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हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: क्या देश तोड़ो.. कुछ भी बोलो.. बस यही है?

Posted On: 1 Mar, 2017 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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अफजल गुरु और बुरहान वानी जैसे आतंकियों से हमदर्दी रखने वाले और जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में जेल जा चुके विवादास्पद वामपंथी नेता उमर खालिद को पिछले महीने एक संगोष्ठी में अतिथि वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में आमन्त्रित किया गया. जब भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने इसका कड़ा विरोध किया तो जबाब में रामजस कॉलेज परिसर में बस्तर मांगे आजादी.. कश्मीर मांगे आजादी.. छीन के लेंगे आजादी.. जैसे भड़काऊ नारे लगे. मंगलवार को मीरजापुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सारी संवैधानिक और सामाजिक मर्यादाएं तोड़ते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुलेआम को मंच से हि$#@ और सा@& जैसी गन्दी गालियां दी. कौन कहता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं है? कुछ भी बोलने की भारत जैसी खुली छूट तो दुनिया के अन्य किसी भी देश में नहीं है.

आज हिंदुस्तान में एक ओर जहाँ नेता खुलेआम चुनावी मंचों से बदजुबानी पर उतर आए हैं, वहीँ दूसरी तरफ छात्र नेता कॉलेजों में हंगामे ओर नारेबाजी करके वहां का माहौल खराब किये हुए हैं. अफसोसनाक बात तो यह है कि शिक्षक भी अब लेफ्ट ओर राइट धड़ों में बंट न सिर्फ अपने-अपने पसन्दीदा ग्रुप के छात्रों के साथ हो लिए हैं, बल्कि प्रदर्शन और नारेबाजी करते हुए सड़कों तक पर उतर आये हैं. भारत की मीडिया सनसनी फैलाने और हंगामा खड़ा करने में महारत हासिल कर चुकी है और आज के युग में खुली व अमर्यादित बहस का सबसे लोकप्रिय मंच बन चुकी सोशल मीडिया तिल का ताड़ बनाने में पूर्णतः दक्ष हो चुकी हैं. बात सिर्फ इतनी सी थी कि एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने रामजस कॉलेज में उस संगोष्ठी को रद्द करवा दिया था, जिसमें हिस्सा लेने के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र उमर खालिद को आमंत्रित किया गया था, जिस पर जेएनयू में एक कार्यक्रम के दौरान देश-विरोधी नारे लगाने का न सिर्फ गम्भीर आरोप लगा, बल्कि वो इस सिलसिले जेल भी जा चुके हैं.

भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेताओं ने उमर खालिद को राष्ट्रविरोधी मान उसका विरोध किया और उसका आमन्त्रण रदद् कराया, इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं, लेकिन एक गलती उनसे भी हुई और वो ये कि जब उमर खालिद को न बुलाने की बात मान ली गई तो फिर उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज परिसर में 22 फरवरी को उग्र विरोध और हिंसक प्रदर्शन करने की जरुरत ही क्या थी? इसे छात्रों, शिक्षकों तथा पत्रकारों पर हमला बता वामपंथी छात्र संगठनों को एबीवीपी के खिलाफ अभियान चलाने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया. लेफ्ट और राइट विचारधारा वाले स्टूडेंट के बीच हुई झड़प के बाद सारा फ़ोकस लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ने वाली एक युवती गुरमेहर कौर पर आ गया, जिसने सोशल मीडिया पर एबीवीपी के खिलाफ कई दिनों तक एक जोरदार अभियान चलाया. इस अभियान के दौरान गुरमेहर कौर के पिता कैप्टन अमनदीप सिंह की चर्चा भी हुई जो साल 1999 में पाक घुसपैठियों द्वारा की गई गोलीबारी में शहीद हो गए थे.

शहीद कैप्टन अमनदीप सिंह की चर्चा अप्रासंगिक और बेतुकी थी. सोशल मीडिया पर अपने शहीद पिता का जिक्र करते हुए गुरमेहर कौर ने कहा था, ‘पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है.’ इस पर तंज कसते हुए देश के मशहूर बल्लेबाज़ वीरेंद्र सहवाग ने लिखा, ‘मैंने दो तिहरे शतक नहीं लगाए, बल्कि मेरे बल्ले ने ऐसा किया.’ धीरे धीरे इस बहस में छात्र, शिक्षक, बुद्धिजीवी, लेखक, खिलाड़ी, नेता, अभिनेता से लेकर आम आदमी तक सभी कूदते चले गए. सोशल मीडिया पर सभ्य-असभ्य, संस्कारी-कुसंस्कारी हर तरह के लोंगों का संगम होता है. इसलिए आप कोई बयान दे रहे हैं तो पाठकों की तीखी प्रतिक्रिया और कड़े विरोध के लिए भी तैयार रहना चाहिए. किसी ने गुरमेहर कौर को अपशब्द कहे और जान से मारने की धमकी दी तो मामला और तूल पकड़ लिया. इसको मुद्दा बना न सिर्फ जमकर राजनीति की गई, बल्कि एक दूसरे की तीखी मुखालफत और ओछी छीछालेदर भी की गई. गुरमेहर कौर ने धमकी देने वालों की पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई.

इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है और वो हमेशा भारत के साथ किसी न किसी रूप में जंग जारी रखना चाहता है. भारत में आतंकी गतिविधियां और नकली नोटों का कारोबार बारहों महीने वो बदस्तूर जारी रखता है. सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा पाकिस्तान को बनाना एक आम बात है. किन्तु उसकी बात करते करते हिंदुस्तानी लोग एक दूसरे को ही देशद्रोही कहने और साबित करने लग जाते हैं, ये बेहद खराब बात है. सोशल मीडिया पर एबीवीपी के खिलाफ कैंपेन चला रही गुरमेहर कौर ने मंगलवार को इससे अपना नाम वापस ले लिया है और उसे अकेला छोड़ देने की विनती की है. सवाल यह है कि उसने एबीवीपी के खिलाफ कैंपेन चलाया क्यों, नेता बनने के लिए या फिर सोशल मीडिया की टाइमपास करने वाली मौजमस्ती के लिए? नेता बनने का सपना देखना या उसके लिए प्रयास करना कोई गुनाह नहीं है, किन्तु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने शहीद पिता का सहारा लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. सारे वामपंथी और मीडिया वाले एक सुर में चिल्ला रहे हैं कि गुरमेहर कौर को बोलने नहीं दिया जा रहा है, ये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन है.

मजेदार बात ये है कि गुरमेहर कौर को जो कुछ भी कहना था वो सोशल मीडिया के खुले मंच से कह चुकी है, उसे कहने से किसने उसे रोका? उसके सहारे अब सिर्फ ओछी राजनीति भर हो रही है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मैं पूरा समर्थन करता हूँ, किन्तु जो स्वतंत्रता अमर्यादित हो और देश को तोड़ने का काम करे, उसका मैं विरोधी हूँ. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले लोग आतंक से पीड़ित कश्मीर सहित देश के कई नक्सल प्रभावित जगह के वासिंदों को पीड़ित बता उनके हित की बात करते हैं, लेकिन वो शहीद होने वाले पुलिस और सुरक्षाबलों की बात नहीं करते हैं. वो आतंकियों से हमदर्दी रखते हैं, लेकिन आतंकी जिन्हें गोली मारते हैं, उनसे कोई सरोकार नहीं रखते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन्हें देना क्या देश में अलगाववाद और हिंसक विचारधारा के विषवमन को बढ़ावा देना नहीं है? जनता के द्वारा चुने हुए और देश के संवैधानिक पद पर आसीन प्रधानमंत्री को खुलेआम गन्दी गालियां देने वाले लालू प्रसाद यादव का इलाज क्या है? क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग नहीं है? अनेक घोटालों में सजायाफ्ता और जमानत पर रिहा लोग देश के प्रधानमंत्री की बेइज्जती करें यह देश की जनता और माननीय सुप्रीम कोर्ट दोनों को ही कदापि बर्दास्त नहीं करना चाहिए.

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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