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अनुशासन खुद के लिए ज्‍यादा जरूरी

Posted On: 17 Sep, 2019 Others में

Sandeep writesमेरे कुछ अनुभव

Sandeep Tripathi

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मेरे विद्यालय में अक्सर कुछ बच्चे प्रार्थना में प्रार्थना में लेट आते या प्रार्थना के दौरान आते हैं। प्रार्थना के दौरान आने और उनकी बात करने से प्रार्थना में ख़लल उत्पन्न होता है। बच्चों की इस आदत से हम सभी शिक्षक बहुत परेशान थे। कई बार उन बच्चों को बुलाकर हमारे द्वारा समझाइश दी गई और उन्हें नियमितता तथा अनुशासन के बारे में बताया गया। बारंबार ऐसी नसीहत देने के बावजूद बच्चे समय पर नहीं आते थे। यह एक प्रकार से उनकी आदत में शामिल हो गया। कई दिन से मैं इस समस्या पर विचार कर रहा था। इस संबंध में मैंने उनके पालकों से, बच्चों से कक्षा शिक्षको से, पालकोंं से, छात्रावास अधीक्षक महोदय से भी बात की, लेकिन परिणाम जस का तस रहा।

 

एक दिन मुझे विचार आया। अगले दिन पुनः कुछ बच्चे अपनी आदत के अनुसार विद्यालय में लेट आए। कक्षा में जाने पर मैंने उन सभी बच्चों को खड़ा किया जो देरी से आए थे और उनसे पहले उनकी देरी से आने का कारण पूछा। सभी में कुछ ना कुछ कारण बता दिया जो वह अक्सर बताते थे। तब उनसे मैं बोला अब आज के बाद जो भी बच्चा प्रार्थना में नहीं आएगा या देर से आएगा, उसे मेरे पीरियड में बैठने की अनुमति नहीं होगी तथा वह क्लास के बाहर खड़ा रहेगा। बच्चों ने इस बात के लिए अपनी स्वीकृति दे दी। यही बात मैंने उन समस्त कक्षाओं में दोहरा दी जहां जहां मैं पीरियड लेता था और वहांं भी बच्चों ने अपनी स्वीकृति दे दी।

 

बच्चों को मैंने अपनी आदत सुधारने के लिए 2 दिन का मौका दिया। मैंने ध्यान दिया अब बच्चे समय पर आ रहे हैं। दो दिनो बाद जब हमारा नियम चालू हुआ, फिर कुछ बच्चे प्रार्थना में लेट आए। पीरियड के दौरान उन बच्चों को मैंने अपनी कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया और अपना पीरियड लेने लगा। इस प्रकार यह कार्य चलने लगा। उसी दौरान एक दिन मेरे बेटे का स्वास्थ्य खराब हो गया और उसे डॉक्टर को दिखाने के कारण मैं स्वयं प्रार्थना में शामिल नहीं हो पाया। जल्दी से मैं घर आया और सीधे अपनी क्लास में पहुंचा लेकिन मैं 5 मिनट लेट था। बच्चे बोलने लगे सर आज आप लेट आए हैं, मैं उनसे सॉरी बोला और उन्हें कारण बताने ही वाला था तभी एक बच्ची बोलने लगी, सर नियम तो नियम है चाहे आपके लिए हो या हमारे लिए होंं। उस बच्ची की बात सुनकर मैं निरुत्तर हो गया और मन ही मन सोचने लगा यह बात सही कह रही है।

 

यदि हम बच्चों से अनुशासन की अपेक्षा रखते हैं सबसे पहले हमें स्वयं को ही अनुशासित होना पड़ेगा तब जाकर ही या पूरी तरह कारगर हो पाएगा। उस दिन देरी से आने के लिए मैंने बच्चों को सॉरी कहा और उनसे वादा किया कि मैं हमेशा समय पर ही आऊंगा। यदि कोई कारण बनता है तो उस दिन मैं लेट आने के बजाय छुट्टी लेना पसंद करूंगा। बच्चों ने सहर्ष मेरी बात स्वीकार कर ली और हमारा पीरियड पुनः प्रारंभ हो गया।

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