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CDS 2017 : प्रथम प्रयास में तेहरवी रैंक लाकर शिरीष ने पेश की मिसाल।

Posted On: 17 May, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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हर दिन लाखों हजारों लोगों की भीड़ बस यूँ ही भागी चली जाती है, उन्हें नहीं पता की उन्हें कहा जाना है, वे क्यों भाग रहे है। जिन्हें पता है उनमे से अधिकांश अपनी हिम्मत बीच राह में ही खो देते है। आखिर यू ही होशलो की उड़ान नहीं भरी जाती, कामयाबी की इबारत कोई यू ही नहीं लिख देता, विषम हालातों में अडिग रह कर, हालातों से हाथ दो हाथ कर सफलता को अंतिम लक्ष्य मान कर चलने वाला व्यक्ति ही सफलता की इबारतें लिखता है। कुछ ऐसा ही है, बिहार के छोटे से कस्बे बरियारपुर (मुंगेर) के शिरीष कुमार की कहानी, जिसने ना केवल CDS 2017 के प्रथम प्रयास में 13वाँ रैंक ला कर सफलता प्राप्त की वल्कि इस अवधारणा को भी धरासाई किया कि बड़े सफलता के लिए आपका अंग्रेजी माध्यम स्कूल से पढ़ना आवश्यक है।

 

 

स्वर्गीय देवराज गुप्ता और रेखा देवी के द्वितीय सुपुत्र शिरीष का जीवन कोई फ़िल्मी कहानी से कम नहीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बरियारपुर में ही रह कर प्राप्त की, किन्तु उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु उन्हें बरियारपुर से अठारह किमी दूर जमालपुर का रुख करना पड़ा। जहाँ उन्होंने नोट्रेडम एकेडमी में 10वी तक की शिक्षा ग्रहण की, जो एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल तो था कि किन्तु बाहर से आए विद्याथियों को सप्तमी में हिंदी माध्यम में दाखिला प्राप्त होता था, जिस वजह से काफी परेशानियों को सामना करता पड़ता था, क्योंकि हिंदी माध्यम के बच्चे साधारण पृष्टभूमि से आते थे एवं शुरुवाती दौर में अंग्रेजी में पिछड़े हुए होते थे इस वजह से उन्हें हेय की दृष्टि से देखा जाता था तथा कई विद्यालयी कार्यक्रम से नदारद होना पड़ता था।

 

शिरीष के पिता मेडिकल स्टोर चलाया करते थे औरइससे ही वो अपने परिवार का पालन-पोषण और अच्छे स्कूल में दोनों बच्चो के महँगे शिक्षा का भार वहन करते थे, उनका सपना था कि वो अपने बच्चो को सरकारी नौकरी करते देखे, किन्तु इससे पहले की वो अपने स्वप्न को पूरा होते देख पाते। कुछ अपराधियों ने उसके पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। पुरे परिवार पर दुःखो का पहाड़ टूट पड़ा, किन्तु ऐसे समय में उसके बड़े भाई मनीष ने आगे बढ़ घर और परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, अपने त्याग और मेहनत के बल पर अपने छोटे भाई के सफलता के लिए मार्ग परास्त किया। शुरुवाती दौर में लोगों ने उसके शिक्षा प्राप्त करने और सपने पूरे करने की इच्छा का मख़ौल भी उड़ाया, किन्तु शिरीष ने भी अपने बड़े भाई के अपेक्षाओं पर खड़े उतरते हुए इंटरमीडिएट बिहार के टॉप एक प्रतिशत छात्रों में ना केवल अपनी जगह बनाई अपितु मिनिस्ट्री ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के चार लाख रुपए का स्कालरशिप भी प्राप्त की। भागलपुर यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के उपरांत उन्होंने CDS की तैयारी की और प्रथम प्रयास में ही सफलता हासिल की। शिरीष बर्नवाल ऐसे लोगों के लिए मिशाल है, जो आने असफलता के लिए किस्मत और परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराते है, अगर सफलता प्राप्त करने का मन में जज्बा हो तो व्यक्ति एक न एक दिन सफलता को अवश्य ही प्राप्त होता है।

 

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