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हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज- भाग २- जागरण मंच

Posted On: 16 Oct, 2015 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज- भाग २

जिन्दगी में जब अपनों से दुःख मिलतें हैं तो इन्सान सोचता है कि अब कहाँ जाये? अपनों से ठुकराए जाने पर नश्वर संसार की सच्चाई सामने आ जाती है. तब ऐसा लगता है की कसमे वादे प्यार वफ़ा सब सिर्फ मुह से बोली जाने वाली बातें हैं, संसार में कोई किसी का नहीं है, सब झूठे नातें हैं. तब इंसान आध्यात्म यानि अपनी आत्मा के आधिपत्य को समझने और इस नश्वर जगत में शाश्वत सत्य की खोज करने की ओर उन्मुख होता है. संत लोग दुनिया को “फानी” यानि नश्वर कहतें हैं. इसी भाव को दर्शाता हुआ गीतकार शैलेन्द्र का लिखा फिल्म “गाईड” का ये गीत है-
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वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जायेगा कहाँ
दम लेले घड़ी भर, ये छैयां, पायेगा कहाँ
कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसीके न आयी
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहाँ …

जीवन में कभी-कभी अकेले भी चलना पड़ता है. जीवन में बहुत से ऐसे अवसर आतें हैं जब कोई साथ नहीं देता है और व्यक्ति को अकेले ही आगे बढ़ना पड़ता है. ये लगाव और मोह-माया है जो किसी से बिछुड़ने पर हमें कष्ट देती है. हम लोग इस सच्चाई को मन से स्वीकार नहीं कर पते हैं कि भगवान के धाम से हम अकेले ही आये हैं और एक दिन अकेले ही जाना है. गीतकार प्रदीप का लिखा हुआ फिल्म “सम्बन्ध” का ये गीत अकेले चलते रहने का सन्देश देता है.
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चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला
हज़ारो मील लंबे रास्ते, तुझ को बुलाते
यहा दुखड़े सहने के वास्ते तुझ को बुलाते
हैं कौन सा वो इंसान यहा पर जिसने दुख ना झेला
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला..
तेरा कोई साथ ना दे तो, तू खुद से प्रीत जोड़ ले
बिछौना धरती को कर के, अरे आकाश ओढ़ ले
यहा पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहा हैं खेला
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला..

आज का नौजवान हर क्षेत्र में कठिन प्रतिस्पर्धा, चारो और फैले भ्रस्टाचार, बेरोजगारी और घरेलू समस्याओं से परेशान है. हमारे जीवन की मज़बूरी है कि हमें सबकुछ झेलते हुए भी आगे बढ़ना है. बहुत से लोग हमारे शरीर के मित्र बन जाते हैं, परन्तु अपने दुखी मन का मित्र हमें खुद ही को बनाना होगा और यदि जीवन में अकेलापन है तो अपने मन को जीवन-पथ पर चलने हेतु बार-बार प्रेरित करना होगा. जीवन में बार-बार अपने जीने का रास्ता बदलना असफलता का मुख्य कारण बन जाता है. हम जो भी रास्ता चुने उस पर चलते रहें तो एक न एक दिन सफलता जरुर मिलेगी. एमजी हशमत का लिखा हुआ फिल्म “तपस्या” का ये गीत हमें यही प्रेरणा देता है-
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जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे
हो कितनी भी लम्बी रात, दीया बन जलते जाना रे ..
उसी राह पे राही चलते जाना रे …
कभी पेड़ का साया पेड़ के काम ना आया
सेवा में सभी की उसने जनम बिताया
कोई कितने भी फल तोड़े,हाय फलते जाना रे
उसी राह पे राही चलते जान रे …
जीवन के सफर में ऐसे भी मोड़ हैं आते
जहां चल देते हैं अपने भी तोड़ के नाते
कहीं धीरज छूट ना जाये, तू देख संभलते जान रे
उसी राह पे राही चलते जान रे …
तेरे प्यार की माला कहीं जो टूट भी जाये
तेरे जन्मों का साथी कभी जो छूट भी जाये
दे देकर झूठी आस तू खुद को छलते जान रे
उसी राह पे राही चलते जान रे …
तेरी अपनी कहानी ये दर्पण बोल रहा हैं
भीगी आंख का पानी, हकीकत खोल रहा हैं
जिस रंग में ढाले वक्त, मुसाफिर ढलते जान रे
उसी राह पे राही चलते जान रे …

संसार में दुःख है और दुःख का कारण भी कई हैं जैसे हमारे कर्म, हमारी असफलताएँ, हमारी अतृप्त इच्छाएँ, हमारे सोच-विचार और हमारे परिवार व् समाज के लोग. सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य एक ऐसा साथी खोजता है जो उसके दुःख में भागीदार बन सके. बड़े नसीब वाले हैं वो लोग जिन्हें ऐसा साथी मिल जाता है. ज्यादातर लोग अकेले ही अपने दुखों से और दुनिया वालों से जुझतें हैं. कैफ़ी आज़मी का लिखा हुआ फिल्म “अनुपमा” का ये गीत मुझे बहुत पसंद है-
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या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझ को अभी चूप रहने दो
मैं गम को खुशी कैसे कह दू
जो कहते हैं उनको कहने दो
क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नही
बहते हुये आँसू और बहे
अब ऐसी तसल्ली रहने दो
या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझ को अभी चूप रहने दो..

जीवन में व्यक्ति हमेशा कुछ न कुछ सीखता है. पुरानी गलतिया हमें शिक्षा देतीं हैं कि हम उन्हें फिर से न दोहराएँ. जीवन में अक्सर हमें अपने ही धोखा दे जाते हैं और हमें दुःख सहने को अकेला छोड़ जातें हैं. आदमी को सुख से ज्यादा दुःख से शिक्षा मिलती है. ईश्वर से प्रेम हो जाये तो अकेलापन हमारे लिए एक वरदान साबित हो सकता है. अकेलापन हमें नशे और बर्बादी की बजाय ईश्वर की तरफ ले जाये तो इससे बढ़कर सौभाग्य और क्या हो सकता है. शकिल बदायुनी का लिखा फिल्म “आदमी” का ये गीत है-
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आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज़ ना दे
दर्द में डूबे गीत ना दे, गम का सिसकता साज़ ना दे
जीवन बदला, दुनियाँ बदली, मन को अनोखा ज्ञान मिला
आज मुझे अपने ही दिल में, एक नया इंसान मिला
पहुँचा हूँ वहाँ, नहीं दूर जहाँ
भगवान भी मेरी निगाहों से
आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज़ ना दे..

जिन्दगी बहुत तेज रफ़्तार से भाग रही है. हमें उसके साथ कदम से कदम मिलकर चलना ही होगा. संतजन कहते हैं कि हमें अपने मन को एक ऐसी आनंददायक स्थिति में पहुंचा देना चाहिए कि जीवन में हमें ख़ुशी मिले या गम, हमारे ऊपर कोई असर न हो. साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ फिल्म “हम दोनों” के इस गीत में जीवन जीने का एक निराला दार्शनिक अंदाज है-
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मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुंएँ में उडाता चला गया
बरबादीयों का सोग़ मनाना फिजूल था
बरबादीयों का जश्न मनाता चला गया
मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया..
जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया..
गम और खुशी में फर्क ना महसूस हो जहा
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया
मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया..

ढाई अक्षर का शब्द प्रेम दुनिया में हमेशा ही कौतुहल और खोज का विषय रहा. प्रेम संसार में किसी व्यक्ति से हो गया तो बहुत नसीबवालों को ही सुख मिलता है. ज्यादातर लोगों को प्रेम में दुःख और धोखा ही मिलता है. सांसारिक प्रेम में मिला दुख यदि मनुष्य को आध्यात्मिक प्रेम की तरफ ले जाये तो ये मनुष्य का अहोभाग्य होगा. किसी के प्रेम में पड़कर कभी-कभी आदमी इतना पागल हो जाता है कि अपना परिवार और यहाँ तक की सारी दुनिया छोड़ने को तैयार हो जाता है. ऐसा करना उचित है या अनुचित, इसके जबाब में इन्दीवर का लिखा हुआ फिल्म “सरस्वती चंद्र” का ये गीत विचारणीय है-
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कहा चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के
किसी एक दिल के कारण, यूँ सारी दुनियाँ त्याग के
छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिये
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिये
प्यार से भी जरुरी कई काम हैं
प्यार सबकुछ नहीं जिन्दगी के लिये
तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या
मन से मन का मिलन कोई कम तो नही
खुशबू आती रहे दूर ही से सही
सामने हो चमन कोई कम तो नही
चाँद मिलता नहीं, सब को संसार में
हैं दिया ही बहोत रोशनी के लिये
छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिये
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिये..
कितनी हसरत से तकती हैं कलियाँ तुम्हे
क्यों बहारों को फिर से बुलाते नहीं
एक दुनियाँ उजड़ ही गयी हैं तो क्या
दूसरा तुम जहां क्यों बसाते नहीं
दिल ना चाहे भी तो साथ संसार के
चलना पड़ता हैं, सब की खुशी के लिये
छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिये
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिये..

एक महीने से मै कोशिश कर रहा था कि ये दार्शनिक अंदाज वाले गीत आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करूँ. पिछले वर्ष भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पूरे हुए हैं. ईस्वर से प्रार्थना है कि भारतीय सिनेमा उद्योग खूब फले-फूले. अपनी पसंद के इन सब गीतों को याद करके और आप सबके समक्ष प्रस्तुत करके जिन्होंने इन गीतों को लिखा, जिहोने इन गीतों को गाया, जिन्होंने रुपहले पर्दे पर इन सदाबहार गीतों के फिल्मांकन के लिए अभिनय किया और जिन्होंने अपनी फिल्मो में इन्हें फिल्माया, मै इस पोस्ट के माध्यम से उन सब महान कलाकारों और जानी-मानी हस्तियों को नमन करते हुए अपना हार्दिक अहोभाव व्यक्त कर रहा हूँ.

(सादर निवेदन- “हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज” ये आलेख चार भागों में है. ये दूसरा भाग आपके समक्ष प्रस्तुत किया गया है. ये दूसरा भाग आपको कैसा लगा, इसपर अपनी सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया जरूर दें, ताकि अगले भाग को और बेहतर बनाने में मदद मिले. सादर आभार सहित)

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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