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हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज- भाग ४- जागरण मंच

Posted On: 24 Oct, 2015 Others में

सद्गुरुजीआदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

sadguruji

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हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज- भाग ४- जागरण मंच

हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज भाग-चौथा प्रस्तुत है. इस भाग में दार्शनिक अंदाज में दुनिया की नश्वरता बताने वाले और ईश्वर की खोज के लिए प्रेरित करने वाले कुछ लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों को शामिल किया गया है. इन गीतों को फ़िलहाल पढ़कर और गहराई से चिंतन-मननकर आनंद लें, बाद में जरूर सुनने की कोशिश करें.

मेहनत और ईमानदारी से कमाकर अपने परिवार के साथ बैठकर दो जून की रोटी हम खाएं और हंसी-ख़ुशी सुख-शांति के साथ जीवन बिताएं, जीवन का सार तो यही है, परन्तु आज समाज में चारो तरफ सही गलत ढंग से रूपया कमाने की होड़ लगी हुई है. हमारे देश के नेता रूपया बटोरने के लिए बड़ा से बड़ा भ्रस्टाचार और घोटाला कर रहें हैं. बड़े और विकसित देशों में आज पूरी दुनिया को अपनी मुट्टी में करने की होड़ लगी हुई है. इस दुनिया की सच्चाई क्या है और अगर ये दुनिया किसी को मिल भी जाये तो भी इसे यहीं छोड़ कर एक दिन यहाँ से जाना है. साहिर लुधियानवी का लिखा फिल्म “प्यासा” का ये गीत है-
Pyaasa (1957) - Ye duniya agar mil bhi jaaye to kya hain
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनियाँ
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनियाँ
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनियाँ
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनियाँ हैं या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
जहाँ एक खिलौना हैं, इंसान की हस्ती
ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से मौत सस्ती
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं..

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जवानी भटकती हैं बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता हैं व्योपार बनकर
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
ये दुनियाँ जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं हैं
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं
जला दो इसे, फूँक डालो ये दुनियाँ
मेरे सामने से हटा लो ये दुनियाँ
तुम्हारी हैं तुम ही संभालो ये दुनियाँ
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं..

हम रहें या न रहें ये दुनिया यूँ ही चलती रहेगी. समय-समय पर दुनिया में बड़ी से बड़ी उथल-पुथल भी होती रहेगी. संसार में जीवन का मेला नहीं ख़त्म होगा, बस इस भीड़ में हम नहीं रहेंगे. फिल्म “मेला” का ये गीत सबको यही सन्देश देता है-
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ये ज़िन्दगी के मेले
दुनिया में कम न होंगे
अफसोस हम न होंगे
इक दिन पड़ेगा जाना,क्या वक़्त,क्या ज़माना
कोई न साथ देगा सब कुछ यहीं रहेगा
जाएंगे हम अकेले
ये ज़िन्दगी के मेले …………
दुनिया है मौज-ए-दरिया, क़तरे की ज़िन्दगी क्या
पानी में मिल के पानी,अंजाम ये के फानी
दम भर को साँस ले ले
ये ज़िन्दगी के मेले …………
होंगी यही बहारें, उल्फत की यादगारें
बिगड़ेगी और बनेगी, दुनिया यही रहेगी
होंगे यही झमेले
ये ज़िन्दगी के मेले …………

संसार से एक दिन जाना है, इसीलिए जाने से पहले हम अपने परिवार और समाज के लिए कुछ अच्छा कर जाएँ. हमारे जीवन के पीछे परमात्मा रूपी जो अदृश्य शक्ति है, उससे भी भजन साधना करके जीते जी नाता जोड़ना जरुरी है. मजरुह सुल्तानपुरी का लिखा हुआ फिल्म “धरम करम” का ये गीत है-
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इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल
जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल
परदे के पीछे बैठी साँवल गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी
ये डोरी ना छूटे, ये बंधन ना टूटे
भोर होने वाली हैं अब रैना हैं थोड़ी
सर को झुकाये तू, बैठा क्या हैं यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनियाँ से डोल
इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल..

हिंदी फ़िल्मी गीत सांप्रदायिक सद्भाव पर जोर देते हैं. वो जनमानस को समझाने की कोशिश करते है कि ईश्वर एक है, चाहे उसे राम कहो या ख़ुदा कहो, चाहे उसे मंदिर में जाकर खोजो या फिर मस्जिद में जाकर खोजो. साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ फिल्म “धर्मपुत्र” का ये गीत है-
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काबे में रहो या काशी में रहो ..
निस्बत तो उसी की ज़ात से है ..
तुम राम कहो के रहीम कहो,
मतलब तो उसी की बात से है ..
ये मस्जिद है वो है बुतखाना ..
चाहे ये मानो या वो मानो ..
मंदिर से मुरादें मिलती है,
मस्जिद से मुरादें मिलती है ..
काबे से मुरादें मिलती है,
काशी से मुरादें मिलती है ..
हर दर से मुरादें मिलती है ..
हर घर है उसी का काशाना,
मकसद तो है बस दिल को समझाना
चाहे ये मानो या वो मानो..

संत और दार्शनिक कहते हैं कि संसार में जब कोई व्यक्ति पैदा होता है तब वह न हिन्दू होता है और न ही मुसलमान. उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया जाता है. अपने धर्म के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए और जगत में उसका विस्तार करने के लिए लड़ना और दूसरे धर्म से नफरत करना सिखाया जाता है. दो सांसारिक धर्मों की लड़ाई में ईश्वर निर्मित नैसर्गिक ‘मानव धर्म’ दिल के भीतर सुप्त व् लुप्त हो जाता है. आज जरुरत है उसे जगाने की और मानव धर्म अपनाने की, ताकि संसार में धर्म को लेकर हो रहे दंगे-फसाद और खून-खराबे बंद हों. इसी भाव को दर्शाता हुआ साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ फिल्म “धूल का फूल” का ये गीत है-
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तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बांध वो तूफ़ान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा
तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा..

इन्सान जब जागे तभी सबेरा है. सत्य क्या है, ईश्वर क्या है, इसकी खोज जरुर करनी चाहिए. संसार में बार-बार आने और हमारे दुःख व् अतृप्ति का कारण इन सवालों के जबाब नहीं ढूँढना है. पं. नरेन्द्र शर्मा का लिखा हुआ फिल्म “सत्यम शिवम सुंदरम” का ये गीत है-
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ईश्वर सत्य हैं, सत्य ही शिव हैं, शिव ही सुंदर हैं
जागो उठकर देखो, जीवन ज्योत उजागर हैं
सत्यम शिवम सुंदरम, सत्यम शिवम सुंदरम
राम अवध में, काशी में शिव, कान्हा वृन्दावन में
दया करो प्रभू, देखू इन को हर घर के आंगन में
राधा मोहन शरणम, सत्यम शिवम सुंदरम
एक सूर्य हैं, एक गगन हैं, एक ही धरती माता
दया करो प्रभू, एक बने सब सब का एक से नाता
राधा मोहन शरणम, सत्यम शिवम सुंदरम

(सादर निवेदन- “हिंदी फ़िल्मी गीतों का दार्शनिक अंदाज” ये आलेख चार भागों में है. ये चौथा भाग आपके समक्ष प्रस्तुत किया गया है. ये चौथा भाग आपको कैसा लगा, इसपर अपनी सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया जरूर दें. सादर आभार सहित)

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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