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मीडिया जगत और ब्लॉगर्स: जागरण जंक्शन मंच की समस्याएं, कमियां और सुझाव

Posted On: 5 Feb, 2017 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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पॉवरफुल मीडिया जगत को ब्लॉगर्स और पाठकों के हितों के लिए चिन्तन करने पर मजबूर करना ही इस ब्लॉग को लिखने का मूल उद्देश्य है. भारत में इस समय मीडिया जगत की धूम मची हुई है. कागजों पर प्रकाशित होने वाली प्रिंट मीडिया बहुत पहले से ही इस देश में प्रभावी रही है. किन्तु अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चाहे वो टीवी चैनलों के रूप में हो या फिर इन्टरनेट से संचालित वेबसाइटों के रूप में हो, बीते एक दशक में अपना एक विशेष स्थान बना ली है. यही वजह है कि जो अखबार पहले प्रिंट मीडिया के रूप में थे, वो धीरे धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में भी अपने को स्थापित कर लिए हैं. देश में इन्टरनेट की सुविधा बढ़ने और उसकी कीमत कम होते जाने के कारण बीते दस सालों सालों में सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक और ट्विटर आदि पर लोंगों का रुझान करोड़ों की तादात में इतना जबरदस्त बढ़ा है कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने को सोशल मीडिया से गहराई से जोड़ ली हैं.

सोचने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया पर बीते दस सालों में करोड़ों की तादात में जो लोग जुड़े हैं, उसकी मुख्य वजह क्या है? इस सवाल के जबाब में हम कह सकते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी ही सोशल मीडिया के फलने फूलने की मुख्य वजह है. प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अभिव्यक्ति के बाबत अपने को जबाबदेह और जिम्मेदार मानती है. यही वजह है कि वो अपने यहाँ तनख्वाह व पारिश्रमिक देकर प्रशिक्षित पत्रकारों और लेखकों की टीम रखती है. ये पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोग पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में विशेषज्ञ, जबाबदेह, जिम्मेदार और बेहद अनुभवी माने जाते हैं. जिस भी मीडिया जगत से ये लोग जुड़ते हैं, वो इनपर पूरा भरोसा करती है. मीडिया जगत पर यदि जनता के भरोसे की बात करें तो जनता उस समय तक मीडिया पर पूरा विश्वास और भरोसा करती थी, जबतक कि वो पैसे कमाने से ज्यादा सच बोलने के लिए और समाज व राष्ट्र की सेवा के लिए प्रयत्नशील तथा चर्चित रहा करती थी.

आज भी कुछ मीडिया समूह उसी राह पर चल रहे हैं, लेकिन ये भी ये भी एक कड़वी सच्चाई है कि आज के दौर में बहुत से मीडिया घराने सत्ता के सिपाही और बहुत से पत्रकार राजनीतिक दलों, केंद्र व राज्य सरकारों, मंत्रियों, अधिकारियों, दबंगों और अमीरों के दलाल बन चुके हैं. पत्रकारिता अब समाज के लिये कम और अपने सुख, सम्मान और घराने के लिए ज्यादा समर्पित हो चली है. यही वजह है कि आम आदमी का विश्वास और भरोसा मीडिया जगत पर कम हो गया है और सोशल मीडिया तथा ब्लॉग मंचों पर उसकी अभिव्यक्ति दिनोंदिन बढ़ती चली जा रही है. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही ऐसा हो रहा है, सच तो यह है कि पूरी दुनिया का इस समय यही हाल है. आम आदमी की दबती आवाज सोशल मीडिया और ब्लॉग लेखन के माध्यम से मुखर हो रही है, जहाँ पर वो न सिर्फ लेखक और पत्रकार है, बल्कि संपादक भी है. किसी कवि ने सच्चे पत्रकार की परिभाषा देते हुए कहा है, ‘‘नाखुद रोता है ना ही किसी को रोने देता है. एक सच्चा पत्रकार एक बहुत अच्छी सरकार की तरह होता है.’’

पत्रकारिता का असली मकसद अपनी लेखनी से भ्रष्ट और गैरजिम्मेदार शासन की आलोचना करते हुए गरीब और आम आदमी के हक़ की लड़ाई लड़ना है तथा धार्मिक कट्टरपंथियो के विस्तार, हिंसक विचारों और उनके अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ना है. पत्रकारिता की इन्ही कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए बांग्लादेश में कई ब्लॉगर शहीद हो चुके हैं और पाकिस्तान के सिंध व बलूचिस्तान प्रान्त में अपहरण के शिकार हो शासकों व सैनिकों के द्वारा दी जाने वाली मानसिक व शारीरिक यातना झेल रहे हैं. यूनाइटेड नेशन तथा इंटरनेशनल बार एसोशिएसन से सम्बद्ध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन को इस ओर तुरन्त ध्यान देना चाहिए. मेरे विचार से ब्लॉगरों और पाठकों को भी सोशल मीडिया व ब्लॉग्गिंग मंचों पर इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करने के जोश में बिना किसी ठोस सबूत, जबाबदेही और जिम्मेदारी के कुछ भी न लिखें ओर कोई भी गलत अफवाह न फैलाएं.

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया ओर ब्लॉग्गिंग मंचों पर कुछ लोग ऐसा कर रहे हैं और कानूनी प्रपंच में फंस भी रहे हैं. यही वजह है कि सोशल मीडिया और ब्लॉग मंचों को क़ानूनी रूप से नियंत्रित करने की बात कही जा रही है, जो कुछ हद तक ठीक भी है, लेकिन इसकी आड़ लेकर बुद्धिजीवियों, ब्लॉगरों और पाठकों के होंठ एकदम सील दो, यह भी न्यायसंगत नहीं है. अब कुछ चर्चा उन ब्लॉग मंचों की करना चाहूँगा जो निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करने के अच्छे उद्देश्य से बड़े मीडिया घरोनों द्वारा चलाए जा रहे हैं और उनके ब्लॉग्गिंग मंचों की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है. बहुत बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, ब्लॉगर ओर पाठक इन मंचों से जुड़े हुए हैं. हालाँकि पिछले कुछ सालों में बहुत से अच्छे लेखक निराश होकर इन मंचों को छोड़ भी चुके हैं, किन्तु मंच छोड़ने वालों से ज्यादा संख्या मंच से जुड़ने वाले नए ब्लॉगरों की है. इन मंचों की संचालन सम्बन्धी अपनी कुछ समस्याएं हैं, जिनकी चर्चा मुझे इस ब्लॉग में करनी चाहिए.

देश के प्रतिष्ठित हिंदी अखबार ‘दैनिक जागरण’ के ‘जागरण जंक्शन मंच’ की चर्चा करें तो यह निश्चित रूप से नए व पुराने लेखकों और पाठकों के लिए एक बहुत बेहतर लेखकीय प्लैटफॉर्म है. मंच पर पाठकों को आकर्षित करने के लिए व्यावसायिक दृष्टिकोण से काफी नए सुधार किये गए हैं. हालाँकि मंच का पुराना स्वरुप ब्लॉगरों को बहुत प्रिय था. इस मंच की सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ पर ब्लॉगर को लेखन के साथ साथ सम्पादन करने की भी पूरी छूट मिली हुई है. मंच की सबसे खराब बात का जिक्र करें तो ‘रीडर ब्लॉग’ के किसी भी लेख को पढ़ने के लिए खोलें तो लेख पढ़ना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि आधी से भी ज्यादा यानी आठ इंच में से चार इंच स्क्रीन नीली पट्टी से ढंकी हुई मिलेगी, जिसपर लेखक के छह पुराने ब्लॉग के लिंक दिए गए हैं. इसे तुरन्त हटा देना चाहिए. दूसरी खराब बात चुने हुए अच्छे लेखों का सम्पादित अंश ‘दैनिक जागरण’ अखबार में छापना बंद कर देना है. इसे पुनः शुरू करना चाहिए. पुराने ब्लॉगरों के ब्लॉगों तक न पहुँच पाना और दैनिक अपडेट की कमी अन्य परेशानियां हैं, जिस ओर मंच को ध्यान देना चाहिए.

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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