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क्या इसने भी आपको परेशान कर रखा है देखिए तो जरा......

Posted On: 18 Aug, 2012 Others में

Jagran SakhiWomen Liberation & Empowerment Blog

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lady and netसुबह बिस्तर छोडने से लेकर देर रात बिस्तर पर जाने तक हमारी जिंदगी़ का एक पल भी आज ऐसा नहीं है जब तकनीक की दखल न हो। किचन हो या दफ्तर, रास्ता हो या खेल का मैदान, बाजार हो या अस्पताल, यहां तक कि पृथ्वी हो या भूगर्भ या समुद्र या फिर अंतरिक्ष.. ऐसी कोई जगह ही नहीं बची जहां तकनीक की दखल न हो। अगर कहा जाए कि आज तकनीक ही सर्वव्याप्त व सर्वशक्तिसंपन्न है तो गलत नहीं होगा। यह बात कम से कम शहरी जीवनशैली पर तो सही ही ठहरती है। इधर सर्वज्ञता का आलम तो इंटरनेट ने ऐसा बना दिया है कि किताबें सहेजने की आदत तो बडे लोग भी छोडने लगे हैं और अगली पीढी को तो शायद बताना पडे कि हमारे जमाने में नोटबुक जैसी कोई चीज होती थी।


जैसे-जैसे आदमी की जिंदगी़ में आपाधापी बढती जा रही है, वह अपनी तमाम जिम्मेदारियां तकनीक के हवाले करता जा रहा है। ऐसे दौर में जबकि खुद अपने लिए समय निकालना मुश्किल होता जा रहा है, तकनीक ने जिंदगी़ की तमाम दुश्वारियों को आसान कर दिया है। सिर्फ व्यस्तता ही नहीं, वह आपके लिए आपका अकेलापन बांटने से लेकर जरूरत के वक्त साथ देने, बहुत सारी बातें याद रखने व याद दिलाने और यहां तक कि आपके भरोसे तक का विकल्प अब प्रस्तुत करती है।


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यदि न होता विकास

ग्लोबलाइजेशन की हवा के साथ आम भारतीय शहरी की जीवनशैली में जैसा परिवर्तन आया है और जितनी तेजी के साथ हमने जिंदगी़ से तालमेल बिठाया है, वह हैरतअंगेज है। बीस साल पहले तक जिन कई चीजों के नाम तक हमें मालूम नहीं थे, आज वे सभी हमारी जिंदगी़ का अनिवार्य हिस्सा हैं। एक दशक पहले तक जिन चीजों तक सिर्फ उच्च वर्ग की पहुंच समझी जाती थी, आज वे आम भारतीय के लिए उसके दैनिक उपयोग की चीजें बन चुकी हैं। एक दशक पहले जिन सुविधाओं के कस्बों तक पहुंचने की कल्पना नहीं की जा सकती थी, आज वे सुदूर ग्रामीण अंचलों की जीवनशैली में शुमार हो चुकी हैं। दो दशक पहले तक जिन चीजों का जरूरी इस्तेमाल भी बडे लोगों के लिए बडी बात थी, आज वही चीजें बच्चों का खिलौना बन चुकी हैं। सामाजिक परिवर्तन का जो काम कई आंदोलन नहीं कर सके वह तकनीक संभव कर रही है। वर्ग, लिंग, आयु सारे भेदों की खाइयां अब यह पाट रही है।


जरा कल्पना करिए, अगर तकनीक का इतना विकास न हुआ होता तो वे कामकाजी जोडे जिन्हें बच्चे को स्कूल छोडते हुए खुद भी हर हाल में दस बजे तक दफ्तर निकल लेना होता है और शाम को लौटने पर खाना बनाने से लेकर बच्चे को होमवर्क कराने तक कई घरेलू काम जिनके इंतजार में होते हैं, उनके लिए जिंदगी़ कैसी होती? आज के हाइराइज अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों के लिए लकडी का चूल्हा या कोयले की अंगीठी फूंकते हुए खाना बना पाना संभव होता क्या? एक दिन सब्जियां खरीद कर हफ्ते भर की निश्चिंतता कहां से मिलती, अगर रेफ्रीजरेटर सर्वसुलभ न हुआ होता? तकनीक का यह असर सिर्फ बडे महानगरों तक ही सीमित नहीं है, छोटे कस्बे और दूर-दराज के गांव भी इससे पूरी तरह प्रभावित हुए हैं। अगर तकनीकी विकास नहीं हुआ होता तो शायद आज खेती करना भी बेहद मुश्किल होता।


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अब न रही हसरत

आजादी के बाद भारत का आर्थिक और शैक्षणिक विकास तो हुआ ही है, हमारे जीवन स्तर में भी पहले की तुलना में काफी फर्क आया है। दो दशक पहले तक जो लोग सिंगापुर, मलेशिया या स्विट्जरलैंड जैसे देशों से घूम कर आते थे, वे वहां की जीवनशैली देखकर मंत्रमुग्ध रह जाते थे। वर्षो तक वहां की स्वच्छता और चमक-दमक की बात करते रहते थे। शायद तब हम उसे बडी हसरत भरी निगाह से देखते थे- काश! कभी हमारे देश में भी ऐसा हो पाता.. पर अब यह सब हमारे लिए कोई न पूरी होने वाली हसरत नहीं रही। उनकी चमक-दमक पर अब भारतीय पर्यटक आश्चर्य नहीं करता है। क्योंकि हमारे देश के एक बडे वर्ग के लिए अब यह सब संभव हो गया है, भले एक सीमित दायरे में सही। बेशक विकसित देशों जैसी सफाई या चमक-दमक हमारे यहां सार्वजनिक स्थानों पर अभी भी नहीं दिखाई देती है, लेकिन यह अब हमारी तकनीकी अक्षमता या संसाधनों की कमी के कारण नहीं है। अब इसके लिए जो तत्व िजम्मेदार हैं वह आम जन में जागरूकता की कमी और सरकारी तंत्र में कुप्रबंधन का बोलबाला होने के कारण है। फिर भी जो लोग सुशिक्षित और जागरूक हैं, वे जीवन स्तर के उम्दा होने के प्रभाव एवं महत्व को समझते हैं तथा सीमित साधनों के बावजूद उसे बनाए रखने के प्रयत्न भी करते हैं।


सिर्फ शिक्षा ही नहीं कारण

यह फर्क सिर्फ शिक्षा से आई जागरूकता ही नहीं, काफी हद तक तकनीक की भी देन है। जागरूकता ने हमें इसके लिए प्रेरित किया है तो तकनीक ने इसे हमारे लिए आसान बनाया है। कल्पना करिए कि आज भी हमें घोडे-हाथी या ऊंट की सवारी करनी पडती तो क्या होता? जिंदगी़ की रफ्तार में तो हम बहुत पीछे छूटे ही होते, चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य भी होता। बेशक मोटर वाहनों और अन्य तकनीकी साधनों ने प्रदूषण को बढाया है, पर तकनीक ही समस्या का समाधान ढूंढने में भी जुटी है और काफी हद तक वह उसके निकट पहुंच भी गई है। वाहनों ने वायु प्रदूषण जरूर फैलाया है, लेकिन तकनीक ने चूल्हे से उठने वाले धुएं के प्रदूषण से बचाया भी है। यह सही है कि कई अन्य कारणों से जंगल कट रहे हैं और कोयले के भंडार का दोहन हो रहा है, पर सोचिए अगर इनमें चूल्हे के लिए लकडी या कोयला लगाने की मजबूरी भी जुडी होती तो भारत जैसे बडे आबादी वाले देश में क्या होता?


वैसे ही धुएं भरे माहौल में अगर आज भी खाना पकाना पडता तो क्या आज के छोटे-छोटे फ्लैटों में जो सफाई, सुंदरता और सुरुचि दिखती है, वह संभव होती? यही नहीं, स्त्रियों की सेहत के लिए भी पुराने तौर-तरीके काफी नुकसानदेह थे। नए दौर के मॉडयुलर किचन ने उसे साइटिका से लेकर मोतियाबिंद तक कई खतरनाक रोगों से बचाया है। आज बडे शहरों में बहुत कम जगह में भी जो उम्दा जीवन स्तर बनाए रखना संभव हो रहा है, वह तकनीक के कारण ही है। आज की स्त्री तकनीकी विकास की प्रशंसक है तो उसके ठोस कारण हैं। इन बुनियादी वजहों ने ही तकनीक में उसकी रुचि जगाई है और आज वह तकनीकी जगत में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही है।


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ज्ञान की दुनिया में विज्ञान

स्थान के इस प्रबंधन ने सिर्फ घरों को ही नहीं, कारोबार और ज्ञान की दुनिया को भी बडी राहत दी है। पढने के शौकीन लोगों को पहले हजारों किताबों के लिए बीसियों बुकशेल्फ रखनी पडती थीं। हालांकि उनका महत्व इससे कम नहीं हो गया है, लेकिन इतना तो है कि इंटरनेट ने तमाम अखबार, पत्रिकाएं व किताबें उन लोगों के लिए उपलब्ध करा दी हैं, जिनके पास उन्हें रखने के लिए जगह नहीं है या जिनकी पहुंच से वे बाहर हैं। भारत के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्य या अध्यात्म की किताबों का इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया या जर्मनी समय से तो पहुंच नहीं सकतीं, पर इंटरनेट के जरिये अनिवासी भारतीयों की पहुंच में ज्ञान के ये साधन नियमित रूप से बने हुए हैं। एक-डेढ दशक पहले तक सामान्य विषयों पर जानकारी जुटाने या लिखने के लिए भी कई ग्रंथालयों के चक्कर लगाने पडते थे। लेकिन अब? आप घर बैठे इंटरनेट पर सर्च करके विशिष्ट विषयों पर भी पूरा शोधपत्र तैयार कर सकते हैं। इसे ज्ञान की दुनिया में विज्ञान का चमत्कार ही तो कहा जाएगा! विज्ञान के इस चमत्कार ने आज की व्यस्त दिनचर्या में सबसे बडा जो कमाल किया है, वह समय प्रबंधन के संदर्भ में है। यूटिलिटी बिल जमा करने से लेकर रेल या हवाई जहाज में रिजर्वेशन तक के लिए कहीं लाइन में लगने की जरूरत नहीं है। घर बैठे इंटरनेट से यह सब हो सकता है।


नर्सरी से लेकर विश्वविद्यालय और प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन के लिए भी अब आपको बार-बार वहां का चक्कर लगाने की कोई जरूरत नहीं है। माउस की एक क्लिक पर पूरा जहान आपके सामने होगा। यहां तक कि लाखों रुपये सीटीसी वाली नौकरियां और व्यापारिक जगत में करोडों की डील भी। यही वजह है जो कई मामलों में काफी पीछे पडा एशिया आज इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में सबसे आगे है।


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इंटरनेट और हम

दुनिया के 37 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता अकेले एशिया में पाए जाते हैं, जिसमें भारत की हिस्सेदारी काफी बडी है। यह अलग बात है कि हिंदी इसके बावजूद इंटरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दस भाषाओं में अभी नहीं गिनी जा सकी है, पर यह सच है कि अंग्रेजी को पहले नंबर पर होने का गौरव दिलाने वालों में भारतीयों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।


फॉन्ट और की बोर्ड की एकरूपता की समस्या के कारण हमें आज भी इंटरनेट पर आम तौर पर रोमन लिपि का प्रयोग करना पडता है। ऐसे में भले ही हमारी भाषा हिंदी या तमिल या कन्नड हो, पर उसकी गिनती लिपि के आधार पर अंग्रेजी में हो जाती है। बहरहाल इस दिशा में भी पूरी गंभीरतापूर्वक काम चल रहा है और काफी हद तक यह समस्या हल भी कर ली गई है। विंडोज एक्सपी के साथ यूनीकोड ने अंग्रेजी कीबोर्ड से हिंदी टाइपिंग की जो सुविधा दी है, उसने इंटरनेट पर हिंदी ब्लॉग्स की एक नई दुनिया ही बसा दी है। हालांकि यह दुनिया अभी बिलकुल बचपन में है, पर इसके जवान होते बहुत दिन नहीं लगेंगे। वह दिन दूर नहीं जब अलग से कोई फॉन्ट डाउनलोड किए बगैर इंटरनेट पर हिंदी पढी जा सकेगी और तब हिंदी को टॉप टेन में शामिल होते देर नहीं लगेगी।



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