्टील पूरे विश्व में कहीं नहीं है। इंग्लैंड या यूरोप का अच्छे से अच्छा लोहा भी भारत के घटिया लोहे से मुकाबला नहीं कर सकता।”
धातु विशेषज्ञ जेम्स फ्रेंकलिन ने १८वीं सदी में भारत के बारे में कहा था, “भारत का स्टील सर्वश्रेष्ठ है। भारत के कारीगर स्टील बनाने की जो भट्टियाँ बनाते हैं वो विश्व में कोई नहीं बना पता। इंग्लैंड में तो लोहा बनना अभी शुरू हुआ है जबकि भारत में तो १०वीं सदी से ही हजारों टन लोहा बनता और विश्व में बिकता रहा है।”
सन १७६४ में भारतीय स्टील का नमूना जंचवाने के बाद इंग्लैण्ड के प्रसिद्द धातु विशेषज्ञ डा. स्कॉट ने कहा था,”यह स्टील इतना अच्छा है कि सर्जरी के सारे उपकरण इससे बनाये जा सकते हैं। मुझे लगता है कि इस स्टील को अगर हम पानी में भी डालकर रखेंगे तो भी इसमें जंग नहीं लगेगी।”
अठारवीं सदी में भारत की शिपिंग इंडस्ट्री पर रिसर्च करने वाले अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल ए.वाकर ने कहा था, ”भारत का अद्भुत स्टील जहाज बनाने के काम में बहुत उपयोगी है। दुनिया में जहाज बनाने की सबसे पहली कला और तकनीक भारत में ही विकसित हुई और दुनिया ने पानी का जहाज बनाना भारत से ही सीखा है। भारत में समुद्र किनारे बसे हुए गावों में पिछले २००० सालों से जहाज बनाने का काम हो रहा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के जितने भी जहाज दुनिया में चल रहे हैं वो भारत की स्टील से ही बने हैं। यह कहने में मुझे बड़ी शर्म आती है कि हम अंग्रेज अभी तक इतना अच्छा स्टील नहीं बना पाए हैं।”
भारत के अच्छे और टिकाऊ स्टील की तारीफ करते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल ए.वाकर ने कहा था, ”अगर हम भारत में ५० साल चला जहाज खरीदते हैं और ईस्ट इंडिया कंपनी में चलाते हैं तो वो भी २०-२५ साल आराम से चल जाता है। हम जितने धन में एक नया जहाज बनाते हैं उतने ही धन में भारतीय ४ नए जहाज बना लेते हैं।”
उन्होंने अंगेजी हुकूमत को सुझाव दिया था कि, “भारत में तकनीक के स्तर पर ईंट, ईंट जोड़ने का चूना और इसके अलावा भारत में ३६ तरह के दूसरे अन्य तकनीकी उद्योग हैं और इन सभी में भारत दुनिया में सबसे आगे है इसीलिए हमें भारत से व्यापार करके यह तकनीक लेनी है और यूरोप लाकर पुनरुत्पादित करनी चाहिए।”
भारत के प्राचीन विज्ञान पर विश्व के अनगिनत वैज्ञानिक अबतक रिसर्च कर चुके हैं। प्राचीन भारत में खगोलविज्ञान, नक्षत्र विज्ञान और बर्फ विज्ञान अत्यंत विकसित था। अंग्रेज इतिहासकार वाकर के अनुसार, ”भारत में विज्ञान की जो ऊँचाई है उसका अंदाजा हम अंग्रेज लोग नहीं लगा पाये।” आज सारी दुनिया कोपरनिकस को दुनिया का पहला वेज्ञानिक मानती है जिसने प्रथ्वी और सूर्य के बीच सम्बन्ध बताया। दोनों के बीच की दूरी और उपग्रह बताये पर अंग्रेज इतिहासकार वाकर ही इसे झूठ करार देता है। उसके अनुसार, ”यूरोपियन लोगों से हजारों साल पहले भारत के वेज्ञानिकों ने प्रथ्वी से सूर्य की दूरी का ठीक-ठीक पता लगाया व भारतीय शास्त्रों में उसे दर्ज किया।”
हमारे वेदों में और खासकर यजुर्वेद में ऐसे कई श्लोक हैं जिनमें खगोलशास्त्र का बहुत सारा ज्ञान मिलता है। कोपरनिकस से एक हजार साल पहले ही भारतीय वेज्ञानिक आर्यभट्ट ने प्रथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी बिलकुल ठीक-ठीक माप दी थी जो की आज भी ठीक मानी जाती है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं की जिस देश के वेज्ञानिकों ने यूरोप से एक हजार साल पहले ही प्रथ्वी-सूर्य की दूरी माप ली हो तो उस देश में विज्ञान कितना विकसित रहा होगा।
सबसे पहले हमारे देश के वेज्ञानिकों ने ही बताया था कि सर्दी, गर्मी, बरसात में रात-दिन कितने बड़े होंगे। प्रथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और सूर्य की परिक्रमा करती है। यह बात सर्वप्रथम १०वीं सदी में भारतीयों ने ही प्रमाणित की थी। यह भी भारतीयों ने ही बताया था कि प्रथ्वी के घूमने से दिन-रात होते हैं, मौसम और जलवायु बदलते हैं। जब दुनिया के कई देश पढना-लिखना भी नहीं जानते थे तब तीसरी सदी के आस-पास भारतीय वेज्ञानिकों ने यह बता दिया था कि सूर्य के कितने उपग्रह हैं और उनका सूर्य से क्या सम्बन्ध है।
श्री आर्यभट्ट ने ही दिनों का नामकरण रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार आदि किया था। अंग्रेज खगोलविज्ञानी और नक्षत्र विज्ञानियों ने इसे भारत से लेकर संडे, मंडे, ट्यूसडे, वेडनेसडे आदि कर दिया और वो इस बात को स्वीकार भी करते हैं। एक अंग्रेज डेनियल डिफो भारतीय पंचंग कि तारीफ करते हुए आश्चर्य से कहता है कि, ”मैंने जब भी भारत का पंचांग पढ़ा है, मुझे एक सवाल का उत्तर कभी नहीं मिला कि भारत के वेज्ञानिक कई-कई साल पहले कैसे पता लगा लेते हैं कि आज चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण पड़ेगा और इस समय पड़ेगा और सही उस समय ही पड़ता भी है।“
भारत प्राचीन समय में अत्यधिक विकसित और सम्पन्न क्यों था, जब उसे विश्वगुरु कहा जाता था। इसी सवाल का जबाब ढूंढने के लिए मैंने परम सम्मानीय भाई स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के कई व्याख्यान सुने और उनके द्वारा सप्रमाण कही गई बहुत सी बातों को नोटकर इस लेख में समाहित कर दिया हूँ। उनका दृढ विश्वास था कि स्वदेशी नीतियों को अपनाकर ही भारत फिर से ‘सोने की चिड़िया’ और ‘विश्वगुरु’ बन सकता है। भारतीय संस्कृति और भारतीय जनता के हितों के लिए आजीवन सघर्ष करने वाले उस महान आत्मा और महान योद्धा के सत्य और क्रांतिकारी विचारों को जन जन तक पहुंचाने की कोशिश करते हुए यह पोस्ट उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है।
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(संस्मरण और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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