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छोटे शहरों की ऊंची उड़ान

Posted On: 14 Aug, 2012 Others में

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sakhiवर्ष 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में लडकियों ने बाजी  मारी  थी सायना नेहवाल, कृष्णा पूनिया, ममता खरब..जैसी सभी लडकियां हिंदुस्तान के गांवों-कस्बों की हैं।

झारखंड की राहत तसलीम कौन बनेगा करोडपति में एक करोड की धनराशि जीतने वाली पहली महिला विजेता बनीं। राहत गिरीडीह में एक सिलाई केंद्र चलाती हैं।


लखनऊ की पंकज भदौरिया ने मास्टर शेफ बनने के लिए 16 वर्ष का अपना शिक्षण कार्य छोड दिया। उनकी मेहनत रंग लाई..।


खबरें अभी और भी हैं, लेकिन ठहरिए! बिहार की उन लडकियों को कैसे भुलाया जा सकता है, जो पिछले वर्ष दैनिक जागरण के एक कार्यक्रम में पटना-मुजफफरपुर में मिलीं और कवर स्टोरी की प्रेरणा बनीं।


मुजफफरपुर की लडकियां विनीता जायसवाल, अमिता सिंह, रश्मि, जागृति.., गया, भागलपुर, पटना की सुष्मिता, आरती, शुगुफ्तां, शालिनी, कोमल, शबनम, पल्लवी, श्रद्धाश्री, खुशबू, निधि, मेघा..। जागरण के सामाजिक संगठन पहल के कार्यक्रम सपनों को चली छूने में शिरकत करने वाली ये लडकियां अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं। लेकिन इनके सपने समान हैं, आत्मनिर्भर होना, परिवार, समाज के लिए कुछ करना और अपनी जैसी दूसरी लडकियों को प्रेरणा देना। अपनी स्टिरियोटाइप छवि को तोडने लगी हैं ये लडकियां।


सपनों को मिले पंख

ज्यादा समय नहीं हुआ, जब छोटे शहरों-कस्बों में लडकियों के सपने अच्छे घर-अच्छे वर से आगे नहीं जा पाते थे। आर्थिक उदारीकरण ने उन्हें आगे बढने के मौके दिए। ऐश्वर्या राय व सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स व मिस व‌र्ल्ड बनने के बाद उनके सपनों को पंख मिल गए। हालांकि इससे पहले जूही चावला, मीनाक्षी शेषाद्रि, मधु सप्रे आ चुकी थीं, लेकिन ऐश्वर्या व सुष्मिता लडकियों की प्रेरणा बनीं।

छोटे पर्दे के कार्यक्रम इंडियन आइडल, बूगी-वूगी, डांस इंडिया डांस, सारेगामा..ने भी उन्हें उडान भरने के लिए उन्मुक्त आसमान दिया।


छा गई स्मॉल टाउन ग‌र्ल्स

उडनपरी पी.टी. उषा केरल की छोटी सी जगह पायोली की हैं। उन्हें पायोली एक्सप्रेस भी कहा जाता है। खेलों का रुख करने वाली लडकियों के लिए वह पहली आशा की किरण बनीं। फिर आई प. बंगाल के छोटे से गांव की तीरंदाज डोला बनर्जी, इंफाल (मणिपुर) की बॉक्सिंग सुपर स्टार मैरी कॉम, बैडमिंटन की टॉप टेन हिसार (हरियाणा) की सायना नेहवाल, गुडीवाडा (आंध्र) की शतंरज क्वीन कोनेरू हंपी..। कॉमनवेल्थ गेम्स में बडे पदक हासिल करने वाली सभी स्मॉल टाउन ग‌र्ल्स थीं!


शीर्ष अभिनेत्री व मिस व‌र्ल्ड प्रियंका चोपडा जमशेदपुर में पैदा हुई और बरेली में पली-बढीं। मंडी (हिमाचल प्रदेश) की कंगना रानाउत, बिहार की नीतू चंद्रा, गाजियाबाद की लारा दत्ता, करनाल (हरियाणा) की मल्लिका सहरावत, पूर्वी राज्य असम की मोनी कंगना दत्ता, उत्तर पूर्व की मौशमी गोगोई सभी बेहतर काम कर रही हैं। गंवई शैली के लिए पहचानी जाने वाली पटना की रतन राजपूत, बिग बॉस सीजन-4 की विजेता प्रतापगढ की श्वेता तिवारी, भोपाल की सारा खान, केबीसी में एक करोड जीतने वाली राहत तसलीम जैसे नाम छोटे पर्दे पर छाए हैं।


छोटे शहर महानगर में

दिल्ली विश्वविद्यालय में ढेरों चेहरे बाहर के हैं। मुखर्जी नगर में रहने वाली नीति नॉर्थ ईस्ट की हैं। भाषाई मुश्किलों के बाद भी एडमिशन से लेकर पी.जी. ढूंढने तक का सारा काम उन्होंने खुद किया। नीति शोधकार्य में व्यस्त हैं..। रांची की तृप्ति रंजन को शुरू में किसी रिश्तेदार के घर रहना पडा, लेकिन अब सहेलियों के साथ कॉलेज के पास ही कमरा लेकर रह रही हैं। उत्तराखंड की कविता बिष्ट छोटी बहन के साथ दिल्ली में रहकर एम.बी.ए. कर रही हैं।


मुजफफरपुर (बिहार) से आई भावना आईटी सेक्टर में हैं। चार बहनों में सबसे बडी भावना वर्ष 2003 में दिल्ली आई। बताती हैं, घर से बाहर निकलने वाली मैं खानदान की पहली लडकी थी। एडजस्ट करने में थोडा समय तो जरूर लगा। बडी थी तो जिम्मेदारियां भी थीं। बहुत सोच-विचार के बाद मम्मी-पापा ने यहां आने की अनुमति दी। घर से आते हुए मां ने कहा, तुम बडी हो, सही राह पर चलोगी तो छोटी बहनों को भी राह मिलेगी। शादी के बाद भी उनकी यह बात जिम्मेदारियों का एहसास कराती है मुझे। छोटी बहन मुंबई में एच.आर. विभाग में है, उससे छोटी इंटरकॉंटिनेंटल ग्रुप, दिल्ली में और सबसे छोटी विप्रो में है।


एक चेहरा यह भी

सामाजिक कार्यकर्ता अनिता पॉल को हाल ही में इंडियन मर्चेट्स चेंबर्स का जानकी देवी बजाज पुरस्कार मिला है। अल्मोडा (उत्तराखंड) में जन्मी अनिता ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद समाज-कार्य जैसा क्षेत्र चुना। कहती हैं, मेहनतकश स्त्रियां मुझे आकर्षित करती हैं। हमने भले ही बडा आर्थिक ढांचा खडा कर लिया हो, लेकिन स्त्रियों की दुनिया में अभी बहुत बदलाव होने हैं। अभी हमने कुमाऊं की वादियों में स्त्रियों को रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, हाइड्रोलॉजी, इको-सिस्टम, हिमखाद्य बनाना सिखाया है। 150 गांव अभी इस स्तर पर काम कर रहे हैं। मैं खुशकिस्मत हूं कि माता-पिता और पति का मुझे पूरा सहयोग मिला। मैं चाहती हूं कि परिस्थिति का रोना छोडकर स्त्रियां आगे बढें। सपने पूरे करने का हक हर स्त्री को है। मन में जज्बा हो तो मंजिलें मिल जाती हैं।

लडकियों में इच्छाशक्ति है और उनकी सोच वाकई बदली है। जानिए, सखी द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के नतीजे क्या कहते हैं और साथ ही कुछ खास लोगों के विचार भी।


सहारनपुर से पेरिस तक

पिछले वर्ष पेरिस में लोरियल के हेडक्वार्टर्स में सीधे पल्ले की साडी पहनी एक लडकी ट्यूबरकुलोसिस पर पर्चा पढ रही थी। जिस इंटरनेशनल कॉस्मेटिक ब्रैंड के एंबेसेडर्स में ऐश्वर्या राय व सोनम कपूर जैसे नाम हों, वहां उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की लडकी आखिर क्या कर रही थी? इनका नाम है डॉ. अंतिमा गुप्ता, जो लोरियल-यूनेस्को की साइंस फेलोशिप हासिल करने वाली दूसरी भारतीय स्त्री हैं। मेडिकल में जाने की इच्छा आर्थिक स्थिति के चलते पूरी न हुई तो उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बायोटेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद लखनऊ से शोध कार्य किया। इस फेलोशिप के बाद उनकी राहें वाकई आसान हो गई हैं।


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