कुछ रोज पहले आजमगढ़ में एक रैली को संबोधित करते हुए बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की प्रमुख मायावती ने कहा, ‘मैं बीजेपी को खुली चेतावनी देती हूं कि अगर उन्होंने दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों तथा धर्मांतरण करने वाले लोगों के प्रति अपनी हीन, जातिवादी और सांप्रदायिक सोच नहीं बदली तो मुझे भी हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला लेना पड़ेगा.’ हालांकि उन्होंने इसके साथ ही यह भी कहा कि ऐसा करने से पहले वह शंकराचार्यों, धर्माचार्यों तथा भाजपा के लोगों को अपनी सोच बदलने का मौका दे रही हैं. नहीं तो उचित समय पर वह भी अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले लेंगी. हिन्दू धर्म में ही लोग ऐसी धमकी क्यों देते हैं, मुझे इस बात की हैरानी होती है. धर्म में कुछ बुराई है तो उसे दूर करो, हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी क्यों देते हो? राजनीतिक गलियारों में इस बात के कई कयास लगाए लगाए जा रहे हैं कि मायावती ने ऐसा क्यों कहा है. कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान दलित समुदाय के वोट के भाजपा की तरफ खिसकने के चलते ही मायावती ये एक नया राजनीतिक दांव खेल रही हैं. उनके इस दांव से हिन्दू धर्म कमजोर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं.

बड़ी संख्या में दलितों को बौद्ध बनाकर भाजपा के दलित वोट बैंक को कमजोर करने की यह बहुत सोची समझी राजनीतिक चाल हो सकती है. मायावती कह भी रही है कि वो अकेले नहीं, बल्कि अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लेंगी. ऐसा करने से उन्हें लग रहा होगा कि धर्म परिवर्तन के बाद दलित उन्हें ही वोट देंगे और लोकसभा व यूपी विधानसभा के चुनाव के दौरान भाजपा की तरफ खिसक गया दलित वोटर वापस उनकी तरफ आ जाएगा. हालाँकि उनका ऐसा सोचना भी सत्ता पाने का अभी हसीन ख्वाब भर ही है. उनके इस कार्य से हिन्दू धर्म भले ही कितना भी कमजोर क्यों न हो और उसकी चाहे कितनी भी जगहंसाई क्यों न हो, इससे उन्हें क्या मतलब? सच बात तो यह है कि साम, दाम, भेद और दंड किसी भी तरह से सत्ता हथियाने की चाह रखने वाले नेताओं को हिन्दू धर्म के टूटने या कमजोर होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. आजमगढ़ की रैली में मायावती ने कहा, ‘बीजेपी जातीय संघर्ष करवा कर वोटबैंक की राजनीतिक चाल चल रही है.’ हालांकि उनकी यह बात भी हास्यास्पद ही है. भाजपा ने जातीय संघर्ष तो नहीं कराया है, लेकिन उसने जातीय राजनीति जरूर की है, जो कि सभी दलों के साथ साथ खुद मायावती भी कर रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप मढ़ते हुए मायावती ने कहा, ‘नए भारत के निर्माण की बात कहकर प्रधानमंत्री लोगों को गुमराह कर रहे हैं.’ प्रधानमंत्री मोदी जब नए भारत के निर्माण की बात करते हैं तो वो गरीबों और दलितों के साथ साथ सभी सवा करोड़ भारतियों के उत्थान की बात करते हैं, जबकि मायावती की सोच केवल दलितों के उत्थान तक ही सीमित है, इसलिए प्रधानमंत्री पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाना बिल्कुल बेतुका और हास्यास्पद है. बुधवार को आजमगढ़ की रैली में मायावती ने एक बड़ी मह्त्वपूर्ण बात कही कि बाबा साहब अंबेडकर ने हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था के तहत दलितों और दबे-कुचलों के साथ भेदभाव की परिपाटी को देखकर तत्कालीन शंकराचार्यों और संतों से मजहबी व्यवस्था की इन कमियों को दूर करने का आग्रह किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसी कारण अंबेडकर ने अपने निधन से कुछ समय पहले नागपुर में अपने अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था. उनकी बात बिल्कुल सही है, लेकिन मुझे हैरानी इस बात कि है कि मायावती शंकराचार्यों से जातिप्रथा ख़त्म करने की बात क्यों नहीं कहती हैं? हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी बुराई जातिप्रथा यदि ख़त्म हो जाए तो सारे जातिगत भेदभाव भी ख़त्म हो जाएं.

जातिप्रथा ख़त्म हो जाए तो दलितों के साथ साथ हिन्दू धर्म का भी बहुत कल्याण हो. लेकिन यथार्थ की धरातल पर देखें और जांचे-परखें तो यही जबाब मिलेगा कि जातीय व्यवस्था के तवे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वाले नेता भला कब चाहेंगे कि जातिप्रथा ख़त्म हो. रही बात शंकराचार्यों की तो सब शंकराचार्य सवर्ण जाति के हैं. वो जातिप्रथा ख़त्म कर अपना ऐशोआराम और रूतबा भला क्यों कम करना चाहेंगे? उन्हें मानने और सम्मान देने वाले अधिकांशत: लोग ऊँची जाति के ही मिलेंगे. जमीनी सच्चाई यही है कि जातीय व्यवस्था का लाभ लेने वाले दलित भी जातिप्रथा नहीं छोड़ना चाहेंगे. वो बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी दलित ही कहलाना पसंद करेंगे. सारे दलित बौद्ध धर्म अपना लेंगे, ऐसा भी संभव नहीं है. कई राजनीतिक पंडित ये मान रहे हैं कि बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने की बात कहकर मायावती एक तरह से बीजेपी को ब्लैकमेल करना चाहती हैं और उससे कोई गुप्त समझौता कर कुछ विशेष लाभ लेने की फिराक में हैं. आज के दौर में जो सत्तालोलुप राजनीति चल रही है, उसमे यह भी संभव है. अंत में मैं हिन्दुओं से यही कहूंगा कि वो जागरूक हो, संगठित हों और जातीय भेदभाव भुला कर आपस में एक दूसरे का सहयोग और सम्मान करें.

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