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कुछ रंग ग़ज़ल के .....(कॉन्टेस्ट)

Posted On: 15 Jan, 2014 Others में

Meri udaan mera aasmanहार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

Sonam Saini

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१. एहतिमाल से उन्होंने ऐतबार जला दिया
खुदी के लिए खुद का ही प्यार जला दिया


दो पलो की रंजिश हो गई यूँ कारआमद
एक पल में उन्होंने मेरा संसार जला दिया


जिस रोज पूछ बैठे हम उनसे वफ़ा का मतलब
उस रोज ही उन्होंने इख़्तियार जला दिया


आजिज थे वो शायद मेरे उरूज से
हर रोज जो उन्होंने अख़बार जला दिया


एहतिमाल- शक
कारआमद- असरदार
इख़्तियार- अधिकार
आजिज – परेशान, उबा हुआ
उरूज – उन्नति, प्रशिद्धि


२. तीर-ए-लफ्ज निकले तो दिल के पार निकले
छेद कर दिल और नफ्स बार बार निकले


अफसुर्दा होना मेरा तेरा ही अत्फ़ था
तेरे ही तसव्वुर से आब-ए-चश्म यार निकले


अस्बाब -ए-अह्जान हम हो गये तुम्हारे
यही वजह थी जो तुम हमसे बे जार निकले


खूब खोया है सुकून तेरे शहर में ठहर कर
तलाश-ए-सुकून में आज फिर हम अपने दार निकले


नफ्स = आत्मा
अफसुर्दा = उदास
अत्फ़ = दया, कृपा
अस्बाब-ए-अह्जान= दुःख का कारण
दार= घर , देश



३. इल्जाम- तरासिया की वो हद पार कर गये
खंजर-ए-अहबाब से वो हम पर वार कर गये


बेजा-हिमायत भी वो करते तो क्या करते
कुबुल-ए-इश्क से भी जो इंकार कर गये


ता-जिदगी जिनके लिए अश्क बहाते रहे हम
वो मुस्कुराता देख हमे दरकिनार कर गये


है इल्तिजा इतनी कि तीमारदारी न वो करें
बनकर चारासाज जो हमे बीमार कर गये


है बावफा वो अगर तो बेवफा हम भी नहीं
इस हकीक़त-ए-वफ़ा का वो भी इकरार कर गये


मलाल करें भी तो क्या सिला-ए-मौहब्बत का
अपने ही थे वो जो जीना दुश्वार कर गये


इल्जाम- तरासिया- इल्जाम लगाना
अहबाब – दोस्ती
बेजा-हिमायत- साथ देना
तीमारदारी- देखभाल
चारासाज – डॉक्टर, चिकित्सक

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