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विकास की बाट जोहता मुसहर समुदाय

Posted On: 29 Mar, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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मुसहर अर्थात चूहा पकडने वाले लोग। हमारे बिहार में इस गरीब पिछड़े जाती को लोग इसी नाम से बुलाते है। ‘मुस’ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ चूहा होता है। इस समुदाय को मुसहर बुलाने के  पीछे शायद इनका पारंपरिक पेशा चूहा पकड़ा रहा हो, लेकिन वास्तविकता इनकी गरीबी है जिसकी वजह से इन्हें मजबूरन चूहे पकड़ खाने को मजबूर होना पड़ता था, आज भी परिस्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। आज भी रेलवे स्टेशनों के आप पास या शहर से बाहर टूटे फूटे कच्चे घरो में इनका बसेरा है, गरीबी और मज़बूरी ही इनकी पहचान है।
मुसहर सामान्तया बिहार, मध्यप्रदेश और नेपाल के तराई इलाको में पाई जाने वाली जनजाति है। किंवन्दतियो को माने तो भगवान परमेश्वर ने मनुष्य को घोड़ा दिया था सवारी करने के लिए किन्तु एक मनुष्य ने अपने पांव को टिकाने के लिए घोड़े के पेट में छेद कर दिया ताकि घुड़सवारी के दौरान वो अपना पांव वहाँ टिक्का सके जिससे रुष्ठ होके ईश्वर ने उन्हें मुसहर बना दिया, चूहा पकडने वाला। ये तो किस्से कहानियों और लोककथाओं की कृति है किंतु आज मुसहर समुदाय की जो परिस्थिति है वो समाज के लिए शर्म की बात है। महादलित जाती का दर्जा लिए ये समुदाय आज भी महादलित की स्थिति में है, ना आम जन और ना ही राजनीतिक पार्टियां इनकी सुध लेती है। जीवन यापन के बुनियादी ढांचे का आभाव है, ना इनके शिक्षा की कोई व्यवस्था है ना ही रोजगार की, अमूमन इन्हें उसी प्रकार के कार्य मिलते है जो समाज में घृणित कार्य माने जाते है और मेहनताना भी कम दिया जाता है। बड़े अपने बच्चो को मुसहरों से दूर रहने की सलाह दिया करते है, शायद ही कोई व्यक्ति इन्हें अपने घर में प्रवेश की इज्जाजत देता हो।
अपने 24 वर्ष के उम्र में मैंने मुसहरों को कोई खास विकास करते नहीं देखा, बचपन में जब मैं अपने गांव या मुंगेर किसी धार्मिक अवसर पर गंगा स्नान को जाता तो गंगा के तट से थोड़ा दूर इनका बसेड़ा हुआ करता था जो शहर से बहार हुआ करता करता था और आज भी है बस आज बदलाव इतना आया है कि पहले इनके घर तार के वृक्ष के पत्तो के हुआ करते थे आज मिट्टी के हो गए है। तेंदू के पतों से पत्तल बनाने का रोजगार भी अब इनसे प्लास्टिक के प्लेटों ने छीन लिया है। रोजगार के अभाव में कई लोगो ने पंजाब और हरियाणा का तो रुख कर लिया किन्तु वो आज भी सिर्फ कृषक मजदुर की ही भूमिका अदा कर रहे हैं। हालांकि मुसहर समुदाय के बच्चो को विकास मित्र और टोला सेवक में बहाल किया गया है, फिर ये ये नाकाफी ही साबित हुई है।
सिर्फ बिहार में करीबन 60 लाख के जनसंख्या वाले इस समुदाय में 98 प्रतिशत पुरुष अशिक्षित है और महिलाएं तो शायद शत प्रतिशत हो सकती है। कई राजनीतिक पार्टियां दलितों और महादलितों के नाम पर अपनी राजनीति तो चमकाते है, उनके विकास और समाज में स्थान दिलाने का वादा तो करते है लकिन धरातल पर मुसहर जाति की स्थिति को देख कड़वा सच सबके समक्ष आ जाता है। देश के आजादी के 70 वर्ष बाद भी मुसहर समुदाय वंचित और पिछड़ा हुआ है।

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