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किसानों की समस्याओं के प्रति कब तक निष्क्रिय रहेंगे हम ?

Posted On: 13 Mar, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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मोहम्मद शमी और उनकी पत्नी की घरेलु झगड़े को राष्ट्रीय मुद्दा बना देने वाली मीडिया की नींद अचानक से किसानों के मुद्दे पर  खुली है। जब 180 किलोमीटर की पदयात्रा का किसान नासिक से मुम्बई तक पहुँच गए, तक कही जाके उनके कैमरों का रुख कृषकों के चेहरे की थकावटे और पाँव के छालो की और हुआ है, कमाल है ना देश में एक मियां-बीबी के झगडे को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया जाता है कि किसी को मियां साहेब के इंटरव्यू को एक्सक्लूसिव पेश करने का होड़ है तो कोई बीबी के दर्द को भुना के बेचने में मशगूल है। किसानों को अपनी समस्या सुनाने के लिए 180 किलोमीटर की दुरी तय करनी पड़ी, वो भी पद यात्रा।  तब कही जाके हमारा ध्यान गया है वरना हम तो कही कोने में चुपके से मोहम्मद शमी के व्हाट्स एप चैट के स्नैपशॉट को पढ़ने में व्यस्त थे। देश का अन्नदाता हताश-निराश भारी कदमो और सूखे गलो के साथ बढ़ रहा था और हम अनजान थे, वैसे हमे क्या लेना ? मीडिया से भी सवाल क्यों पूछना, की किसानों को समस्या सुनने के लिए 180 किलोमीटर की पद यात्रा क्यों करनी पड़ी, और उसके अंतिम पड़ाव पर आप क्यों जागे ? हम तो खुश है उनके सास,बहु और ससुराल के चटखारे में।
              ”आखिर हम क्यों अपने किसानों के साथ सौतेला व्यवहार करते है ? क्या कारण है कि राजनेता से लेकर मीडिया और आम जन भी किसानों की समस्या के प्रति गंभीर नहीं है ? जिसने मानवीय सभ्यता की नींव रखी, जिसने मानवीय सभ्यता को सींचा है।”
                       शायद किसान ना होते तो हम आज भी जंगलों में पशुओं के भांति प्रवास कर रहे होते। बड़े-बड़े अट्टालिकाओं में रह कर कृत्रिम हवा में सांस लेकर हम उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर जाते है जो हमारे अन्नदाता है। वो सरकार से समाज से कुछ नाजायज मांग तो नहीं करते, फिर भी सरकार के साथ-साथ समाज भी निष्क्रिय पड़ा रहता है जबकि सभों का पेट वो किसान ही भरता है। यह कितना दुखद है कि पहले अपने खेतों में मेहनत करे फिर अपने हक के लिए लड़े, पैदल मार्च करे। हर दिन 30-35 किलोमीटर पैदल यात्रा करने वाले किसानों के सयंम और समझ को देखे तो तो अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवी भी शर्मा जाएं जो अपने विरोधियो का विरोध करते वक़्त सारी मर्यादाएं लाँघ जाते है। किन्तु किसानो ने आम लोगो के साथ-साथ ट्रैफिक और 10वी की एग्जाम देने वाले विद्याथियों का भी ख्याल रखा इसलिए रात्रि को ही पद यात्रा कर आजाद मैदान मुम्बई को कूच किया। यानि विरोध भी लेकिन बिलकुल सभ्य और संतुलित तरीके से ताकि आम जन को तकलीफ ना हो। लेकिन  आम जन किसानों के लिए क्या कर रहे है ? या अभी भी प्रश्न बना हुआ है।
 ”धर्म-जाति, मंदिर-मस्जिद जैसी मुद्दों पर अपना खून खौला लेने वाला जनमानष कब इस मुद्दे को लेकर गंभीर होगा और अपने अन्नदाता को हक़ दिलवाएगा, वही अन्नदाता जिसने उसके सभ्यता को अपने पाँवो पर खड़ा किया है, वही अन्नदाता जिसने मानवीय सभ्यता को सींचा है, वही अन्नदाता जिनके कर कमलों में ही हम सबका भविष्य निहित है।”
                         180 किमी की यात्रा कर आये किसानों की मांगों को सरकार ने आज मान ली है किंतु यह तो समय बताएगा कि ये धरातल पर उतरती भी है या आश्वासन मात्र बन कर ही रह जाती है और किसानों को पुनः मुम्बई या दिल्ली कूच करनी पड़ती है। इन सब के बीच बड़ा सवाल अब भी वही बना पड़ा है की आखिर कब तक इतनी बड़ी समस्या के प्रति हम निष्क्रिय बने रहेंगे और सिर्फ राजनीतिक समाधान के भरोसे बैठे रहेंगे। धर्म-जाति, मंदिर-मस्जिद जैसी मुद्दों पर अपना खून खौला लेने वाला जनमानष कब इस मुद्दे को लेकर गंभीर होगा और अपने अन्नदाता को हक़ दिलवाएगा, वही अन्नदाता जिसने उसके सभ्यता को अपने पाँवो पर खड़ा किया है, वही अन्नदाता जिसने मानवीय सभ्यता को सींचा है, वही अन्नदाता जिनके कर कमलों में ही हम सबका भविष्य निहित है।
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