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फिर मिलेंगे ........

Posted On: 25 Nov, 2013 Others में

Meri udaan mera aasmanहार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

Sonam Saini

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काश! कोई तो पूछता हमसे तुम्हारा हाल क्या है
जो तुमको परेशान रखता है वो सवाल क्या है …..


सोच रही हूँ कि कुछ लिखूं लेकिन ये समझ ही नही आया कि आखिर क्या लिखूं ! जब लिखने बैठती हूँ तो सब भूल जाती हूँ लेकिन जब किसी और काम में व्यस्त होती हूँ तो मन में न जाने कितने हजारो लाखो सवाल, विचार घूमते रहते हैं ! असल में ऐसा लगने लगा है अब तो जैसे मैं पागल हो रही हूँ ! जो हरकते करती हूँ वो पागलो से कम तो होती ही नही हैं न और ऐसा मुझे किसी बीमारी की वजह से नही लग रहा बल्कि इस लिखने वाली बीमारी की वजह से लग रहा है ! सच में बड़ी अजीब बीमारी है कविताये, शायरी, लेख वगैरह लिखने की भी ! एक बार जिसे लग जाये पागल करके ही छोडती है !


एक दिन मैं फॅमिली के साथ सर्कस देखने गयी ! वहां सभी सर्कस देखने में बिजी थे और मैं सर्कस दिखाने वालो की लाइफ का विश्लेषण करने व उनके चेहरे के भावों को पढने में बिजी थी ! आप विश्वास नही करेंगे कि वहां बैठे-बैठे मैंने एक पूरा आर्टिकल अपने मन में डिजाईन कर लिया था कि मुझे कैसे कैसे और किस-किस की लाइफ के बारे में क्या क्या लिखना है !


मेरे मन में उठने वाले उन विचारो के लिए मेरा एक लेखिका होना पूरी तरह से जिम्मेदार नही है क्योंकि सर्कस में काम करने वाले उन कलाकारों के चेहरे पर वास्तव में बहुत ही गंभीर भाव थे जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकते थे कि इन्सान वास्तव में जैसा होता है वैसा दिखता नही है ! किसके दिल  में कितना दर्द है ये सिर्फ वही जान सकता है जो उस दर्द से गुजर रहा होता है वरना चेहरे की मुस्कराहट में आँखों की नमी आजकल किसी को कहाँ दिखाई देती है ! “जो दिखता है वही बिकता है”, सर्कस में लोगो को हंसाने वाले जोकर के मन में भी पीड़ा हो सकती है कौन सोच सकता है और आखिर सोचना भी कौन चाहता है और सोचे भी क्यों ! आज लोगो के पास अपनी इतनी परेशानियाँ होती हैं कि दुसरो के बारे में सोचने का तो वक़्त ही नही मिलता !


आजकल तो एक ही घर में रहने वाले लोगो के बीच भी सिर्फ काम पड़ने पर ही बातचीत होती है ! बहुत ही कम घर होते होंगे जहाँ पर सभी एक साथ मिलजुल कर रहते हो और एक दुसरे की परेशानियों को साझा करते हो और ऐसे घर ही खुशकिस्मत होते हैं ! लेकिन सबकी किस्मत इतनी अच्छी कहाँ होती है कि उन्हें अपने परिवार के साथ रहने का मौका मिले, हमेशा ही !


अभी कई दिन पहले दैनिक जागरण में दिवाली के लेख में एक लाईन पढ़ी “सिर्फ जंगलो में जाकर रहने को ही वनवास नही कहते, आजकल तो हर व्यक्ति वनवास काट रहा है” ये बात मुझे तो बिलकुल सही लगी आप लोगो को पता नही सही लगे या नही ! आज के इस दौर में अधिकतर लोगो को किसी न किसी कारण से अपने घर से, अपनों से दूर रहना ही पड़ता है , फिर चाहे वो कारण पढाई हो या करियर और इस तरह से हर कोई किसी न किसी कारण से वनवास ही झेल रहा होता है !


यूँ तो यह वनवास अच्छे के लिए होता है लेकिन कई बार ये वनवास बहुत महंगा भी पड जाता है ! अपनों से दूर रहते रहते कई बार इंसान इतना अकेला जो जाता है कि वो समझ ही नही पाता कि वो आखिर किससे अपने मन की बाते शेयर करे ! अकेले होने की यह भावना कई बार इतनी प्रबल हो जाती है कि अपने भी अपने से नज़र नही आते ! ऐसे में अगर कोई दुःख दर्द को समझने लगे और करीब आ जाये तो फिर उस शख्स की आदत हो जाती है और आदत ही नही बल्कि जरूरत ! यूँ तो इस दुनिया में हर कोई हर किसी के बिना जी लेता है लेकिन सिर्फ सांसे लेने को और रोजमर्रा के काम-काज कर लेने को तो जीना नही कहते ! हर पल रो कर गुजारने, किसी को याद कर के हर रोज पल पल मरने को तो जीना नही कहते ! जीने के लिए सिर्फ सांसो का चलना ही जरूरी नही होता बल्कि इंसान का खुश होना भी जरूरी होता है ! अगर कोई आदत बनते-बनते जरूरत बन जाये और एक दिन अचानक छोडकर चला जाये तब दिल में दर्द का वो तूफान उठता है कि या तो जान ही चली जाती है या फिर हर पल मर मर के गुजरता है !


तन्हाई, अकेलापन ये जीवन का वो समय होता है जिसमे एक इन्सान खुद को समझ कर जीवन में आगे भी बढ़ सकता है और खुद को अनदेखा कर के मौत के दर तक भी जा सकता है ! बस निर्भर इंसान पर करता है कि वह किस तरह जीना चाहता है !


वैसे अगर देखा जाये तो किसी भी इन्सान की निराशा की भावना के पीछे सबसे बड़ा कारण जो है वो है इन्सान का सवेदनशील होना ! इन्सान दो प्रकार से सवेंदनशील हो सकता है ! एक अल्प सवेंदनशील और दूसरा अति सवेंदनशील ! अल्प सवेंदनशील होना समाज के लिए नुकसानदायक हो सकता है और अति सवेंदनशील होना इन्सान के स्वयं के लिए ! अगर मैं अपनी बात करूं तो मैं एक अति सवेंदनशील व्यक्ति हूँ और इसका खामियाजा मुझे अक्सर भुगतना ही पड़ता है ! कोई भी इन्सान सिर्फ तभी खुश रह सकता है जब वो सिर्फ सवेंदनशील हो न कि अल्प सवेंदनशील या अति सवेंदनशील !


बस आज के लिए इतना ही काफी है ! मेरा तो काम ही है लिखना, अगर चाहू तो एक पूरी किताब लिख सकती हूँ इन सब बातो के बारे में लेकिन अभी फ़िलहाल ऐसा मैं चाहूंगी नही ! इसीलिए अब विदा चाहते हैं इसी उम्मीद के साथ कि फिर मिलेंगे !

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